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Moi Eti Nixhasor: बॉलीवुड को पीछे छोड़ असम के ‘चोर’ की कहानी ने जीता अमेरिका का दिल

असम की एक फिल्म ने वहां पहुंचकर इतिहास रच दिया है, जहां बॉलीवुड की कई बड़ी फिल्में भी नहीं पहुंच पातीं। इस फिल्म का नाम है ‘मोइ एति निशासोर’ (‘Moi Eti Nixhasor’) जिसे अंग्रेजी में ‘कुडुवा द नाइटबर्ड’ (Koduwa the Nightbird) कहा जाता है। यह फिल्म एक चोर की कहानी है, जो बिहू के दिनों में ढोल बजाने में माहिर है। हाल ही में इस फिल्म ने अमेरिका के प्रतिष्ठित अकोलेड ग्लोबल फिल्म कम्पटीशन में ‘Award of Excellence Special Mention’ जीता है। यह सम्मान उन दस फिल्मों को दिया गया, जिन्होंने दुनिया भर से आई सैकड़ों फिल्मों को पीछे छोड़ा।

आखिर क्यों ख़ास है ये फिल्म?

फिल्म की कहानी असम के एक गांव में बसने वाले कुडुवा (Gunomoni Barua) के इर्द-गिर्द घूमती है। गांव वाले उसे चोर कहते हैं, लेकिन जब बिहू का त्योहार आता है, तो वही लोग उसके ढोल की ताल पर झूमते हैं। कुडुवा एक ईमानदार जिंदगी जीना चाहता है, लेकिन गांव की सियासत और सामाजिक ढांचा उसे बदलने नहीं देता। फिल्म ये सवाल उठाती है कि असली चोर कौन है? वो जो भूख से मजबूर होकर चोरी करता है, या वो व्यवस्था जो उसे जीने का हक नहीं देती?

ये कहानी मशहूर पत्रकार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित अनुराधा शर्मा पुजारी (Anuradha Sharma Pujari) की लिखी एक सच्ची घटना पर आधारित है। उन्होंने असम के गांवों में ऐसे ही कुडुवा को देखा था, जो समाज की विसंगतियों का शिकार था।

निर्देशक का जुनून

फिल्म का निर्देशन बिद्युत कोटोकी ने किया है, जो पहले राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार रह चुके हैं। उनकी पिछली फिल्म ‘एखोन नेदेखा नादीर शिपारे’ असमिया और हिंदी में बनी थी और अमेरिका में रिलीज होने वाली पहली क्षेत्रीय फिल्मों में से एक थी। कोटोकी कहते हैं, ‘मैं यह दिखाना चाहता था कि इंसान की भावनाओं की कोई सीमा नहीं होती। असम का चोर हो या अमेरिका का, उसके मन में उम्मीद और निराशा एक जैसी ही होती है।’

Moi Eti Nixhasor

कैसे बनी ये फिल्म?

इस फिल्म को बनाने में सबसे बड़ी चुनौती थी इसकी प्रामाणिकता। कोटोकी ने फिल्म को स्टूडियो में न बनाकर असली असम के गांवों में शूट किया। टीम ने महीनों वहां बिताकर स्थानीय लोगों की जिंदगी, उनके रहन-सहन और बोली को समझा। फिल्म में दिखाए गए बिहू के दृश्यों के लिए असली ढोलिया और लोक कलाकारों को लाया गया, ताकि असम की असली आत्मा को पर्दे पर उतारा जा सके।

इस प्रोजेक्ट को Ministry of Information and Broadcasting के तहत काम करने वाले एनएफडीसी (National Film Development Corporation) ने भी समर्थन दिया। एनएफडीसी उन्हीं फिल्मों को फंड करता है, जो कला और कहानी के मामले में कुछ नया करने की कोशिश करती हैं।

असमिया सिनेमा के लिए बड़ी उपलब्धि

यह सम्मान सिर्फ एक फिल्म की जीत नहीं है, बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत के सिनेमा के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। असम में 1930 के दशक से फिल्में बन रही हैं, लेकिन अब डिजिटल तकनीक और ओटीटी प्लेटफॉर्म की बदौलत ये फिल्में दुनिया तक पहुंच रही हैं। जहनु बरुआ और भवेंद्र नाथ सैकिया जैसे दिग्गजों ने जो रास्ता दिखाया, उस पर बिद्युत कोटोकी जैसे नए फिल्मकार आगे बढ़ रहे हैं।

Moi Eti Nixhasor

ये फिल्म जल्द ही असम में रिलीज होगी। उम्मीद है कि इसकी सफलता के बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म भी इसे खरीदेंगे, ताकि दुनिया भर के दर्शक इस अनोखी कहानी को देख सकें। ‘मोइ एति निशासोर’ ने साबित कर दिया है कि अगर कहानी दिल से लिखी गई हो, तो भाषा और सीमाएं मायने नहीं रखतीं।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ें

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