तसव्वुर कीजिए, एक ऐसा कपड़ा जिस पर मौसम-ए-बहार (बसंत) की पूरी रंगत उतर आई हो। वो महज़ कपड़ा नहीं, एक दुल्हन की शादी की गाढ़ी थी, जिस पर सदियों पुरानी दास्तानें सिल दी गई थीं। ये दास्तान है पारसी गारा कढ़ाई (Parsi Gara Embroidery) की। ये सिर्फ धागे और सुई का खेल नहीं, बल्कि एक सफरनामा है, एक पूरी कौम की हिजरत की कहानी, जिसे रेशम के धागों ने जिंदा रखा।
हिजरत का दर्द, सुई की नोक पर
बात आठवीं सदी की है। ईरान (Persia) से एक काफिला उठा। ये पारसी समुदाय (Parsi community) के लोग थे, जो अपने धर्म को बचाने के लिए वतन छोड़कर हिंदुस्तान की पहली किरणों की तलाश में निकले थे। गुजरात के तट पर उतरे तो राजा जादव राणा ने उनका स्वागत किया। मगर सवाल था ‘अपनी पहचान कैसे बचाई जाए?’ जुबां बदली, रहन-सहन बदला, लेकिन अपने दिलो-दिमाग में वो अपने पुरखों की ज़मीन की तस्वीरें संजोए हुए थे। यही तस्वीरें उतरने लगीं उनकी औरतों के हाथों की कारीगरी में।

‘गारा’ फारसी लैंग्वेज का लफ्ज़ (‘Gara’ is a Persian word) है, जिसका मतलब होता है ‘सुई से काम करना’ या ‘सिलाई। लेकिन पारसी गारा में ये सिलाई जादू में बदल गई। शुरुआत में ये कढ़ाई सिर्फ कपड़े सिलने के लिए नहीं थी, बल्कि ये एक इबादत थी। पारसी महिलाएं (जिन्हें ‘गारा बहनें’ कहा गया) अपनी बेटियों के जहेज़ (दहेज) के लिए ये कढ़ाई करती थीं। ये कढ़ाई उनकी बेटी की शान होती थी, उसका सबसे कीमती गहना।

फारस के फूल और हिंदुस्तान के रंग
अगर आप किसी असली पारसी गारा की साड़ी को गौर से देखेंगे, तो आपको उसमें दो दुनियाएं नजर आएंगी। एक तरफ फारस के बाग़ हैं, सरव (सरो का पेड़), जो जिंदगी और अनंत काल की निशानी है। दूसरी तरफ चीन की तस्वीरें हैं ड्रैगन (अजगर) और फीनिक्स (चिड़िया), जो ताकत और ख़ूबसूरती की अलामत हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि पारसी समुदाय चीन से भी बिज़नेस करता था, और उनके डिजाइन भी इस कला में शामिल हो गए।
मगर असली करिश्मा हुआ जब इन तस्वीरों ने हिंदुस्तान की मिट्टी के रंग पकड़े। फारस के सीधे-सादे फूल अब आम के पत्तों, केले के पेड़ों और गेंदे के फूलों में बदलने लगे। कभी-कभी तो कारीगर इतना बारीक काम कर देते थे कि एक साड़ी को पूरा होने में डेढ़ से दो साल लग जाते थे। इमेजिन, एक साड़ी पर उतरता वसंत, जिसमें हर पंखुड़ी में कारीगर का पसीना, उसकी दुआ और उसका प्यार छिपा हो।
बारीकी की इंतहा (बेहद बारीक काम)
पारसी गारा की खूबी सिर्फ डिजाइन में नहीं, बल्कि उसकी बारीकी में भी है। इसमें आमतौर पर रेशम के बारीक धागे, या कभी-कभी मुलायम ऊन का इस्तेमाल होता है। टांके इतने सूक्ष्म होते हैं कि दूर से देखने पर लगता है जैसे कोई कारीगर ने कैनवास पर ब्रश से पेंटिंग कर दी हो। ‘चेन स्टिच’ (जंजीर जैसी सिलाई) और ‘बटनहोल स्टिच’ उनकी पसंदीदा तकनीक रही है।

गुमशुदगी का अफसाना
मगर अफसोस.. आज ये फन गुमशुदगी के आखिरी पड़ाव पर है। आजादी के बाद, मशीनों के जमाने में, हाथ की इस मेहनत की कीमत कम होती गई। महीनों लगने वाली इस कढ़ाई को कौन खरीदे? पारसी बस्तियों (गलियों) में पहले हर घर की औरत इस फन में माहिर थी, आज मुश्किल से कुछ ही बुजुर्ग औरतें इस कला को जानती हैं। ये अब एक डाइंग आर्ट (मरती हुई कला) बनकर रह गई है।
विरासत की बहार
लेकिन अभी भी उम्मीद की किरणें हैं। कुछ संस्थाएं और डिजाइनर अब इस विरासत को बचाने के लिए आगे आए हैं। वे पुरानी साड़ियों को ढूंढ रहे हैं, उनके डिजाइनों को संजो रहे हैं और नई पीढ़ी की पारसी लड़कियों और दूसरे समुदाय के कारीगरों को ये कला सिखा रहे हैं। वे इस क्लासिक कला को नए अंदाज में पेश कर रहे हैं, साड़ियों के अलावा दुपट्टों, जैकेटों और ड्रेस मटीरियल पर भी।

तो अगली बार जब आप किसी पारसी गारा की साड़ी देखें, तो उसे सिर्फ कपड़ा मत समझिए। उसे एक दस्तावेज समझिए। उस पर कशीदा है एक पूरी कौम का सफर, उनकी खुशियां, उनके गम और हिंदुस्तान की उस मिट्टी से उनका अटूट प्यार, जिसने उन्हें अपना लिया। यह सिर्फ धागे नहीं, यह रेशम के तारों में पिरोया गया इतिहास है।
लेडी मेहरबाई टाटा ने साबित किया कि एक महिला एक साथ समाज सुधारक, खिलाड़ी, यात्री और अपनी संस्कृति की रक्षक हो सकती है। उनकी कहानी आज भी हर उस लड़की को प्रेरणा देती है जो सीमाएं तोड़ना चाहती है।
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