1.अंग्रेज़ों का बनाया कानून आज भी चल रहा है
आज़ादी के अस्सी साल बाद भी, पंजाब के ज़्यादातर बड़े गुरुद्वारे एक अंग्रेज़ों के ज़माने के कानून — सिख गुरुद्वारा एक्ट, 1925 के हिसाब से चलाए जा रहे हैं। ये सोचने वाली बात है। अकाल तख्त सन् 1606 में बना था। छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब के वक्त। यानी ये संस्था उस कानून से तीन सौ साल पुरानी है जो आज इसे ‘मैनेज’ करता है।
तो हुआ क्या था? जब अकाली आंदोलन ज़ोर पकड़ने लगा, तो अंग्रेज़ों ने सोचा। इस आंदोलन को कुचल नहीं सकते, तो इसे एक कानूनी ढांचे में बांध देते हैं। बस यही था 1925 का कानून, सिखों की भावना को नहीं, बल्कि उनके आंदोलन को शांत करने की कोशिश। ये कानून कोई धार्मिक दस्तावेज़ नहीं था। ये सिर्फ एक इंतज़ामी बंदोबस्त था।
इसकी ज़बान और इसकी बनावट उसी उसूल को दिखाती है। ये कानून तय करता है कि सिख किसे कहेंगे, सिख गुरुद्वारा क्या है, किन दरबारों को इसके दायरे में लाया जाएगा, किसे वोट देने का हक़ है, कमेटियां कैसे काम करेंगी, झगड़े कैसे सुलझाएंगे, और जायदाद का मैनेजमेंट कैसे होगा। यानी ये एक कानून है, क्लासिफिकेशन, कंट्रोल और मैनेजमेंट का। ये नौकरशाही के दुनिया की चीज़ है। इसका तारीख़ी किरदार चाहे कितना भी अहम रहा हो, ये सिख रूहानी ख़ुदमुख़्तारी की ज़बान नहीं बोलता।
2.1925 का कानून क्या मानता है-और क्या नहीं
ये समझने के लिए कि मौजूदा ढांचा बहुत कम क्यों हो चुका है, सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि सिख गुरुद्वारा एक्ट, 1925 दरअसल करता क्या है।
ये तीन मरकज़ी काम करता है। पहला, ये शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीएसी) को एक क़ानूनी इकाई बनाता है। दूसरा, ये चुनावों, अहलियतों, सदस्यता, झगड़ों, कमेटियों, अफ़सरों और दर्ज किए गए गुरुद्वारों से जुड़ी जायदाद के मैनेजमेंट का सारा क़ानूनी तंत्र बताता है। तीसरा, ये यह बंदोबस्त एक तय किए गए इलाके तक सीमित रखता है, जो पुराने पंजाब और बाद में बनने वाले पंजाब, हरियाणा, हिमाचल और चंडीगढ़ के इलाकों पर लागू है।
ये बड़ा मामला है, लेकिन सीमित भी है। ये कानून एक इंतज़ामी बंदोबस्त को चलाता है। ये किसी तहज़ीब की बुनियाद नहीं रखता। ये मैनेजमेंट को कंट्रोल करता है। ये पंथ के रूहानी आइन की परिभाषा नहीं देता।
इसलिए इसकी ख़ामोशियां इसके प्रोवीज़न से ज़्यादा बातें करती हैं। ये सिख पंथ की रूहानी ख़ुदमुख़्तारी को अक़ीदे, अनुशासन या तख्तों के दर्जे के मामले में साफ़ तौर पर मान्यता नहीं देता। ये एसजीपीएसी को कोई बाला-तर पंथिक संसद घोषित नहीं करता। ये सभी तारीख़ी सिख संस्थाओं के लिए कोई अखिल-भारतीय या पंथ-व्यापी धार्मिक ढांचा नहीं बनाता। ये सिख जहान के लिए कोई एकजुट आइनी निज़ाम नहीं रचता। और ना ही ये गुरू ग्रंथ साहिब और गुरू पंथ के अख़्तियार को क़ानूनी बदलावों से परे रखता है।
यही वजह है कि इस कानून को उसी शक्ल में समझना होगा जैसा है, एक इलाकाई प्रबंध-कानून, ना कि सिख ख़ुद-हुकूमती का कोई चार्टर।
3.एसजीपीएसी: एक क़ानूनी इकाई, पंथिक अख़्तियार का आख़िरी सोर्स नहीं
वक्त के साथ, आम बातचीत में एसजीपीएसी को ऐसे देखा जाने लगा जैसे उसका क़ानूनी दर्जा किसी ऊंची चीज़ में बदल गया हो, जैसे कि वो सिख सामूहिक अधिकार की कुदरती और आख़िरी शक्ल हो। ये समझ इतनी मामूली हो गई है कि अक्सर उसकी पड़ताल नहीं होती। लेकिन क़ानूनी और इदारे के लिहाज़ से, एसजीपीएसी वही है जो पैदा होने के वक़्त था, एक क़ानून की पैदा-की-हुई चीज़।
ये इसलिए है कि एक विधानमंडल ने इसे रचा। इसकी बनावट, इसके इख़्तियारात, इसके तरीक़े और इसका इलाका सब क़ानून पर निर्भर हैं। इन्हें क़ानूनी कार्रवाई से बदला जा सकता है, घटाया-बढ़ाया जा सकता है। इसका अख़्तियार उन्हीं संस्थाओं तक है जो इस कानून के तहत दर्ज हैं। ये पंथ की पूरी रूहानी मर्ज़ी के बराबर नहीं है।
ये फ़र्क़ बहुत मायने रखता है। जब एक क़ानूनी प्रबंध-संस्था को यूं ही मान लिया जाए जैसे कि वो ख़ुद पंथ की आख़िरी रूहानी हैसियत हो, तो चुपके से एक उलट-फेर हो जाता है। अख़्तियार की रवानी उलट जाती है। ये समझा जाने लगता है कि सारी हैसियत गुरू ग्रंथ साहिब, गुरू पंथ, तारीख़, अनुशासन और रहत से नहीं आती, बल्कि एक क़ानूनी ढांचे और उसके तहत बनी संस्था से आती है।
ये ख़तरा ख़ास तौर पर तब गंभीर हो जाता है जब जत्थेदारों की नियुक्ति, अनुशासन या हटाने की बात हो, या जब तख्तों और दूसरे संस्थानों के मरतबे की सवाल हो जिनका अख़्तियार आधुनिक क़ानूनी किताबों से सदियों पुराना है। एसजीपीएसी को बिना सवाल किए मान लेना सिर्फ़ इसलिए कि वो क़ानूनी तौर पर जमी हुई है, असल में ये मान लेना है कि औपनिवेशिक और आज़ादी के बाद की क़ानूनी बनावट ही सिख इदारी लाइफ की आख़िरी हाकिम बन गई है। ये एक ऐसी क़ौम के लिए ठीक नहीं हो सकता जिसका गहरा धार्मिक सिद्धांत अख़्तियार को गुरू और सामूहिक पंथ में रखता है, ना कि किसी नागरिक क़ानून में।
4.बिखरा हुआ क़ानूनी नक़्शा: तख्त ख़ुद ही बयान करते हैं
अगर 1925 का ढांचा सच में सिख रूहानी अधिकार का एक समरस और एकजुट निज़ाम होता, तो उम्मीद होती कि सभी बड़े तख़्त और तारीखी गुरुद्वारे एक साझा क़ानूनी निज़ाम के तहत आते। वे नहीं आते। सिख इदारी प्रबंध का असली नक़्शा बिखरा हुआ है, असमान है और बहुत कुछ बयान करता है।
तख़्त श्री हज़ूर साहिब, नांदेड़, एक अलग महाराष्ट्र क़ानून के तहत चलता है, जिसमें राज्य की भूमिका साफ़ और असरदार है। तख्त श्री पटना साहिब, बिहार, अपने मकामी बंदोबस्तों, आइन-दस्तूर और स्थानीय ढांचों के तहत चलता है, ना कि एसजीपीएसी या पंजाब के क़ानून के तहत। इनके अलावा, बहुत से गुरुद्वारे साधारण ट्रस्ट, सोसाइटी, धार्मिक बंदोबस्त या चैरिटी के क़ानूनों के तहत चलते हैं – जो उनके इलाके के हिसाब से अलग-अलग हैं। विदेशों में तो ये बिखराव और बढ़ जाता है, जहां प्रबंध अक्सर असोसिएशन क़ानून, चैरिटी नियमों या लोकल कंपनी ढांचों पर निर्भर होता है।
ये सिर्फ़ एक प्रशासनिक मुश्किल नहीं है। ये दिखाता है कि एक सोचे-समझे पंथ-व्यापी आइनी तरीक़े का अभाव है। यहां तक कि सिखों के सबसे ऊंचे तख्त भी एक ही क़ानूनी डिज़ाइन के तहत नहीं चलते जिसे पंथ ने ख़ुद लिखा हो। बल्कि, वे अलग-अलग राज्यों और मकामी सरकारों के बनाए हुए अलग-अलग क़ानूनी बंदोबस्तों में घुसे हुए हैं।
जो तस्वीर सामने आती है, वो बिल्कुल साफ़ है, कुछ सबसे अहम सिख संस्थाओं पर क़ानूनी कंट्रोल किसी सामूहिक सिख ख़ुद-शिनाख़्ती कार्रवाई से नहीं, बल्कि राज्य-मध्यस्थ बिखरे ढांचों के ज़रिए चलता है। इस हक़ीक़त पर गंभीर सोच होनी चाहिए।
5.क़ानूनी तंत्र और पंथ का गहरा सिलसिला
1925 के कानून के साथ-साथ कई और चीज़ें भी बन गई हैं। ट्रिब्यूनल, चुनाव आयोग, कर्मचारी विवाद के अदालत। ये सब ज़रूरी हैं, इनसे इनकार नहीं। लेकिन ये याद रखना ज़रूरी है कि ये सब इंतज़ाम की चीज़ें हैं, धर्म की बुनियाद नहीं। अकाल तख्त की ताकत किसी कानून से नहीं आती। वो ताकत आती है 1606 से, गुरु साहिब की देन से, सिखों की कुर्बानियों से और सदियों की परंपरा से। अगर कल 1925 का कानून हट जाए, तो अकाल तख्त कम पवित्र नहीं हो जाएगा। गुरु ग्रंथ साहिब की मर्यादा कम नहीं होगी। बदलेगा सिर्फ वो कानूनी खोल, जो इन संस्थाओं के इर्द-गिर्द चढ़ा हुआ है। खोल को जिस्म समझने की भूल नहीं होनी चाहिए।
6.भारत ने खुद को नए सिरे से गढ़ा- सिख संस्थाओं ने नहीं
एक दिलचस्प तुलना देखिए-
जब भारत आज़ाद हुआ, तो उसने सिर्फ अंग्रेज़ों की सत्ता नहीं ली बल्कि नया संविधान बनाकर खुद को नए सिरे से परिभाषित किया। संविधान की प्रस्तावना कहती है ‘हम भारत के लोग’ और Article 395 ने पुराने अंग्रेज़ी कानूनों को ख़त्म कर दिया। ये सिर्फ कानूनी बदलाव नहीं था। ये एक सभ्यतागत ऐलान था कि हम अब अपनी शर्तों पर जीएंगे। लेकिन सिख संस्थाओं के साथ ये नहीं हुआ। 1925 का कानून चलता रहा, उसमें थोड़े-बहुत बदलाव हुए लेकिन पंथ ने खुद कभी अपना ढांचा नहीं गढ़ा। नतीजा ये है कि भारत का गणतंत्र अपनी ज़बान में बोलता है, लेकिन सिख संस्थाएं अभी भी उस ज़बान में बोल रही हैं जो अंग्रेज़ों ने उनके लिए लिखी थी।
7.संविधान में जगह पहले से है
कुछ लोग सोच सकते हैं कि पंथ का अपना ढांचा बनाना संविधान के खिलाफ है। ये गलत सोच है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म मानने और फैलाने की आज़ादी देता है। अनुच्छेद 26 कहता है कि हर धार्मिक समुदाय अपने धार्मिक मामले खुद चला सकता है।
हां, सरकार गुरुद्वारों के आर्थिक और प्रशासनिक मामलों में दखल दे सकती है, लेकिन वो धर्म की रूह की मालिक नहीं बन सकती।
यानी संविधान खुद ये जगह देता है कि पंथ अपना धार्मिक ढांचा खुद तय करे। बस देश के कानून की सीमा में रहे। ये संविधान के ख़िलाफ नहीं, बल्कि संविधान की भावना के अनुसार है।
8.पंथ का खुद का दस्तावेज़ क्यों ज़रूरी है
असल सवाल ये नहीं है कि क्या सिख पंथ को भारतीय संवैधानिक ढांचे के बाहर रहना चाहिए। उसे नहीं रहना चाहिए। असल सवाल ये है कि क्या इस ढांचे के अंदर सिख संस्थाएं अपनी चालू शक्ल एक विरासती औपनिवेशिक क़ानून से लेती रहें, या क्या पंथ को ख़ुद अपना चार्टर बनाना चाहिए और फिर उसे क़ानूनी मान्यता दिलानी चाहिए।
जवाब अब साफ़ होना चाहिए।
ऐसा एक दस्तावेज़-
- गुरु ग्रंथ साहिब की सर्वोच्चता को साफ शब्दों में मानेगा
- सभी तख्तों के जत्थेदारों की नियुक्ति और जवाबदेही के लिए साफ़ नियम बनाएगा
- पूरे भारत के सभी तख्तों और गुरुद्वारों के लिए एक साझी सोच देगा
- पैसे की पारदर्शिता, शिक्षा और सेवा के मामले में नैतिक मानक तय करेगा
और सबसे ज़रूरी बात, ये दस्तावेज़ पंथ खुद बनाएगा। विद्वानों, संगत, डायस्पोरा और सभी वर्गों की भागीदारी से न कि किसी नेता की मर्जी से या किसी पार्टी के दबाव में।
एक पंथ-द्वारा लिखित चार्टर में कोई बग़ावत नहीं होगी। ये परिपक्वता का काम होगा। ये कहने के बराबर होगा कि एक सदी के क़ानूनी अनुभव और करीब आठ दशक के गणतांत्रिक हिंदुस्तान के बाद, सिख समुदाय उन उसूलों को सोच-समझकर लिखने की ताकत रखता है जिन पर उसके पवित्र संस्थान चलने चाहिए।
ऐसा चार्टर बिना किसी गुंजाइश के साफ़ तौर पर गुरू ग्रंथ साहिब की आख़िरी रूहानी अहमियत और सामूहिक धार्मिक जीवन में गुरू पंथ के मरकज़ी दर्जे की तस्दीक कर सकता है।
इसका मतलब यह नहीं कि सरकार का कोई काम नहीं रहेगा। भ्रष्टाचार रोकना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना, सार्वजनिक जवाबदेही, ये सब ज़रूरी हैं।
लेकिन आज जो हो रहा है वो उलटा है। पहले सरकार कानून बनाती है, फिर उसी से पंथिक संस्थाएं आकार लेती हैं। यह गलत दिशा है।
सही तरीका यह होगा-पहले पंथ अपना ढांचा तय करे, फिर सरकार उसके अनुसार कानून बनाकर उसे मान्यता दे। ये न अलगाववाद है, न बगावत। ये बस इतनी सी मांग है कि एक धार्मिक समुदाय अपने धार्मिक मामलों का लेखक खुद हो।
9.सरकार की भूमिका-मालिक नहीं,मददगार
कोई भी आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य धार्मिक संस्थाओं के सिलसिले में अपने जायज़ काम बरकरार रखेगा। दंड क़ानून लागू होगा। भ्रष्टाचार का निपटारा होगा। सार्वजनिक व्यवस्था बनी रहेगी। जायदाद और वित्तीय जवाबदेही के नियम ज़रूरी हैं। इसमें बुराई की कोई बात नहीं।
मसला ये नहीं है कि राज्य को इस पूरे मैदान से गायब हो जाना चाहिए, बल्कि यह है कि उसकी भूमिका बुनियादी बनी रहे या मददगार बन जाए। फिलहाल, अख़्तियार की संरचना असल में राज्य से पंथ की तरफ़ चलती है। विधानमंडल संस्थाएं बनाते हैं, उनके इख़्तियारात तय करते हैं, और इस तरह सिख संस्थाओं के चलने की शक्ल बनाते हैं। ये प्रशासनिक तौर पर आसान हो सकता है, लेकिन सैद्धांतिक तौर पर उल्टा है।
लेकिन आज जो हो रहा है वो उलटा है। पहले सरकार कानून बनाती है, फिर उसी से पंथिक संस्थाएं आकार लेती हैं। ये गलत दिशा है।
सही तरीका यह होगा, पहले पंथ अपना ढांचा तय करे, फिर सरकार उसके अनुसार कानून बनाकर उसे मान्यता दे। ये न अलगाववाद है, न बगावत, ये बस इतनी सी मांग है कि एक धार्मिक समुदाय अपने धार्मिक मामलों का लेखक खुद हो।
10.पुराना हटाओ, नया गढ़ो, नए सिरे से खड़े हो
1925 के कानून की अपनी तारीख़ी अहमियत है। इसी के दम पर महंतों के कब्ज़े से गुरुद्वारे आज़ाद हुए। इसने एक बड़ी लड़ाई के बाद एक व्यवस्था दी। उसे सलाम। लेकिन जो चीज़ एक वक्त ज़रूरी थी, वह हमेशा के लिए पवित्र नहीं हो जाती। सौ साल बाद अब वक्त आ गया है तीन काम करने का —
पहला-अंग्रेज़ी दौर के कानून को सिख शासन की बुनियाद मानना बंद करो
दूसरा-एक नया, पंथ-निर्मित दस्तावेज़ बनाओ, जो सिख धर्म, इतिहास, और आज की ज़रूरतों से निकला हो
तीसरा-अकाल तख्त, SGPC, तख्त, कमेटियां, सबको इस नई, खुद-चुनी हुई बुनियाद पर खड़ा करो
ये भारत के संविधान से लड़ाई नहीं है। यह उसके भीतर रहते हुए पंथ की अपनी पहचान को नई ज़बान देना है। ये इतिहास को छोड़ना नहीं बल्कि ये इतिहास को पूरा करना है।
अब बस यह देखना है कि पंथिक नेतृत्व में इस काम के लिए वह हौसला और दूरदर्शिता है या नहीं।
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