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नाहन में दशकों से मुस्लिम कारीगरों की मेहनत से सजता आ रहा दशहरा

हिमाचल प्रदेश का ऐतिहासिक शहर नाहन, जहां हर साल दशहरा बहुत ही धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है। ये जगह आपसी भाईचारे और गंगा-जमुनी तहज़ीब की एक मिसाल करने के लिए भी जानी जाती है। यहां दशकों से दशहरे के लिए रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले मुस्लिम कारीगर ही तैयार करते आ रहे हैं।

इस बार भी नाहन के चौगान मैदान में नगर परिषद की ओर से ख़ास तैयारी की जा रही है। मैदान में 40 फीट ऊंचा रावण, 35 फीट ऊंचा कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतले बनाए जा रहे हैं। पुतलों में 700 से ज़्यादा पटाखे लगाए जाएंगे ताकि दशहरा की रात आतिशबाज़ी और रोशनी से शहर जगमगा उठे।

मुस्लिम कारीगरों की पुश्तैनी कला

नाहन में ये काम करने वाले कारीगर उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले से आते हैं। ये लोग बताते हैं कि पुतले बनाने का ये काम उनके दादा और पिता के ज़माने से चलता आ रहा है। आज भी परिवार के 8-10 सदस्य हर साल नाहन पहुंचते हैं और 7-10 दिन तक लगातार मेहनत करके पुतले तैयार करते हैं।

करीब 73 साल के बुज़ुर्ग कारीगर बताते हैं कि उन्होंने ये काम बचपन में अपने पिता के साथ शुरू किया था और अब उनकी अगली पीढ़ी भी इसी परंपरा को निभा रही है। वे हिमाचल, उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब जैसे कई राज्यों में जाकर दशहरा के पुतले बनाते हैं।

गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिसाल

ये काम सिर्फ़ एक रोज़गार भर नहीं है, बल्कि आपसी भाईचारे और धार्मिक सौहार्द की झलक भी दिखाता है। जब दशहरे के दिन हिंदू समाज इन पुतलों को जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाता है, तो इन कारीगरों को भी खुशी मिलती है कि उनकी मेहनत ने पर्व को और भी ख़ास बना दिया।

नाहन में दशहरा सिर्फ़ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक मेलजोल और एकता का प्रतीक है। यहां दशहरे और दिवाली जैसे पर्वों की रौनक़ मुस्लिम समाज के बिना अधूरी मानी जाती है। दशहरे में जहां पुतलों का निर्माण वही करते हैं, वहीं दिवाली पर ये लोग भी जमकर ख़रीदारी करते हैं और पटाखे जलाते हैं।

नाहन की ऐतिहासिक पहचान

1621 में बसे इस पुराने शहर का चौगान मैदान दशहरे का सबसे बड़ा आकर्षण है। यहां हर साल हज़ारों लोग इकट्ठा होते हैं और रावण, कुंभकर्ण और मेघनाथ के पुतलों के दहन का नज़ारा देखते हैं। आतिशबाज़ी, रंग-बिरंगी रोशनी और धार्मिक गीतों के बीच ये पर्व पूरे शहर को एक सूत्र में बांध देता है।

नाहन का दशहरा हमें यही संदेश देता है कि त्योहार सिर्फ़ मज़हब का नहीं, बल्कि एकता, भाईचारे और मोहब्बत का नाम है। हिंदू पर्व हो या मुसलमानों का त्यौहार-जब सब मिलकर मनाते हैं, तभी उसकी असली रौनक निकलकर आती है।

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