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क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे 

“मेरा नाम चिन चिन चूं…”

 “आइए मेहरबां बैठिए जान-ए-जां…” 

इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए…

जैसे गीत सुनते ही ज़ेहन में पुरानी फ़िल्मों की सुनहरी दुनिया ताज़ा हो जाती है। इन गीतों को आवाज़ देने वाले गायकों और संगीतकारों को तो लोग याद रखते हैं, लेकिन इनके पीछे अपनी क़लम का जादू बिखेरने वाले शायर क़मर जलालाबादी का नाम अक्सर परदे के पीछे रह जाता है। क़मर जलालाबादी उन चुनिंदा गीतकारों में थे, जिन्होंने अपने अल्फ़ाज़ से हिंदी सिनेमा को ऐसी दौलत दी, जो आज भी उतनी ही ताज़ा महसूस होती है। 

बचपन से ही शायरी का शौक

क़मर जलालाबादी की पैदाइश 1919 में पंजाब के जलालाबाद में हुयी। उनका असली नाम ओमप्रकाश भंडारी था। बचपन से ही उन्हें उर्दू शायरी का शौक़ था। महज़ सात साल की उम्र में उन्होंने शेर कहना शुरू कर दिया। घर में इस शौक़ को ज़्यादा तवज्जो नहीं मिली, लेकिन एक घुमंतू शायर अमर ने उनकी सलाहियत को पहचान लिया। उन्होंने ही उन्हें “क़मर” तख़ल्लुस दिया, जिसका मतलब होता है चांद। चूंकि वे जलालाबाद से थे, इसलिए आगे चलकर वे क़मर जलालाबादी के नाम से मशहूर हुए।

फ़िल्मों की दुनिया तक का सफ़र

शायरी का जुनून उन्हें 1940 के दशक में पुणे ले आया। साल 1942 में उन्हें फ़िल्म “ज़मींदार” के लिए गीत लिखने का पहला मौक़ा मिला। इस फ़िल्म का गीत “दुनिया में ग़रीबों को आराम नहीं मिलता” काफ़ी मशहूर हुआ। इसके बाद उन्होंने मुंबई का रुख़ किया और फिर तकरीबन चार दशक तक हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री में एक से बढ़कर एक गीत लिखे।

उनके गीतों में मोहब्बत भी थी, दर्द भी, मस्ती भी और ज़िंदगी का फ़लसफ़ा भी। यही वजह थी कि उनके लिखे नग़मे हर दौर में लोगों के दिलों में जगह बनाते रहे।

ऐसे गीत, जो कभी पुराने नहीं होते

अगर क़मर जलालाबादी के मशहूर गीतों की बात करें, तो “मेरा नाम चिन चिन चूं” आज भी लोगों को झूमने पर मजबूर कर देता है। फ़िल्म हावड़ा ब्रिज का यह गीत संगीतकार ओ. पी. नैयर, गायिका गीता दत्त और अभिनेत्री हेलेन की वजह से जितना याद किया जाता है, उतना ही इसकी जान क़मर जलालाबादी के लिखे हुए अल्फ़ाज़ भी हैं।

इसी फ़िल्म का दूसरा अमर गीत “आइए मेहरबां बैठिए जान-ए-जां” भी उनकी शानदार क़लम का नमूना है। आशा भोंसले की आवाज़ और मधुबाला की अदाओं के साथ यह गीत आज भी सदाबहार माना जाता है।

उनका लिखा एक और दर्दभरा गीत “इक दिल के टुकड़े हज़ार हुए” मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में आज भी लोगों की आंखें नम कर देता है। इन गीतों ने साबित कर दिया कि क़मर सिर्फ़ गीत नहीं लिखते थे, बल्कि जज़्बात को अल्फ़ाज़ पहनाते थे।

हर बड़े संगीतकार के पसंदीदा गीतकार

क़मर जलालाबादी ने अपने दौर के लगभग हर बड़े संगीतकार के साथ काम किया। इनमें ओ. पी. नैयर, एस. डी. बर्मन, मदन मोहन, सी. रामचंद्र, रवि, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, कल्याणजी-आनंदजी जैसे नाम शामिल हैं।

वहीं उनके गीतों को मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, किशोर कुमार, मुकेश, मन्ना डे, गीता दत्त, शमशाद बेगम, सुरैया, नूरजहां और तलअत महमूद जैसे महान गायकों ने अपनी आवाज़ दी। यह अपने आप में उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा सबूत है।

“पहली तारीख़” का यादगार गीत

साल 1954 में आई फ़िल्म “पहली तारीख़” का गीत “दिन है सुहाना, आज पहली तारीख़ है” आज भी हर महीने की पहली तारीख़ पर लोगों को याद आता है। एक समय रेडियो सीलोन पर यह गीत हर महीने की पहली तारीख़ को बजाया जाता था। वेतन पाने वाले लोगों की खुशी को इस गीत ने बड़े ही मज़ेदार अंदाज़ में पेश किया था।

सादगी भरी ज़िंदगी

फ़िल्मी दुनिया में बड़ी कामयाबी हासिल करने के बावजूद क़मर जलालाबादी बेहद सादा मिज़ाज इंसान थे। शूटिंग और रिकॉर्डिंग के बाद बचा हुआ ज़्यादातर वक़्त वे अपने परिवार के साथ बिताना पसंद करते थे। उन्हें शोहरत से ज़्यादा अपने काम से मोहब्बत थी। शायद यही वजह है कि उनके गीतों में बनावट नहीं, बल्कि सच्चे जज़्बात महसूस होते हैं।

उनकी शायरी का अंदाज़

क़मर जलालाबादी सिर्फ़ फ़िल्मी गीतकार नहीं थे, बल्कि बेहतरीन शायर भी थे। उनकी शायरी में ज़िंदगी, मोहब्बत, जुदाई और इंसानी एहसास बड़ी सादगी के साथ सामने आते हैं

“राह में उनसे मुलाक़ात हो गई,
जिससे डरते थे वही बात हो गई।”

“कुछ तो है बात जो आती है क़ज़ा रुक-रुक के,
ज़िंदगी क़र्ज़ है, क़िस्तों में अदा होती है।”

विरासत जो हमेशा ज़िंदा रहेगी

9 जनवरी 2003 को क़मर जलालाबादी इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। लेकिन उनकी क़लम आज भी ज़िंदा है। उनके लिखे गीत हर पीढ़ी गुनगुनाती है। अफ़सोस की बात यह है कि लोग अक्सर इन गीतों के गायक और संगीतकार को याद रखते हैं, मगर गीत लिखने वाले शायर का नाम भूल जाते हैं।

क़मर जलालाबादी उन फ़नकारों में शामिल हैं, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को सिर्फ़ गीत नहीं दिए, बल्कि ऐसी यादें दीं जो वक़्त के साथ और भी ख़ूबसूरत होती चली गईं। उनके अल्फ़ाज़ आज भी यह एहसास दिलाते हैं कि अच्छा गीत वही होता है, जो संगीत ख़त्म होने के बाद भी दिल में देर तक गूंजता रहे। यही वजह है कि क़मर जलालाबादी का नाम हिंदी सिनेमा के सबसे अहम और हमेशा याद रखे जाने वाले गीतकारों में शुमार किया जाता है।

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