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हफ़ीज़ जालंधरी: ‘शाहनामा-ए-इस्लाम’ के ख़ालिक़ की अदबी दास्तान 

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो सिर्फ़ शायरी नहीं करते, बल्कि अपने कलाम से एक पूरी तहज़ीब, एक पूरा दौर और एक पूरी क़ौम की यादों को ज़िंदा कर देते हैं। हफ़ीज़ जालंधरी भी ऐसे ही शायरों में शुमार होते हैं। उनकी शायरी में जज़्बात की गर्मी भी है, तरन्नुम की मिठास भी और तारीख़ का शऊर भी।

सन् 1900 में जालंधर की सरज़मीं पर पैदा होने वाले मुहम्मद हफ़ीज़ ने बचपन ही से शेर-ओ-सुख़न की दुनिया में दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया था। अल्फ़ाज़ से उनका रिश्ता इतना गहरा था कि कम उम्र में ही शायरी करने लगे। बाद में उन्हें मशहूर आलिम और शायर मौलाना ग़ुलाम क़ादिर गिरामी की शागिर्दी हासिल हुई, जिसने उनके फ़न को नई बुलंदियां अता कीं।

लेकिन हफ़ीज़ जालंधरी का नाम जिस तख़्लीक़ से हमेशा के लिए जुड़ गया, वह है “शाहनामा-ए-इस्लाम”। यह सिर्फ़ एक नज़्म नहीं, बल्कि इस्लामी तारीख़ का एक अदबी दस्तावेज़ है। जिस तरह फ़ारसी अदब में फ़िरदौसी का “शाहनामा” और मौलाना रूम की मसनवी को ख़ास मक़ाम हासिल है, उसी तरह उर्दू अदब में “शाहनामा-ए-इस्लाम” को एक बड़ी कामयाबी माना जाता है।

मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली ने कभी अफ़सोस जताया था कि उर्दू में ऐसी कोई बड़ी मसनवी मौजूद नहीं जो फ़ारसी की शाहकार तख़्लीक़ात का मुक़ाबला कर सके। हफ़ीज़ जालंधरी की इस महान रचना ने उस कमी को काफ़ी हद तक पूरा कर दिया।

दरअसल, तारीख़ी वाक़ियात को शायरी के पैराहन में पेश करना आसान काम नहीं होता। और जब उन वाक़ियात का ताल्लुक़ किसी मज़हब और उसकी अक़ीदत से हो, तब ज़िम्मेदारी और बढ़ जाती है। ज़रा-सी ग़लती पाठकों की नाराज़गी का सबब बन सकती है। मगर हफ़ीज़ जालंधरी ने इस नाज़ुक फ़र्ज़ को बड़ी ख़ूबसूरती से निभाया। उन्होंने न तो तारीख़ को तोड़ा-मरोड़ा और न ही उसके हुस्न को कम होने दिया।

“शाहनामा-ए-इस्लाम” की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि इसमें तारीख़ की सच्चाई भी बरक़रार रहती है और शायरी का जादू भी कायम रहता है। कई मुक़ाम ऐसे आते हैं जहां पाठक का दिल जोश, अक़ीदत और जज़्बे से भर उठता है।

हालांकि हफ़ीज़ जालंधरी ने ग़ज़लें भी कहीं, लेकिन उनकी असली पहचान ग़ज़ल नहीं बन सकीं। उनकी ग़ज़लों में रिवायती उर्दू शायरी का रंग तो मिलता है, मगर वह गहराई और दर्द कम नज़र आता है जो बड़े ग़ज़लगो शायरों की पहचान होता है। शायद इसकी वजह यह रही कि उनका दुख ज़्यादा तर तजुर्बे का नहीं बल्कि मुशाहिदे का दुख था।

इसके बरअक्स उनकी नज़्में कहीं ज़्यादा असरदार साबित हुई। उनके नज़्मी मजमूओं “नग़्मा-ए-राज़” और “सोज़-ओ-साज़” को अदबी हल्कों में ख़ूब सराहा गया। इन नज़्मों में फ़लसफ़े की पेचीदगियां भले न हों, लेकिन बयान की रवानी, अल्फ़ाज़ की मिठास और तरन्नुम की दिलकशी पाठक को अपने साथ बहा ले जाती है।

हफ़ीज़ ने नए तजुर्बों के पीछे भागने के बजाय क्लासिकी उर्दू शायरी की बेहतरीन रवायतों को अपनाया। उन्होंने हल्के, सुरीले और गेय अल्फ़ाज़ का चुनाव किया, जिसकी वजह से उनकी नज़्में पढ़ने के साथ-साथ गुनगुनाने लायक भी बन गईं।

गीतों की दुनिया में भी हफ़ीज़ जालंधरी ने अपनी अलग पहचान बनाई। उनके गीतों में जज़्बात की सच्चाई और लफ़्ज़ों की मिठास साफ़ दिखाई देती है। “टूटी हुई कश्ती का मल्लाह” और “शहसवार-ए-कर्बला” जैसी रचनाएं आज भी उनकी फ़नकारी की गवाही देती हैं।

उनके अशआर भी उनकी फ़िक्र और एहसास की ख़ूबसूरत तर्जुमानी करते हैं। 

“इरादे बांधता हूं, सोचता हूं, तोड़ देता हूं,
कहीं ऐसा न हो जाए, कहीं ऐसा न हो जाए।”

“दोस्तों को भी मिले दर्द की दौलत या रब,
मेरा अपना ही भला हो मुझे मंज़ूर नहीं।”

इन अशआर में एक तरफ़ इंसानी कमज़ोरियां हैं तो दूसरी तरफ़ इंसानियत का दर्द भी।

हफ़ीज़ जालंधरी उन शायरों में से हैं जिन्होंने उर्दू शायरी को सिर्फ़ इश्क़ और हुस्न की महफ़िल तक महदूद नहीं रखा, बल्कि उसे तारीख़, तहज़ीब और क़ौमी जज़्बात से भी जोड़ा। यही वजह है कि उनका नाम उर्दू अदब के उन फ़नकारों में लिया जाता है जिन्होंने अल्फ़ाज़ को सिर्फ़ सजाया नहीं, बल्कि उन्हें एक मक़सद भी दिया।

भुलाई नहीं जा सकेंगी ये बातें
तुम्हें याद आएंगे हम याद रखना

आज जब उर्दू शायरी की तारीख़ पर नज़र डाली जाती है तो हफ़ीज़ जालंधरी का नाम एक ऐसे शायर के रूप में सामने आता है जिसने अपने कलाम से अतीत को ज़िंदा किया, जज़्बात को आवाज़ दी और उर्दू अदब को एक ऐसी नायाब तख़्लीक़ बख़्शी जो आने वाली नस्लों तक पढ़ी और सराही जाती रहेगी।

ये भी पढ़ें: मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया 

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