उर्दू अदब और हिंदुस्तान की तालीमी तारीख़ में कुछ नाम ऐसे हैं, जो ख़ामोशी से काम करते हुए भी एक पूरी सदी को रौशन कर देते हैं। ऐसा ही एक नाम है वहीद जहां बेग़म—जिन्हें उनके चाहने वाले प्यार से “अला बी” यानी मां कहते थे। उनका सफ़र सिर्फ़ एक शख़्स की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर की दास्तान है, जब औरतों की तालीम एक ख़्वाब मानी जाती थी।
वहीद जहां बेग़म की पैदाइश 1884 में दिल्ली के एक ज़मींदार घराने में हुयी। उस दौर में लड़कियों की पढ़ाई आम बात नहीं थी, लेकिन उनके वालिद मिर्ज़ा मोहम्मद इब्राहिम बेग ने अपनी बेटी की तालीम पर ख़ास तवज्जोह दी। उन्होंने उन्हें उर्दू, फ़ारसी, थोड़ी अंग्रेज़ी और हिसाब-किताब सिखाया।
बचपन से ही वहीद जहां के दिल में तालीम का शौक था। वो अपने आस-पास के बच्चों औऱ लड़कियों को इकट्ठा करके पढ़ाती थीं। ये उनका पहला “छोटा सा स्कूल” था, जिसने आगे चलकर एक बड़े मिशन की शक्ल ली।

निकाह और एक नया मिशन
वहीद जहां की शादी कश्मीरी वकील और अलीगढ़ आंदोलन के अहम रहनुमा शेख अब्दुल्ला से हुई। ये निकाह सिर्फ़ दो लोगों का मिलन नहीं था, बल्कि एक ऐसे मिशन की शुरुआत थी, जिसने हिंदुस्तान में मुस्लिम औरतों की तालीम का नक्शा बदल दिया।
उस वक़्त अलीगढ़ आंदोलन मुस्लिम समाज में आधुनिक तालीम को बढ़ावा दे रहा था, लेकिन औरतों की पढ़ाई को लेकर अभी भी हिचकिचाहट थी। ऐसे में वहीद जहां बेग़म ने अपने शौहर का हौसला बढ़ाया और दोनों ने मिलकर तय किया कि औरतों की तालीम के बिना समाज तरक़्क़ी नहीं कर सकता।
“ख़ातून” मैगज़ीन: जागरूकता की आवाज़
1904 में दोनों ने मिलकर उर्दू की एक मैगज़ीन “ख़ातून” शुरू की। इसका मक़सद था औरतों में तालीम के प्रति जागरूकता पैदा करना। वहीद जहां बेग़म इसकी एडिटर बनीं और 1914 तक इस ज़िम्मेदारी को निभाया।
इस मैगज़ीन के ज़रिए उन्होंने समाज को ये समझाने की कोशिश की कि औरतों की तालीम कोई गुनाह नहीं, बल्कि तरक्की की पहली सीढ़ी है। उस दौर में ये एक बहुत बड़ा और बहादुर कदम था।
एक ख़्वाब की शुरुआत अलीगढ़ गर्ल्स स्कूल
1906 में अलीगढ़ में एक किराए के मकान में सिर्फ़ 5 लड़कियों के साथ एक छोटा सा स्कूल शुरू हुआ जिसे ज़नाना मदरसा कहा गया। यही स्कूल आगे चलकर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का महिला कॉलेज बना।
इस स्कूल में कुरान, उर्दू, गणित और सिलाई-कढ़ाई सिखाई जाती थी। शुरुआत आसान नहीं थी समाज के कई लोग इसके ख़िलाफ़ थे। उन्हें डर था कि लड़कियों की पढ़ाई से परंपराएं टूट जाएंगी। लेकिन वहीद जहां बेग़म ने हार नहीं मानी।

जद्दोजहद और सब्र की मिसाल
स्कूल तक लड़कियों को लाने के लिए पर्दे वाली पालकियों का इस्तेमाल किया जाता था, ताकि समाज की एतराज़ कम हो सके। खुद वहीद जहां बेग़म हॉस्टल में रहने लगीं और 25 साल तक छात्राओं की एक मां की तरह देखभाल करती रहीं।
छात्र उन्हें “अला बी” कहकर बुलाते थे क्योंकि वो सिर्फ़ टीचर नहीं, बल्कि एक सच्ची मार्गदर्शक और संरक्षक थीं।
रास्ता आसान नहीं था। लड़कियों को स्कूल जाते वक़्त छेड़छाड़ का सामना करना पड़ता, अफ़वाहें उड़ाई जातीं, और कई परिवार अपनी बेटियों को पढ़ने नहीं भेजते थे। लेकिन हर मुश्किल के बावजूद, वहीद जहां बेग़म और शेख अब्दुल्ला डटे रहे।
एक तालीमी इंक़लाब
1911 में स्कूल के लिए नया भवन बना और धीरे-धीरे यह संस्थान बढ़ता गया। 1925 में यह हाई स्कूल बना और 1937 में डिग्री कॉलेज का दर्जा मिला।
यह सिर्फ़ एक स्कूल नहीं था यह एक तालीमी इंक़लाब था, जिसने मुस्लिम औरतों को एक नई पहचान दी।
निजी ज़िंदगी और विरासत
वहीद जहां बेग़म के छह बच्चे थे पांच बेटियां और एक बेटा। उनकी बेटी राशिद जहां उर्दू की मशहूर लेखिका और प्रगतिशील लेखक आंदोलन की अहम शख़्सियत बनीं। उनकी दूसरी बेटी खुर्शीद मिर्ज़ा हिंदी सिनेमा की जानी-मानी अभिनेत्री रहीं, जबकि मुमताज़ जहाम और ख़ीतून जहां ने महिला कॉलेज की प्रिंसिपल के रूप में सेवा दी।

यानी तालीम की जो शमा वहीद जहां बेग़म ने जलाई, वह उनकी अगली नस्लों में भी रौशन होती रही।
आज के दौर में अहमियत
आज जब हम लड़कियों की पढ़ाई को एक हक मानते हैं, तो यह समझना ज़रूरी है कि यह हक आसानी से नहीं मिला। इसके पीछे वहीद जहां बेग़म जैसी बहादुर औरतों की कुर्बानी और मेहनत है।
तालीम सिर्फ़ किताबों का ज्ञान नहीं देती, बल्कि औरतों को आत्मनिर्भर बनाती है उन्हें अपने फैसले खुद लेने की ताकत देती है।
आख़िरी सफ़र और यादें
18 अगस्त 1939 को वहीद जहां बेग़म का इंतकाल हो गया। लेकिन उनके जाने तक उनका लगाया हुआ पौधा एक बड़े दरख़्त में बदल चुका था।
आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का महिला कॉलेज उनकी मेहनत और दूरदर्शिता की जिंदा मिसाल है। वहीद जहां बेग़म की ज़िंदगी हमें ये सिखाती है कि अगर नीयत साफ हो और हौसला मज़बूत, तो हालात चाहे जैसे भी हों बदलाव ज़रूर आता है।
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