एक ज़माने में कानपुर की सड़कों पर अंग्रेजों की तोपों की दहाड़ सुनाई देती थी। लेकिन उनकी फौज में सबसे बड़ी कमी थी, मज़बूत बूट्स की। उनकी नज़र पड़ी गंगा के किनारे बसे जाजमऊ पर, जहां के कारीगर सदियों से चमड़ा रंगने का फ़न जानते थे। सन् 1900 के आसपास अंग्रेजों ने यहां पहली टैनरी स्थापित की। पहले सिर्फ फौज के लिए, फिर धीरे-धीरे ये काम बढ़ता गया और आज यही जाजमऊ एशिया का सबसे बड़ा टैनरी हब (Tannery Hub) बन चुका है। कानपुर में अब 400 से ज़्यादा लेदर यूनिट्स काम कर रही हैं और ये शहर पूरी दुनिया में ‘India’s Leather Capital’ के नाम से जाना जाता है।

कानपुर के जाजमऊ की ख़ासियत
जब आप जाजमऊ में कदम रखेंगे तो चमड़े की खुशबू हवा में घुली मिलेगी। ये इलाका सिर्फ एक कारखाना नहीं, बल्कि एक पूरा एकोसिस्टम है। यहां कच्चे चमड़े को रंगने से लेकर उसे फिनिश करके तैयार जूता बनाने तक का पूरा सफर एक ही जगह पर होता है। यही वजह है कि भारत का 70 फीसदी से ज्यादा Finished Leather Footwear कानपुर से तैयार होता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद से लोग चमड़ा लेकर यहां आते हैं, क्योंकि जाजमऊ के कारीगरों का हाथ और उनकी महारत दुनिया में कहीं नहीं मिलती।

कानपुर दुनिया में दूसरे नंबर पर
बहुत कम लोग जानते हैं कि Indian Footwear Component Manufacturers Association के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, घरेलू जूते निर्यात करने के मामले में कानपुर पूरी दुनिया में दूसरे नंबर पर है। पहले नंबर पर चीन है। हां, चीन उस क्षेत्र में अभी भी आगे है, लेकिन कानपुर तेजी से उसका पीछा कर रहा है। ख़ास बात ये है कि कानपुर के जूते अपनी मज़बूती, सादगी और लंबे समय तक चलने के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं। यूरोप के बाज़ारों में कानपुर के जूतों को इटली जैसी फिनिशिंग वाला बताया जाता है, लेकिन कीमत उससे आधी होती है।

Red Chief- गरीबी से उठकर 324 करोड़ तक का सफ़र
कानपुर ने कुछ ऐसे ब्रांड भी दिए हैं जिनका नाम आज पूरे देश में गूंजता है। सबसे पहली कहानी रेड चीफ की। मनोज ज्ञानचंदानी ने महज 20 साल की उम्र में एक्सपोर्ट बिजनेस शुरू किया था। दो साल बाद उन्होंने महसूस किया कि Indian Footwear Market असंगठित है और यहां अपना ब्रांड बनाने की जबरदस्त गुंजाइश है। 1997 में उन्होंने रेड चीफ लॉन्च किया। आज ये ब्रांड 16 राज्यों में 175 से ज्यादा एक्सक्लूसिव स्टोर और 3000 से अधिक मल्टी-ब्रांड आउटलेट्स में मौजूद है। उत्तर भारत में तो रेड चीफ का पूरा दबदबा है। कंपनी का सालाना कारोबार 324 करोड़ रुपये से ज़्यादा है। रेड चीफ ने साबित कर दिया कि देसी ब्रांड भी ग्लोबल बन सकता है।

RedTape-जब कानपुर के जूते लंदन के स्टूडियो में डिज़ाइन होने लगे
फिर आता है रेडटेप। 1996 में कानपुर के मिर्जा इंटरनेशनल ने इस ब्रांड को जन्म दिया। रशीद अहमद मिर्जा और इरशाद मिर्जा ने एक ऐसा सपना देखा जो उन दिनों किसी को पागलपन लगता था। उन्होंने तय किया कि पहले अपने जूते इंग्लैंड में बेचेंगे, उसके बाद भारत में। और ऐसा ही हुआ। लंदन के बाज़ारों में रेडटेप के जूतों ने धूम मचा दी। आज रेडटेप सिर्फ जूतों तक सीमित नहीं है। ये एक पूरा लाइफस्टाइल ब्रांड है। यहां कपड़े, बेल्ट, वॉलेट, परफ्यूम और भी बहुत कुछ मिलता है। रेडटेप के जूते ब्रिटेन के डिज़ाइन स्टूडियो में डिज़ाइन किए जाते हैं लेकिन बनते हैं कानपुर में। आराम, स्टाइल और क्वालिटी का तो ये ब्रांड मिसाल है।

Euro Footwear- जब घुड़सवारी के जूते बनाने वाला कानपुर दुनिया में अग्रणी बन गया
यूरो फुटवियर कानपुर का ही एक और गहना है। इसकी स्थापना 1988 में हुई थी और इसके मैनेजिंग डायरेक्टर महबूब रहमान हैं। ये कंपनी लेदर के जूते, सेफ्टी बूट्स और राइडिंग बूट्स बनाने में माहिर है। यूरो फुटवियर ने घुड़सवारी के जूतों के क्षेत्र में दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाई है। वेस्टर्न बूट्स और इंग्लिश राइडिंग बूट्स के मामले में ये कंपनी दुनिया के Leading Manufacturers में गिनी जाती है। यूरो फुटवियर कानपुर और उन्नाव में अपनी फैक्ट्रियां चलाता है और यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया को अपने प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट करता है। इनका मानना है कि वे सिर्फ जूते नहीं बनाते, बल्कि ग्राहकों का भरोसा और कम्फर्ट बनाते हैं।

भारत के अलावा किन देशों में जाता है कानपुर का चमड़ा?
:-भारत आज कई देशों के साथ चमड़े का व्यापार करता है। जर्मनी को सबसे ज्यादा सेफ्टी बूट्स जाते हैं, क्योंकि वहां की फैक्ट्रियों में इसकी बहुत मांग है।
:-इटली फिनिश्ड लेदर खरीदता है और फिर उसे अपने महंगे लक्जरी ब्रांड्स में बदल देता है।
:-ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, स्पेन, ऑस्ट्रेलिया और यूएई भी भारत से लेदर प्रोडक्ट्स खरीदने वाले बड़े देश हैं।
कानपुर यानी भारत इस पूरे एक्सपोर्ट का एक बहुत बड़ा हिस्सा अकेले पूरा करता है। अगर देखा जाए तो दुनिया में चीन, ब्राज़ील, इटली, वियतनाम और बांग्लादेश भी बड़े लेदर कारोबारी देश हैं, लेकिन भारत की खासियत है उसके कारीगरों का हुनर और कम लागत में अच्छी क्वालिटी देना।

सिर्फ लेदर ही नहीं, कानपुर की दूसरी ताकतें
कानपुर सिर्फ चमड़े से ही नहीं चलता। यहां टेक्सटाइल की भी बड़ी इंडस्ट्री है। एक जमाने में कानपुर को ‘The Manchester of the East’ कहा जाता था। केमिकल की फैक्ट्रियां भी यहां खूब हैं, जो टैनरी के लिए चमड़ा रंगने का सामान बनाती हैं। पैकेजिंग यूनिट्स एक्सपोर्ट के लिए बॉक्स और क्रेट तैयार करती हैं, और मशीनरी बनाने वाली फैक्ट्रियाँ जूता निर्माण के टूल बनाती हैं। यानी कानपुर में एक उद्योग दूसरे उद्योग को जन्म देता है और मजबूती प्रदान करता है। यही वजह है कि कानपुर सिर्फ एक शहर नहीं, बल्किपूरे उत्तर भारत का औद्योगिक दिल (The industrial heart of entire North India) है।

लेदर उद्योग से सीख
कानपुर के इस लेदर उद्योग की कहानी हमें बहुत कुछ सिखाती है। जो चीज़ कभी बेकार समझी जाती थी, मरे जानवरों की खाल। आज उसी से हजारों परिवारों की रोज़ी चल रही है। ये सफर हमें बताता है कि भरोसा रखो, क्वालिटी कभी मत छोड़ो, देसी चीज़ें भी ग्लोबल बन सकती हैं और सबसे ज़रूरी बात, अपने कारीगरों की कद्र करो, क्योंकि उन्हीं के हाथों में हमारी तकदीर बसती है। कानपुर को इस इंडस्ट्री को बनने में 125 साल से ज्यादा का वक्त लगा है, लेकिन आज वो मुकाम हासिल कर लिया है जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

‘Made in Kanpur’ – आपसे एक गुज़ारिश
तो अगली बार जब आप लेदर का कोई जूता या बैग खरीदें, तो ज़रा उसके लेबल पर नज़र डालिए। अगर वहां लिखा हो ‘Made in Kanpur’ तो समझ लीजिए कि उस एक चीज़ में इतिहास है, मेहनत है, कारीगरों का पसीना है और एक पूरे शहर का दिल धड़कता है। कानपुर सिर्फ एक शहर नहीं है, ये एक जज़्बात है। चमड़े की महक में लिपटा हुआ एक ऐसा सपना जो अब हकीकत बन चुका है। ये कहानी है कानपुर की, ये कहानी है भारतीय लेदर इंडस्ट्री की, और ये कहानी हर उस देसी उद्यमी के लिए प्रेरणा है जो कुछ बड़ा करना चाहता है।
ये भी पढ़ें: ‘दक्षिणी तहज़ीब’ का चेहरा और केरल की सांस्कृतिक ‘पहचान’ हैं कासरगोड की हथकरघा साड़ियां
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।


