उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं जो सिर्फ़ अपने अश्आर की वजह से नहीं, बल्कि अपनी इल्मी, अदबी और फ़न्नी ख़िदमात के सबब भी हमेशा याद रखे जाते हैं। मुंशी नौबत राय ‘नज़र’ लखनवी भी उन्हीं अज़ीम शख़्सियतों में से एक थे। वह एक ऐसे शायर थे जिनकी ग़ज़लों में मोहब्बत की नज़ाकत, इंतिज़ार की कसक, ज़िंदगी का तजुर्बा और इंसानी जज़्बात की गहराई एक साथ नज़र आती है। साथ ही वह एक कामयाब सहाफ़ी (पत्रकार), माहिर मुसव्विर (चित्रकार) और शतरंज के बेहतरीन खिलाड़ी भी थे।
सन 1866 में लखनऊ के एक शरीफ़ और इल्म-दोस्त कायस्थ ख़ानदान में उनकी पैदाइश हुई। उस दौर का लखनऊ सिर्फ़ नवाबी शान-औ-शौकत का शहर नहीं था, बल्कि उर्दू ज़बान, शायरी और तहज़ीब का भी एक बड़ा मरकज़ था। ऐसे माहौल में परवरिश पाने वाले नज़र साहब के दिल में बचपन ही से अदब और शायरी का शौक़ पैदा हो गया। कहते हैं कि कम-उम्री में ही उन्होंने शे’र कहना शुरू कर दिया था और जल्द ही उनकी शायरी की चर्चा अदबी हल्कों में होने लगी।
नज़र लखनवी का ज़िक्र सिर्फ़ एक शायर के तौर पर करना उनकी शख़्सियत को मुकम्मल तौर पर बयान नहीं करता। उन्होंने सहाफ़त के मैदान में भी ख़ूब नाम कमाया। सन 1897 में उन्होंने ‘ख़दंग-ए-नज़र’ नामी रिसाला जारी किया। इसके बाद ‘अदीब’, ‘ज़माना’ और ‘अवध अख़बार’ जैसी मशहूर पत्रिकाओं और अख़बारों से बतौर संपादक वाबस्ता रहे। उनकी तहरीरों में अदबी लुत्फ़ भी था और फ़िक्र की गहराई भी। यही वजह थी कि उन्हें अपने दौर के अहम सहाफ़ियों में शुमार किया जाता था।
नज़र साहब की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी सादगी है। वह मुश्किल और पेचीदा अल्फ़ाज़ के बजाय ऐसे लफ़्ज़ चुनते थे जो सीधे दिल में उतर जाएं। उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, तन्हाई, इंतिज़ार और इंसानी एहसासात का बेहद ख़ूबसूरत इज़हार मिलता है।
“फ़िक्र-ए-मआल थी न ग़म-ए-रोज़गार था,
हम थे जहां में और तिरा इंतिज़ार था।”
इस शे’र में आशिक़ की वह कैफ़ियत बयान हुई है जिसमें दुनिया की तमाम फ़िक्रें पीछे छूट जाती हैं और सिर्फ़ महबूब का इंतिज़ार बाक़ी रह जाता है। यही सादगी और दर्द उनकी शायरी को आम लोगों के दिलों के क़रीब ले आती है।
“गुफ़्तुगू की तुम से आदत हो गई है वर्ना मैं,
जानता हूं बात करती है कहीं तस्वीर भी।”
मोहब्बत की शिद्दत को बयान करने वाला यह शे’र आज भी अदब के चाहने वालों में बेहद मक़बूल है। इसमें आशिक़ की वह हालत दिखाई देती है जहां महबूब की तस्वीर भी उसे ज़िंदा महसूस होने लगती है।
नज़र लखनवी के यहां इंतिज़ार सिर्फ़ एक जज़्बा नहीं बल्कि एक मुकम्मल एहसास बनकर सामने आता है। उनका यह मशहूर शे’र इसकी बेहतरीन मिसाल है।
“बनने लगे हैं दाग़ सितारे ख़ुशा नसीब,
तारीक आसमान शब-ए-इंतिज़ार था।”
यहां “शब-ए-इंतिज़ार” यानी इंतिज़ार की रात को एक ऐसे अंधेरे आसमान से तश्बीह दी गई है जिसमें सितारे उम्मीद की किरनों की तरह चमक रहे हैं। यह शे’र उनकी तख़य्युली ताक़त और शायराना नज़ाकत का शानदार नमूना है।
उनकी शायरी में फ़लसफ़ा भी है और ज़िंदगी का सबक़ भी।
“फ़ना होने में सोज़-ए-शम्अ की मिन्नत-कशी कैसी,
जले जो आग में अपनी उसे परवाना कहते हैं।”
इस शे’र में ख़ुददारी, जुर्रत और अपने मक़सद के लिए कुर्बानी देने का पैग़ाम छिपा हुआ है। यही वजह है कि उनके कई अश्आर महज़ इश्क़ की दास्तान नहीं बल्कि ज़िंदगी का फ़लसफ़ा भी बयान करते हैं।
नज़र साहब एक बेहतरीन मुसव्विर भी थे। रंगों, तस्वीरों और आईनों की दुनिया से उनकी दिलचस्पी उनकी शायरी में भी झलकती है।
“देखना है किस में अच्छी शक्ल आती है नज़र,
उस ने रक्खा है मिरे दिल के बराबर आईना।”
यहां आईना सिर्फ़ चेहरा दिखाने वाला शीशा नहीं बल्कि इंसान के दिल और उसकी अस्लियत का प्रतीक बन जाता है।
शतरंज से उनकी दिलचस्पी भी मशहूर थी। यह खेल सूझ-बूझ, तदब्बुर और दूरअंदेशी का मुतालिबा करता है, और यही खूबियां उनकी शायरी और सहाफ़त में भी दिखाई देती हैं। शायद इसी वजह से उनके अश्आर में जज़्बात के साथ-साथ फ़िक्र और तजुर्बे की रौशनी भी नज़र आती है।
सन 1923 में नज़र लखनवी इस फ़ानी दुनिया से रुख़्सत हो गए, लेकिन उनका कलाम आज भी ज़िंदा है। उनकी ग़ज़लें आज भी मुशायरों में पढ़ी जाती हैं, अदब के तालिब-ए-इल्म उन्हें शौक़ से पढ़ते हैं और उर्दू के चाहने वाले उनके अश्आर में अपने दिल की आवाज़ तलाश करते हैं।
उर्दू अदब की फ़िज़ा में नज़र लखनवी एक ऐसे सितारे की मानिंद हैं जिसकी चमक वक़्त गुज़रने के साथ कम नहीं हुई। उन्होंने शायरी, सहाफ़त और फ़न की दुनिया में जो नक़्श छोड़े, वे आज भी ताज़ा हैं। उनका कलाम इस बात की गवाही देता है कि सच्चा फ़न और सच्ची शायरी कभी फ़ना नहीं होती, बल्कि हर दौर में नए दिलों को अपनी तरफ़ मुतवज्जेह करती रहती है।
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