DNN24 के Diverse Dialogue Podcast में इस बार बातचीत हुई AVM Hilal Ahmed Rather (Retd) से। ये सिर्फ एक इंटरव्यू नहीं, बल्कि एक फाइटर पायलट की दुनिया के अंदर झांकने का मौक़ा था। ऐसी दुनिया, जहां हर सेकंड की कीमत होती है, जहां एक छोटी सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है, और जहां आसमान में उड़ना सिर्फ नौकरी नहीं बल्कि जुनून होता है।
एयर वाइस मार्शल रादर ने इस बातचीत में राफेल डील, सोर्स कोड, फाइटर पायलट्स की ट्रेनिंग, डॉगफाइट, कॉकपिट का स्ट्रैस और अपने सफ़र की कई अहम बातें बताई। जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग ज़िले से भारतीय वायुसेना (air force) तक का उनका सफ़र सिर्फ एक अफ़सर की कहानी नहीं, बल्कि हिम्मत और मुल्क़ से मोहब्बत की दास्तान है।
“सोर्स कोड” आख़िर होता क्या है?
राफेल डील को लेकर अक्सर “सोर्स कोड” की चर्चा होती रही है। इस पर बात करते हुए उन्होंने ने DNN24 को बताया कि जैसे Coca-Cola या KFC अपनी सीक्रेट रेसिपी किसी को नहीं बताते, वैसे ही कोई भी डिफेंस कंपनी अपने फाइटर एयरक्राफ्ट का पूरा सोर्स कोड शेयर नहीं करती। उन्होंने बताया कि मार्डन फाइटर एयरक्राफ्ट लाखों लाइनों की कोडिंग से चलते हैं। इन्हें बनाने में 20–30 साल की रिसर्च की ज़रूरत होती है।

ऐसे में कोई भी कंपनी अपनी पूरी टेक्नोलॉजी किसी दूसरे मुल्क़ को नहीं देगी, क्योंकि वही उसकी सबसे बड़ी ताक़त होती है। हालांकि इसका मतलब ये नहीं कि बिना सोर्स कोड के विमान इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। भारत अपने हथियार जैसे अस्त्र मिसाइल या ब्रह्मोस इन विमानों में जोड़ सकता है। इसके लिए पूरा “राज़” जानना ज़रूरी नहीं होता। कंपनियां integration protocols देती हैं, जिनकी मदद से नए सिस्टम और हथियार जोड़े जा सकते हैं। उन्होंने साफ कहा कि अगर हर चीज़ में “पूरा सोर्स कोड” मांगना शुरू कर दिया जाए, तो कोई भी देश या कंपनी डील करने को तैयार नहीं होगी। ये Intellectual Property Rights यानी IPR का मामला भी होता है।
आज की दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर बहुत अहम हो चुका है। पहले जहाज ओपन फ्रीक्वेंसी पर बात करते थे, जिन्हें आसानी से जैम किया जा सकता था। लेकिन अब बातचीत एनक्रिप्टेड तरीके से होती है, बिल्कुल WhatsApp की encrypted chats की तरह। जहाजों में लगे रेडियो सेट भी कोडेड लैंग्वेज में काम करते हैं।
ये एक ख़ास प्रोटोकॉल होता है, जो नेशनल सॉवरेनिटी के लिए बेहद ज़रूरी है, ताकि किसी दूसरे देश को पता न चले कि हमारे विमान आपस में क्या बात कर रहे हैं। इन सब चीजों को बिना पूरा सोर्स कोड दिए भी किया जा सकता है। कंपनियां integration protocol देती हैं, जिसकी मदद से देश अपने हथियार और सिस्टम विमान में जोड़ सकता है, बिना कंपनी के पूरे “राज़” जाने।
राफेल डील और भारतीय वायुसेना की बदलती ताकत
वो बताते हैं कि भारतीय वायुसेना (air force) के पास पहले से 36 राफेल हैं और 26 राफेल नेवी के लिए आने वाले हैं, यानी कुल 62 राफेल भारत की ताकत बन चुके होंगे। ऐसे में और राफेल लेने से रखरखाव, ट्रेनिंग और वेपन सिस्टम का मौजूदा इंफ्रास्ट्रक्चर बेहतर तरीके से इस्तेमाल हो सकेगा।

फ्रांस दशकों से भारत का भरोसेमंद रक्षा साझेदार रहा है और उसके विमान अपनी मज़बूती के लिए जाने जाते हैं। कारगिल युद्ध में Mirage 2000 की परफॉर्मेंस इसका बड़ा उदाहरण है।
हालांकि फ्रेंच विमानों को अक्सर महंगा माना जाता है, लेकिन भारतीय वायुसेना (air force) “cost per flying hour” के आधार पर उनका आकलन करती है। लंबे समय में कई फ्रेंच विमान रूसी विमानों की तुलना में ज़्यादा किफ़ायती साबित होते हैं, क्योंकि वो कम फ्यूल में बेहतर धैर्य और परिचालन दक्षता (operational efficiency) देते हैं।
क्यों बनी राफेल भारतीय वायुसेना की पहली पसंद?
दशकों तक भारतीय वायुसेना (air force) रूसी एयरक्राफ्ट पर निर्भर रही, लेकिन 1985 में मिराज 2000 के आने के बाद तस्वीर बदलनी शुरू हुई। कारगिल युद्ध में मिराज 2000 के शानदार प्रदर्शन ने फ्रेंच विमानों पर भरोसा और मज़बूत किया। इसके बाद 2016 में भारतीय वायुसेना (air force) ने राफेल को चुना, जबकि मुकाबले में अमेरिका के F-16 और F-15, रूस के MiG-29 और स्वीडन के Gripen जैसे बड़े नाम शामिल थे। भारतीय वायुसेना (air force) ने करीब 4–6 साल तक अलग-अलग मौसम और हालात में इन विमानों का गहराई से आंकलन (evaluation) किया।
लेह की ऊंचाई, रेगिस्तान की गर्मी और मुश्किल ऑपरेशनल परिस्थितियों में राफेल सबसे बेहतर साबित हुआ। भारतीय वायुसेना (air force) ने सिर्फ खरीद की कीमत नहीं देखी, बल्कि रखरखाव, सर्विसिंग और लंबे समय की ऑपरेशनल कॉस्ट यानी “life cycle costing” को भी ध्यान में रखा। राफेल की रखरखाव दक्षता (maintenance efficiency) इतनी बेहतर मानी जाती है कि इसका इंजन दो लोग कुछ घंटों में बदल सकते हैं, जबकि कुछ दूसरे विमानों में यही काम कई दिन ले सकता है। इसके अलावा इसका electronic warfare system दुनिया के सबसे मॉडर्न सिस्टम में गिना जाता है। यही वजह थी कि राफेल का चयन प्रोफ़ेेशनल और तकनीकी आंकलन के बेसिस पर किया गया।

मिग-21 को लेकर गलतफहमियां
मिग-21 को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। इस पर AVM Hilal Ahmed Rather (Retd) ने कहा कि एक दौर में भारतीय वायुसेना (air force) के पास 500 से ज़्यादा मिग-21 थे। जब सबसे ज़्यादा विमान वही थे, तो हादसे भी उसी के ज़्यादा दिखाई देते थे। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा—अगर सड़क पर सबसे ज्यादा मारूती गाड़ियां होंगी, तो एक्सीडेंट में वही ज़्यादा नज़र आएंगी।
मिग-21 सिंगल-इंजन एयरक्राफ्ट था। अगर उसका इंजन फेल हो जाए, तो पायलट के पास इजेक्ट करने के अलावा ज़्यादा ऑप्शन नहीं बचते थे। वहीं दो इंजन वाले विमान एक इंजन खराब होने पर भी सुरक्षित उतर सकते हैं। उन्होंने ये भी कहा कि भारतीय वायुसेना (air force) की रखरखाव प्रैक्टिस हमेशा बेहद प्रोफ़ेशनल रही हैं। हालांकि कुछ मामलों में क्वालिटी कंट्रोल की कमियां सामने आई थी, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि टेक्नीशियंस लापरवाह थे।
कॉकपिट के अंदर कैसी होती है दुनिया?
AVM Hilal Ahmed Rather (Retd) ने बताया कि फाइटर फ्लाइंग दुनिया के सबसे खतरनाक प्रोफेशन में गिनी जाती है। एक फाइटर एयरक्राफ्ट 800–900 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ता है। यानी लगभग 250 मीटर प्रति सेकंड। कई बार विमान ज़मीन से सिर्फ 50–100 मीटर ऊपर होता है। ऐसे में अगर एक सेकंड के लिए भी ध्यान भटका, तो हादसा तय है। उन्होंने कहा कि फाइटर पायलट को सिर्फ 100% नहीं, बल्कि 200% तैयार होना चाहिए।
अगर किसी पायलट के दिमाग में किसी भी तरह का स्ट्रेस है, तो उसे उड़ान नहीं भरनी चाहिए। एयरफोर्स में पायलट्स को हमेशा सिखाया जाता है कि कॉकपिट की canopy बंद करने से पहले खुद से पूछो—“क्या मैं इस मिशन के लिए पूरी तरह तैयार हूं?” अगर जवाब “हां” है, तभी उड़ान भरे।

डॉगफाइट: आसमान में मौत के इतने करीब
उन्होंने डॉगफाइट को भी बेहद आसान भाषा में समझाया। कई बार दो फाइटर जैट करीब 900 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से एक-दूसरे की तरफ आते हैं और सिर्फ 300 मीटर की दूरी से क्रॉस करते हैं। ऐसे में पहले से तय करना पड़ता है कि कौन ऊपर जाएगा और कौन नीचे। ज़रा सी गलती टक्कर में बदल सकती है। उन्होंने कहा कि शायद ही कोई ऐसा फाइटर पायलट होगा जिसकी ज़िंदगी में कभी ऐसा पल न आया हो, जब split-second reaction ने उसकी जान बचाई हो।
एक बड़ा मिथ तोड़ते हुए उन्होंने कहा कि फाइटर पायलट आम इंसान होते हैं। लेकिन एक चीज़ जरूरी होती है -“जंगजू सोच”। उनके मुताबिक अगर किसी इंसान में सरवाइव करने की इच्छा और मुश्किल हालात में लड़ने का जज़्बा नहीं है, तो उसे फाइटर फ्लाइंग में मज़ा नहीं आएगा। उन्होंने कहा कि ये सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि पैशन है। कई पायलट तो ये मानते हैं कि अगर तनख्वाह भी न मिले, तब भी वो उड़ान भरना चाहेंगे।
“Heli” नाम की दिलचस्प कहानी
AVM Hilal Ahmed Rather (Retd) का निकनेम “Heli” कैसे पड़ा, इसकी कहानी भी मज़ेदार है। उन्होंने बताया कि भारतीय वायुसेना (air force) में हर पायलट का एक निकनेम होता है। उनके सिनियर्स ने मज़ाक में कहा था कि जैसे “Halley’s Comet” 86 साल में एक बार आता है। बस तभी से उनका नाम “Heli” पड़ गया।
धर्म के सवाल पर उनका जवाब बेहद साफ था। उन्होंने कहा कि भारतीय वायुसेना (air force) में उन्होंने कभी भेदभाव महसूस नहीं किया। ईद हो, होली हो या गुरुपर्व सब मिलकर मनाते हैं। एयरफोर्स में लोग धर्म से नहीं, बल्कि अपने साथी और दोस्त के रूप में एक-दूसरे को देखते हैं। उन्होंने इजराइल का एक किस्सा भी सुनाया। वहां एयरपोर्ट पर उनसे अलग पूछताछ की जा रही थी।
राफेल और दशहरे का शस्त्र पूजन
राफेल की पहली इंस्टॉलमेंट के हैंडओवर के दौरान फ्रांस में दशहरे के दिन शस्त्र पूजन भी हुआ था। उन्होंने बताया कि रात में अचानक पूजा की तैयारी करनी थी और फूल, नारियल जैसी चीजें जुटानी थी। उनके फ्रांसीसी दोस्तों ने पूरी मदद की और अगले दिन सारी तैयारी हो चुकी थी। उनके मुताबिक भारत और फ्रांस की strategic partnership सिर्फ डिफेंस डील नहीं, बल्कि भरोसे का रिश्ता भी है।
अनंतनाग से एयरफोर्स तक
AVM Hilal Ahmed Rather (Retd) अनंतनाग से आते हैं। उन्होंने बताया कि शायद वो भारतीय वायुसेना (air force) के पहले कश्मीरी मुस्लिम फाइटर पायलट रहे। उनके पिता भारतीय सेना के शुरुआती कश्मीरी मुस्लिम अधिकारियों में से एक थे और वही उन्हें एयरफोर्स में जाने के लिए मोटिवेट करते थे। लेकिन 1989 के बाद कश्मीर के हालात बदल गए। जब वो पहली बार फाइटर पायलट बनकर यूनिफॉर्म में घर पहुंचे, तो परिवार ने डरते हुए पूछा “किसी ने तुम्हें देखा तो नहीं?”

हालात इतने खराब थे कि बाद में उन्होंने कभी खुलकर कश्मीर में यूनिफॉर्म नहीं पहनी। उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें अगवा करने की योजना की ख़बर भी मिली थी, जिसके बाद उन्हें तुरंत घाटी छोड़नी पड़ी। यहां तक कि उनकी मां ने उनसे कहा था – “जब मैं मरूं, तब भी यहां मत आना।”
इतने मुश्किल हालात देखने के बावजूद उन्होंने भारतीय वायुसेना (air force) नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि उन्हें हमेशा लगता था कि वो सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपनी कौम और अपने मुल्क़ का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। दुनिया के कई देशों में पोस्टिंग, अमेरिका और फ्रांस में काम करने और अलग-अलग अनुभवों के बाद भी उनका एक ही जवाब था – “अगर मुझे सौ जन्म भी मिलें, तो मैं हर बार एयरफोर्स ही चुनूंगा।”
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