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Munshi Nawal Kishore : वो ब्राह्मण जो कुरान से मुहब्बत करता था,जिसकी प्रेस ने न सिर्फ़ किताबें छापीं, बल्कि गंगा-जमुनी तहज़ीब को बचाया 

हर समाज में दो धाराएं बहती हैं,  एक ठहराव की, दूसरी बदलाव की। लेकिन मजहब और रस्म-रिवाज के नाम पर जड़ता को पकड़े बैठे लोग हर नई बात को ‘बिदअत’ करार दे देते हैं। फिर चाहे वो छपाई की कलम क्यों न हो। 19वीं सदी के भारत में जब अंग्रेजी राज के बाद हिंदुस्तानी तहज़ीब बिखर रही थी, तब एक ब्राह्मण ने उठकर अपनी जाति और धर्म की सीमाओं को तोड़ा। वो थे मुंशी नवल किशोर (Munshi Nawal Kishore)।

शक्ल मुसलमान जैसी, सीरत ब्राह्मण की तरह

मुंशी जी ब्राह्मण थे, लेकिन हर मज़हब की इज़्ज़त करते थे। लंबा कद, चेहरे पर सफेद दाढ़ी, उनका हुलिया देखकर बड़े-बड़े पंडित भी धोखा खा जाते थे। ज़्यादातर लोग समझते कि ये कोई मुसलमान बुज़ुर्ग हैं। यही वो ख़ूबी थी जिसने उन्हें सिर्फ एक प्रकाशक नहीं, बल्कि हिंदुस्तानी गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक बना दिया।

वो प्रेस जिसने कुरान को पाकियत दी

कहा जाता है कि उत्तर भारत में मुंशी नवल किशोर (Munshi Nawal Kishore) ने ही पहली बार कुरान को कई भाषाओं में छापा। जब कुरान के जिल्द बांधने वाले कारीगर आते, तो मुंशी जी उनसे पहले ‘वज़ू’ (अब्देस्ट) करने को कहते थे। बिना तहारत के कुरान की जिल्द छूने की इजाज़त नहीं थी। ये सिर्फ एक प्रेस नहीं, बल्कि इबादत की जगह थी।

ईरान से दिल्ली तक : एक धुन

1888 में शाह ईरान ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था, ‘मेरे हिंदुस्तान आने के सिर्फ दो मकसद हैं-पहला वायसराय से मिलना, दूसरा मुंशी नवल किशोर से मिलना।’ 1992 में ईरान के प्रोफेसर तवकोली तरगी लखनऊ आए और उन्होंने लिखा, ‘पुरानी दिल्ली के एक जिल्दसाज़ ने बताया कि मुंशी जी के यहां कुरान की छपाई में ऐसी सफाई रखी जाती थी, जैसे कोई ज़रूरी इबादत हो।’

मुसीबत की घड़ी में मुसीबत-ए-हिंद

1857 की नाकाम कोशिश के बाद अंग्रेजों ने मुसलमानों को सबसे बड़ा ‘बगावती’ करार दिया। उनकी नौकरियां छीन ली गईं, तालीम पर पाबंदी लगा दी गई। दिल्ली के एंग्लो-इंडियन प्रेस ने मुसलमानों की वफादारी पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए। ऐसे में जब पूरी इस्लामिक तहज़ीब बिखरने लगी, तब मुंशी नवल किशोर ने आगे बढ़कर कुरान, हदीस, फिक्ह, सूफियाना साहित्य को उर्दू, अरबी, फारसी में छापा। उन्होंने इस्लामी साहित्य को मिटने से बचा लिया।

Munshi Nawal Kishore (Image-wikipedia)

कैक्सटन नहीं, वो भारत के ‘मुंशी’ थे

जिस तरह इंग्लैंड में विलियम कैक्सटन (William Caxton) ने छपाई की शुरुआत की, उसी तरह हिंदुस्तान में मुंशी नवल किशोर ने सस्ती और अच्छी किताबों का दौर लाया। उन्होंने 1858 में सिर्फ़ एक हैंडप्रेस और कुछ लिथो पत्थरों से शुरुआत की। और फिर क्या था, 5000 से ज़्यादा किताबें, अरबी, बांग्ला, संस्कृत, हिंदी, फारसी, पश्तो, उर्दू में छापीं। रामायण, महाभारत, गीता के साथ कुरान भी। यही उनकी सबसे बड़ी ख़ासियत थी, ‘अदब के दरिया को किसी धर्म के बंधन में नहीं बांधा।’

ग़ालिब से अब्दुर रहमान तक, सब थे दीवाने

फारसी के शायर ग़ालिब ने कहा था,  ‘जिसका दीवान मुंशी नवल किशोर ने छापा, उसका नाम आसमान पर चढ़ गया।’

किंग अब्दुर रहमान अफगानिस्तान ने वायसराय लॉर्ड डफरिन के सामने कहा था, ‘मुझे खुशी है कि मैंने आपको देखा। हिंदुस्तान में आपसे मिलने से बढ़कर कोई खुशी नहीं।’

कांग्रेस के संस्थापकों में शुमार

मुंशी जी सिर्फ प्रकाशक ही नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी भी थे। 1885 में जब कांग्रेस की नींव रखी गई, तो वो उन चुनिंदा लोगों में शामिल थे जिन्होंने ह्यूम और सुरेंद्रनाथ बनर्जी के साथ मिलकर भारत के स्वाभिमान की बात की।

जाति से ब्राह्मण, लेकिन कर्म से इंसान

अमीर हसन नूरानी ने अपनी किताब में लिखा-‘जैसे ही आप ‘नवल किशोर प्रेस’ का नाम लेते हैं, हज़ारों किताबों की ख़ुशबू दिल को भर देती है।’

आज़िज़ अहमद ने कहा- ‘अगर सर सैयद और मुंशी नवल किशोर नहीं होते, तो 1857 के बाद हमारी सांस्कृतिक विरासत हमेशा के लिए खत्म हो जाती।’

Munshi Nawal Kishore marg Lucknow (Image-wikipedia)

आज हम जब भारत के गंगा-जमुनी तहज़ीब की बात करते हैं, तो मुंशी नवल किशोर का नाम उतना ही अदब से लेना चाहिए, जितनी पाकिज़गी से वो कुरान की जिल्द बांधने से पहले वज़ू करते थे। वो ब्राह्मण थे, लेकिन उनके हाथों ने लाहौर से लेकर ईरान तक की मुस्लिम तहज़ीब को नई जिंदगी दी। 59 साल की उम्र में उनका सफ़र ख़त्म हुआ, लेकिन उनके प्रेस ने जो मुहब्बत छापी, वो आज भी हर दीवार पर नज़र आती है।

‘हो सके तो आज किसी किताब की तहज़ीब पढ़िए,उसमें मुंशी जी की दाढ़ी की सफेदी, और उनके दिल की नेकी ज़रूर दिखेगी।’

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