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मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया

उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे हुए हैं जिनकी ज़िंदगी खुद एक दास्तान बन जाती है। मियां दाद ख़ां “सैयाह” भी ऐसे ही दिलचस्प शख़्सियतों में से एक थे। उनकी शायरी जितनी रंगीन थी, उनकी ज़िंदगी उससे कहीं ज़्यादा हैरतअंगेज़ और रोमांच से भरी हुई थी।

मियां दाद ख़ां की पैदाइश 1829 में औरंगाबाद में हुयी थी। हालांकि रोज़ी-रोटी की तलाश में उनका परिवार बाद में गुजरात के सूरत शहर में आकर बस गया। बचपन से ही उनमें घूमने-फिरने और नई जगहों को देखने का बेहद शौक़ था। यही वजह थी कि बाद में उन्हें “सैयाह” यानी मुसाफ़िर का तख़ल्लुस मिला।

हिज्र में मौत भी आई न मुझे सच है मसल
वक़्त पर कौन किसी के कोई काम आता है

कहा जाता है कि सैयाह, उर्दू के महान शायर Mirza Ghalib के क़रीबी दोस्त और शागिर्द थे। ग़ालिब ने ही उनके सफ़र के शौक़ को देखते हुए उन्हें “सैयाह” नाम दिया था। यह नाम उनके व्यक्तित्व पर बिल्कुल फिट बैठता था क्योंकि उन्होंने पंजाब, बंगाल, कश्मीर, अरब और कई दूसरे इलाक़ों का सफ़र किया। उन दिनों इतना लंबा सफ़र करना आसान नहीं था, लेकिन सैयाह के लिए दुनिया को देखना ही सबसे बड़ा जुनून था।

उनकी ज़िंदगी का एक पहलू बेहद विवादास्पद भी रहा। बताया जाता है कि एक समय वे नकली नोट बनाने के काम में भी शामिल रहे। एक बार रेलवे स्टेशन पर उन्होंने सौ रुपये का नोट देकर टिकट खरीदा। संयोग से उसी नंबर का एक और नोट किसी दूसरे व्यक्ति के पास मिला। जांच हुई और मामला खुल गया। नतीजा यह हुआ कि सैयाह को 14 साल की सज़ा सुनाई गई।

लेकिन क़ैद की सलाख़ें भी उनके इल्म, फ़न और ज़ेहनी सलाहियत को महदूद न कर सकीं। जेल के अफ़सर उनकी दानिशमंदी, अदबी ज़ौक़ और शायरी से इतने मुतास्सिर हुए कि उन्हें जेल के भीतर कई रियायतें हासिल हो गईं। बाद में जब मलिका-ए-बर्तानिया महारानी विक्टोरिया की सिल्वर जुबली का मौक़ा आया, तो सैयाह ने उनकी शान में एक मदीहा नज़्म तहरीर की। इस नज़्म को ख़ूब पसन्द किया गया और इसके नतीजे में उनकी सज़ा की मुद्दत में भी काफ़ी कमी कर दी गई। 

रिहाई के बाद सैयाह ने यात्राएं लगभग छोड़ दीं और सूरत में सादगी भरा जीवन बिताने लगे। आर्थिक परेशानियां ज़रूर रहीं, लेकिन उन्होंने लेखन और शायरी का सिलसिला जारी रखा। उनकी प्रसिद्ध किताब “सैर-ए-सैयाह” उत्तर भारत की यात्रा पर आधारित एक दिलचस्प सफ़रनामा मानी जाती है।

सैयाह की शायरी में इश्क़, तसव्वुफ़, दर्द और ज़िंदगी के तर्जुबों की झलक मिलती है। उनका यह मशहूर शेर आज भी लोगों की ज़ुबान पर है।

“क़ैस जंगल में अकेला है मुझे जाने दो,
ख़ूब गुज़रेगी जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।”

इस शेर में मोहब्बत, तन्हाई और दीवानगी का ऐसा रंग है जो सीधे दिल तक पहुंचता है उनकी शायरी में कल्पना और बारीक एहसासों की भी भरपूर मौजूदगी दिखाई देती है। 

“नहीं मिलता दिला हम को निशां तक,
मकां ढूंढ आए उस का ला-मकां तक।”

यह शेर इंसान की उस तलाश को बयान करता है जो उसे हर जगह भटकाती है, लेकिन मंज़िल फिर भी दूर रहती है।यह शेर इंसान की उस तलाश को बयान करता है जो उसे हर जगह भटकाती है, लेकिन मंज़िल फिर भी दूर रहती है।

1907 में सूरत में उनका इंतिक़ाल हुआ। मगर उनकी शायरी और उनकी दिलचस्प ज़िंदगी आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों को अपनी ओर खींचती है। सैयाह केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि एक ऐसे मुसाफ़िर थे जिन्होंने ज़िंदगी को खुली किताब की तरह जिया। उनके अशआर में सफ़र की धूल भी है, इश्क़ की खुशबू भी और तजुर्बों की रौशनी भी।

उर्दू साहित्य के इतिहास में सैयाह का नाम एक ऐसे शायर के रूप में हमेशा याद किया जाएगा, जिसकी ज़िंदगी भी कविता थी और जिसका हर सफ़र एक नई कहानी।

ये भी पढ़ें: मीर अनीस: मर्सिया का बादशाह और उर्दू शायरी का एक नायाब सितारा

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