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Bagh printing: सिंध से बाग तक का सफ़र, जहां रंगों में बसती है परंपरा

Bagh printing: बाग नदी के किनारे बसा छोटा-सा बाग गांव आज अपनी अनोखी छपाई कला के कारण दुनिया भर में पहचान बना चुका है। गांव की सुबह यहां रंगों की महक और लकड़ी के ब्लॉकों की लयबद्ध थाप से शुरू होती है। यह आवाज़ सिर्फ़ काम की नहीं, बल्कि सदियों पुरानी बाग प्रिंटिंग परंपरा के जीवित होने का प्रमाण है। आज यह कला केवल सांस्कृतिक विरासत नहीं, बल्कि सैकड़ों परिवारों की आजीविका का आधार बन चुकी है।

सिंध से बाग तक: विरासत का लंबा सफ़र

बाग प्रिंटिंग से जुड़े खत्री समुदाय का मूल निवास वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में माना जाता है। समय के साथ यह समुदाय राजस्थान के मालवा-मारवाड़ क्षेत्रों से होता हुआ मध्य प्रदेश के धार ज़िले के बाग गांव में आकर बस गया। यहां की बाग नदी का पानी इस छपाई के लिए बेहद उपयुक्त साबित हुआ।

स्थानीय कारीगर मुहीनउद्दीन खत्री बताते हैं कि उनका परिवार 15 से 17 पीढ़ियों से इस कला से जुड़ा हुआ है और करीब 400 से 500 वर्षों से यह परंपरा आगे बढ़ रही है। उनका परिवार 1950 के आसपास बाग गांव में स्थायी रूप से बस गया। पहले यह प्रिंट आदिवासी समुदाय के पारंपरिक वस्त्रों तक सीमित था, लेकिन धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ी और यह देश-विदेश तक पहुंच गया।

Bagh printing धैर्य और कौशल का संगम

बाग प्रिंटिंग की प्रक्रिया बेहद जटिल और समय लेने वाली होती है। सबसे पहले सूती या रेशमी कपड़े को अच्छी तरह धोकर तैयार किया जाता है, ताकि उसमें मौजूद अशुद्धियां निकल जाएं। इसके लिए संचोरा नमक, अरंडी का तेल और बकरी की मेंगनी से बना घोल इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद कपड़ा मुलायम और प्रिंटिंग के लिए उपयुक्त हो जाता है।

इसके बाद प्राकृतिक रंग तैयार किए जाते हैं। लाल रंग अलिजारिन और फिटकरी से बनाया जाता है, जबकि काला रंग लोहे के बुरादे, गुड़ और पानी के मिश्रण से तैयार होता है। फिर कारीगर हाथ से बने लकड़ी के ब्लॉकों को रंग में डुबोकर कपड़े पर डिज़ाइन छापते हैं।

प्रिंटिंग के बाद कपड़े को उबाला जाता है, नदी में धोया जाता है और धूप में सुखाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में कई दिन लगते हैं। कारीगरों के अनुसार, एक साड़ी तैयार करने में ही कई दिन लग जाते हैं, क्योंकि हर चरण हाथ से किया जाता है।

परंपरा से उद्योग तक का विस्तार

समय के साथ बाग प्रिंटिंग ने एक बड़े उद्योग का रूप ले लिया है। अब इसका उपयोग साड़ी, दुपट्टा, कुर्ता, बेडशीट और होम डेकोर उत्पादों में किया जा रहा है। बाग गांव और आसपास के क्षेत्रों में कई प्रिंटिंग यूनिट संचालित हो रहे हैं, जहां बड़ी संख्या में कारीगर काम कर रहे हैं।

इस कला को भौगोलिक संकेत (GI Tag) मिलने के बाद इसकी पहचान और मजबूत हुई है। सरकार और विभिन्न संस्थाएं प्रशिक्षण और विपणन के जरिए इस कला को बढ़ावा दे रही हैं।

नई पीढ़ी और ग्लोबल पहचान

आज बाग प्रिंटिंग फैशन डिजाइनरों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। आधुनिक डिज़ाइन और नए प्रयोगों ने इसे युवाओं के बीच खास बना दिया है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और प्रदर्शनियों के माध्यम से यह प्रिंट अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच चुका है, जिससे कारीगरों की आय में भी सुधार हुआ है।

चुनौतियां भी कम नहीं

हालांकि, मशीन से बने सस्ते प्रिंट और बढ़ती लागत इस पारंपरिक कला के सामने बड़ी चुनौती हैं। कई कारीगरों का मानना है कि नई पीढ़ी इस काम में कम रुचि ले रही है। इसके बावजूद, बढ़ती मांग और सरकारी सहयोग इस कला को नई उम्मीद दे रहे हैं।

विरासत को सहेजते हाथ

बाग प्रिंटिंग आज सिर्फ़ कपड़ों पर की जाने वाली छपाई नहीं, बल्कि परंपरा, संघर्ष और आत्मनिर्भरता की कहानी है। बाग गांव के कारीगर अपने हुनर से न केवल कपड़ों को रंगीन बना रहे हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखे हुए हैं। बाग नदी के किनारे उकेरे जा रहे ये रंग आने वाले समय में भी भारत की पहचान को दुनिया तक पहुंचाते रहेंगे।

ये भी पढ़ें: मशहूर इतिहासकार प्रोफ़ेसर इरफ़ान हबीब के साथ एक यादगार मुलाक़ात

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