Monday, April 13, 2026
35.1 C
Delhi

सिल्वर सिटी कटक और तारकासी कला: चांदी के तारों में बसी विरासत की पूरी कहानी

इमेजिन, चांदी का एक ठोस टुकड़ा आग में तपकर इतना महीन और लचीला हो जाए कि उससे बाल से भी पतले तार बनें और फिर वही तार कारीगरों की उंगलियों से नाचते करते हुए पूरे महाभारत की गाथा या कोणार्क चक्र की भव्यता में बदल जाएं। ये कोई जादू नहीं, बल्कि ओडिशा के कटक शहर (The city of Cuttack in Odisha) की 500 साल पुरानी तारकासी कला की शानदार कारीगरी है, जिसने इस ऐतिहासिक नगरी को दुनियाभर में ‘Silver City of India’ के नाम से फेमस किया है।

ओडिया भाषा में ‘तारा’ का अर्थ तार और ‘कासी’ का अर्थ डिजाइन होता है। ये कला कोई साधारण आभूषण निर्माण (Jewelry Making) नहीं, बल्कि चांदी के महीन तारों से रची गई बारीक नक्काशी है जो देखने में लेस की तरह नाज़ुक लगती है । आइए, इसी अनूठी कला और इसके ऐतिहासिक ठिकाने कटक की गहराई में उतरें।

कटक शहर का एक दुर्ग

कटक: एक हजार साल पुरानी विरासत और चांदी की चमक

कटक महज एक शहर नहीं, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक और व्यावसायिक राजधानी है। 989 ईस्वी में केशरी वंश के राजा ने इसे एक सैन्य छावनी के रूप में बसाया था, जिसके चलते इसका प्राचीन नाम ‘कटक’ (किला) पड़ा। महानदी और काठजोड़ी नदियों के संगम पर बसा ये शहर सदियों तक ओडिशा की राजधानी रहा। इसकी ऐतिहासिक गलियां, बाराबाटी किले के अवशेष और 52 बाजार-53 गलियों की भूलभुलैया आज भी इसके गौरवशाली अतीत की गवाह हैं, लेकिन जिस चीज ने कटक को ग्लोबल पहचान दी, वो है इसकी तारकासी कला  (Tarakashi Art)।

Image Courtesy- Government of Odisha

क्या है तारकासी कला?

तारकासी पूरी तरह से हाथ की बनी कारीगरी है, जिसमें 90 फीसदी या उससे ज़्यादा शुद्ध चांदी का इस्तेमाल किया जाता है। ये प्रोसेस काफी मेहनत वाला और स्किल बेस्ड है- 

  • चांदी को पिघलाना: सबसे पहले चांदी के टुकड़ों को मिट्टी के छोटे बर्तन में रखकर कोयले की आंच पर तब तक तपाया जाता है जब तक वह पिघल न जाए।
  • तार बनाना: पिघली हुई चांदी को छड़ के सांचे में ढालकर ठंडा किया जाता है। इसके बाद एक ख़ास मशीन (पारंपरिक रूप से हाथ के हैंडल से) से खींचकर उसके बेहद पतले और एक समान तार तैयार किए जाते हैं ।
  • डिजाइन गढ़ना: कारीगर बिना किसी मॉडर्न स्केच के, अपनी इमेजिनेशन के सहारे इन तारों को मोड़ते, घुमाते और आपस में जोड़कर मनचाहा आकार देते हैं। ये पूरी तरह हाथ की सफाई और आंखों की पैनी नजर के भरोसे है।
  • सोल्डरिंग और पॉलिशिंग: डिजाइन को मजबूती देने के लिए बोरेक्स पाउडर और पानी के घोल में डुबोकर छोटी लौ पर सोल्डर किया जाता है। आख़िर में प्लैटिनम पॉलिश कर इसे चमक दी जाती है ।

सरकारी पहचान: GI टैग और करोड़ों की परियोजनाएं

तारकासी की ख़ासियतों को अब सरकारी संरक्षण और वैधानिक मान्यता दोनों मिल चुके हैं-

  • GI टैग की मुहर (2024): मार्च 2024 में चेन्नई स्थित भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री ने ‘Cuttack Silver Filigree’ (चांदी तारकासी) को प्रतिष्ठित GI टैग प्रदान किया। इसके लिए जिला प्रशासन ने इस कला के 13वीं शताब्दी से जुड़े ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत किए थे। ये टैग इस बात की गारंटी है कि असली तारकासी सिर्फ कटक में ही बनती है।
  • 10 करोड़ की कॉमन फैसिलिटी सेंटर (CFC) परियोजना: अगस्त 2025 में ओडिशा सरकार ने कटक में 10 करोड़ रुपये की लागत से एक मॉडर्न ‘कॉमन फैसिलिटी सेंटर’ की आधारशिला रखी। उपमुख्यमंत्री प्रवती परिदा ने इसे 8 महीने में पूरा करने का भरोसा दिया है। इस सेंटर में कारीगरों को आधुनिक डिजाइन लैब, उन्नत मशीनें, मार्केटिंग सेंटर और पर्यटकों के लिए लाइव डेमोस्ट्रेशन की सुविधा मिलेगी। सरकार का टारगेट लुप्त होती इस कला से जुड़े परिवारों की संख्या 500 से बढ़ाकर 5,000 तक ले जाना है।
  • ग्लोबल मंच पर सम्मान: कनाडा में आयोजित G7 शिखर सम्मेलन-15 से 17 जून 2025 तक खूबसूरत शहर कनानास्किस में गहन चर्चाओं के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कनाडा की गवर्नर जनरल मैरी साइमन को एक बेहद खूबसूरत ‘सिल्वर फिलिग्री क्लच पर्स’ गिफ्ट किया था, जो कटक की तारकासी से बनाया गया था।
Image Courtesy- ANI : तारकासी से बना सिल्वर क्लच पर्स

चुनौतियां और कटक की अहमियत

इतनी तारीफ के बावजूद, तारकासी आज अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। कारीगर बिचौलियों के शोषण और मशीन से बनी सस्ती नकलों से परेशान हैं। यही कारण है कि साल में एक बार दुर्गा पूजा के दौरान ही ये कला पूरे शबाब पर दिखती है, जब कटक के पंडालों में देवी दुर्गा की भव्य ‘चांदी मेढ़ा’ (चांदी का बैकग्राउंड और जूलरी) लगाने की होड़ मचती है। 1956 में शुरू हुई ये परंपरा आज 500 किलो से अधिक चांदी के मेढ़ों तक पहुंच चुकी है।

Image Courtesy- Debiprasad Sahoo- flickr.com

तारकासी कटक की आत्मा है। GI टैग और CFC जैसी सरकारी पहल से उम्मीद बंधी है कि ये चमक बुझने नहीं पाएगी। अगली बार जब आप चांदी की कोई नायाब कलाकृति देखें, तो उसमें बसे कारीगर के पसीने और कटक की सदियों पुरानी विरासत की गूंज जरूर सुनें।

ये भी पढ़ें: खर्चा-ए-पानदान: लखनऊ की नवाबी तहज़ीब में बेगमात की निजी सल्तनत

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

जम्हूरियत और बराबरी का तोहफा: खालसा पंथ का जन्म

अप्रैल 1699 में वैशाखी के दिन जब गुरु गोबिंद...

बैसाखी का ऐतिहासिक महत्व

भारतीय राज्य पंजाब में, वैशाखी का त्योहार गहरी श्रद्धा...

वैसाखी: ख़ालसा पंथ की स्थापना का ऐतिहासिक दिन

वैसाखी का पर्व सिर्फ़ एक फ़सल कटाई का त्योहार...

Topics

जम्हूरियत और बराबरी का तोहफा: खालसा पंथ का जन्म

अप्रैल 1699 में वैशाखी के दिन जब गुरु गोबिंद...

बैसाखी का ऐतिहासिक महत्व

भारतीय राज्य पंजाब में, वैशाखी का त्योहार गहरी श्रद्धा...

वैसाखी: ख़ालसा पंथ की स्थापना का ऐतिहासिक दिन

वैसाखी का पर्व सिर्फ़ एक फ़सल कटाई का त्योहार...

खर्चा-ए-पानदान: लखनऊ की नवाबी तहज़ीब में बेगमात की निजी सल्तनत

लखनऊ (Lucknow) सिर्फ शहर नहीं, एक अंदाज-ए-बयां है। यहां...

बेदम शाह वारसी के कलाम में गंगा-जमुनी तहज़ीब की झलक

उर्दू अदब और सूफ़ियाना रिवायत की फ़िज़ा में बेदम...

Related Articles

Popular Categories