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Sikh Reference Library: क्या अब आधुनिक तकनीक से सहेजा जाएगा सिखों का अनमोल साहित्य?

किसी भी क़ौम की असली पहचान उसकी तारीख़, तहज़ीब और अदब में छिपी होती है। श्री हरमंदिर साहिब परिसर में मौजूद सिख क़ौम के लिए Sikh Reference Library सिर्फ़ एक लाइब्रेरी नहीं, बल्कि एक ऐसा बेशकीमती ख़ज़ाना थी, जहां सदियों की रूहानी और इल्मी विरासत महफ़ूज़ थी। यहां सिख गुरुओं, संतों, भक्तों और आज़ादी के लिए लड़ने वाले बहादुरों की यादें दस्तावेज़ों में ज़िंदा थी। ये वो दौलत थी, जिसकी कीमत किसी भी हीरे-जवाहरात से कहीं ज़्यादा थी। लेकिन साल 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान इस अमानत को जो नुक़सान पहुंचा, वो सिर्फ सिख क़ौम ही नहीं, बल्कि पूरी इंसानियत की साझा विरासत के लिए एक गहरा सदमा था।

इल्म का ख़ज़ाना: लाइब्रेरी की बुनियाद और मक़सद

इस Sikh Reference Library की बुनियाद 8 फरवरी 1946 को शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने रखी थी। इसका मक़सद था सिख मज़हब, तारीख़ और पंजाबी ज़बान से जुड़ी नायाब किताबों और पांडुलिपियों को एक जगह जमा करना, ताकि आने वाली नस्लें अपने अतीत से जुड़ी रह सकें। वक़्त के साथ Sikh Reference Library इल्म का एक बड़ा मरकज़ बन गई, जहां हर दस्तावेज़ अपने अंदर एक कहानी, एक एहसास और एक सबक लिए हुए था।

Pic Credit: Hindustan Times

1984 से पहले: अनमोल धरोहर का समंदर

1984 से पहले Sikh Reference Library में करीब 20,000 दुर्लभ पांडुलिपियां मौजूद थी। इनमें 12,613 किताबें, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के 512 हस्तलिखित स्वरूप, करीब 2,500 दूसरे मज़हबी ग्रंथ, सिख गुरुओं के 20–25 असली हुक्मनामे, और सिख मिसलों से लेकर महाराजा रणजीत सिंह के दौर तक के अहम दस्तावेज़ शामिल थे। ये सब मिलकर एक ऐसी इल्मी दौलत बनाते थे, जो सिर्फ़ सिख क़ौम ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेशकीमती थी।

जून 1984 में जब श्री हरमंदिर साहिब पर फौजी कार्रवाई हुई, तो Sikh Reference Library भी इसकी चपेट में आ गई। गवाहों के मुताबिक, Sikh Reference Library को आग के हवाले कर दिया गया। ये मंज़र इतिहास के उन स्याह पलों की याद दिलाता है, जब नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसे इल्म के बड़े मरकज़ जला दिए गए थे। सदियों का ज्ञान, जो इंसानियत की अमानत था, पल भर में राख बन गया।

इल्मी नुक़सान: एक न भरने वाला ज़ख्म

सिख क़ौम के लिए ये सिर्फ़ इमारत का नुक़सान नहीं था, बल्कि उनकी पहचान और रूहानी विरासत पर गहरा वार था। हाथ से लिखे गए ग्रंथ का नष्ट होना और गुरुओं से जुड़ी यादगार चीज़ों का खो जाना बड़ी बात थी। हाल ही में राज्यसभा सांसद सतनाम सिंह संधू ने इस मसले को संसद में मज़बूती से उठाया। उन्होंने कहा कि 1984 में जो धरोहर तबाह हुई या जब्त हुई, उसे वापस लाना बेहद ज़रूरी है।

Pic Credit: The Better India

उन्होंने मांग की कि सरकारी एजेंसियों के पास मौजूद दस्तावेज़ लौटाए जाएं और जो नुकसान हुआ है, उसे नई तकनीकों की मदद से दुरुस्त किया जाए। उनका कहना था कि Sikh Reference Library सिर्फ एक मज़हबी जगह नहीं, बल्कि भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है।

नई उम्मीद: टेक्नोलॉजी का सहारा

इस मुद्दे पर केंद्रीय संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने भी उम्मीद जगाई। उन्होंने बताया कि सरकार ज्ञान भारतम मिशन के तहत इस दिशा में काम करने को तैयार है। मल्टी-स्पेक्ट्रल इमेजिंग जैसी तकनीक से जले या धुंधले दस्तावेज़ों को फिर से पढ़ा जा सकता है। वहीं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से अधूरे टेक्स्ट को समझकर दोबारा तैयार किया जा सकता है। डिजिटल आर्काइविंग के ज़रिए इस धरोहर को हमेशा के लिए महफ़ूज़ किया जा सकता है।

Pic Credit: Social Media

साझी ज़िम्मेदारी: अतीत को बचाने की कोशिश

ये काम सिर्फ़ सरकार का नहीं, बल्कि सिख क़ौम, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) और पूरे समाज की ज़िम्मेदारी है। 1984 के ज़ख्मों को भरने के लिए ज़रूरी है कि हम अपनी खोई हुई विरासत को वापस लाने की कोशिश करें। अगर आज हमने अपने इतिहास को नहीं संभाला, तो आने वाली नस्लें अपनी जड़ों से दूर हो जाएंगी। ये कहानी सिर्फ एक लाइब्रेरी की नहीं, बल्कि उस एहसास की है, जो एक क़ौम को उसके अतीत से जोड़ता है।

लेख: गुरप्रीत सिंह

इस लेख को पंजाबी और अंग्रज़ी में पढ़ें

ये भी पढ़ें:  कश्मीर की Sir Syed Self Study Centre cum Library क्यों है बाकी लाइब्रेरी से ख़ास? ये रही वजह

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