उर्दू अदब की तारीख़ में कुछ ऐसे शायर भी गुज़रे हैं, जो सिर्फ़ अपने कलाम तक महदूद नहीं रहे, बल्कि एक पूरे दौर की पहचान बन गए। उन्हीं में से एक अहम नाम है मोहम्मद मिर्ज़ा रज़ा ‘बर्क़’, जो अवध के आख़िरी बादशाह वाजिद अली शाह अख़्तर के उस्ताद-ए-सुख़न (शायरी के गुरु) थे। बर्क़ का रिश्ता बादशाह से सिर्फ़ उस्ताद और शागिर्द का नहीं था, बल्कि इसमें गहरी मोहब्बत और वफ़ादारी भी शामिल थी।
जब 1856 में अंग्रेज़ हुकूमत ने अवध को अपने क़ब्ज़े में लिया और वाजिद अली शाह को कलकत्ता के फ़ोर्ट विलियम में नज़रबंद किया गया, तो उस मुश्किल वक़्त में भी बर्क़ अपने उस्ताद के साथ रहे। यह वफ़ा का वो मंज़र है जो आज भी अदब की दुनिया में मिसाल बनकर याद किया जाता है। लेकिन वहीं रहते हुए बर्क़ बीमार पड़ गए और 1857 में उनका इंतक़ाल हो गया।
बर्क़ का फ़न लखनऊ स्कूल-ए-शायरी की ख़ूबसूरती को पूरी तरह समेटे हुए था। उन्होंने अपने उस्ताद इमाम बख़्श नासिख की रिवायत को आगे बढ़ाया, ख़ास तौर पर तश्बीह के इस्तेमाल में उनकी महारत क़ाबिल-ए-तारीफ़ थी। उनकी शायरी में लखनऊ की नज़ाकत, नफ़ासत और इश्क़ की लतीफ़ अदा साफ़ झलकती है।
बर्क़ ने ग़ज़ल के मैदान में कमाल हासिल किया, लेकिन सिर्फ़ ग़ज़ल तक ही महदूद नहीं रहे। उन्होंने रुबाई, क़ता और मुख़म्मस जैसी दूसरी शायरी की सूरतों में भी अपनी क़लम आज़माई। इसके अलावा ‘शहर-ए-आशोब’ और ‘वसुख़्त’ जैसी रचनाएं भी उनकी तख़्लीक़ी क़ाबिलियत का सबूत हैं। उनका दीवान (शायरी का संग्रह) 1852 में “मतबा-ए-सुल्तानी” से शाया हुआ, जो उस दौर में उनकी मक़बूलियत का बड़ा सुबूत था।
बर्क़ के कई शागिर्द भी थे, जिनमें सैयद ज़मीन अली ‘जलाल’, शेख़ अमान अली ‘सहर’ और हादी अली ‘अश्क’ जैसे नाम ख़ास तौर पर मशहूर हुए। इससे यह साफ़ होता है कि बर्क़ सिर्फ़ एक अच्छे शायर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन उस्ताद भी थे, जिन्होंने आने वाली नस्लों को अदब का सही रास्ता दिखाया।
उनकी शायरी की बात करें तो उसमें ज़िंदगी की सादगी, तजुर्बा और हक़ीक़त का रंग नज़र आता है। उनकी कुछ मशहूर अशआर आज भी लोगों की ज़ुबान पर हैं.
“हमारे ऐब ने बे-ऐब कर दिया हम को,
यही हुनर है कि कोई हुनर नहीं आता।”
“ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है,
वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।”
यहां बर्क़ तक़दीर और क़िस्मत के उस सच को बयान करते हैं, जिसे कोई बदल नहीं सकता।
“किस तरह मिलें कोई बहाना नहीं मिलता,
हम जा नहीं सकते उन्हें आना नहीं मिलता।”
“दौलत नहीं काम आती जो तक़दीर बुरी हो,
क़ारून को भी अपना ख़ज़ाना नहीं मिलता।”
यह शेर हमें यह सबक देता है कि सिर्फ़ दौलत सब कुछ नहीं होती, अगर मुक़द्दर साथ न दे।
मोहम्मद मिर्ज़ा रज़ा ‘बर्क़’ की शख़्सियत और उनकी शायरी उर्दू अदब की उस रौशन रिवायत का हिस्सा है, जिसमें इश्क़, वफ़ा, फ़लसफ़ा और ज़िंदगी की सच्चाइयां एक साथ नज़र आती हैं। उनकी ज़िंदगी वफ़ादारी की मिसाल है, और उनकी शायरी आज भी दिलों को छूने की ताक़त रखती है।
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