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नेताजी सुभाष चंद्र बोस के साहसिक पलायन में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास कई साहसिक और प्रेरणादायक घटनाओं से भरा है, लेकिन 1941 में सुभाष चंद्र बोस का ब्रिटिश अधिकारियों से बचकर बर्लिन तक पहुंचना सबसे चर्चित घटनाओं में से एक है। यह यात्रा केवल नेताजी के साहस और चतुराई की मिसाल नहीं थी, बल्कि इसमें कुछ ऐसी महिलाओं का योगदान भी था, जिनका त्याग और बुद्धिमत्ता आज भी प्रेरणा देती है।

बीवीबती देवी, जो नेताजी के बड़े भाई शरत चंद्र बोस की पत्नी थी, सुभाष चंद्र बोस के लिए एक मज़बूत सहारा बनी। सुभाष चंद्र बोस के घर से भागने के बाद, उन्होंने सूझबूझ से उनके कमरे में नियमित रूप से भोजन भिजवाया और खाली बर्तनों को वापस मंगवाकर उनकी अनुपस्थिति को छुपाए रखा। एक भारतीय व्यवसायी उत्तम चंद की पत्नी रामो देवी ने काबुल में नेताजी को सुरक्षित आश्रय दिया। उन्होंने नेताजी की उपस्थिति को गुप्त रखते हुए उनकी देखभाल की और बीमार होने पर उन्हें हर संभव सहायता दी।

इसी तरह, काबुल में इटली के राजदूत की पत्नी लारिसा क्वारोनी ने नेताजी को एक इतालवी पासपोर्ट दिलाने में मदद की। इस पासपोर्ट के ज़रिए वे ऑरलैंडो मज़ोटा के नाम से आगे की यात्रा कर सके। इन महिलाओं के साहस, बुद्धिमत्ता और राष्ट्रप्रेम ने नेताजी के ऐतिहासिक पलायन को संभव बनाया। इनकी कहानियां यह साबित करती हैं कि स्वतंत्रता संग्राम केवल युद्ध के मैदान में ही नहीं, बल्कि घरों और दिलों में भी लड़ा गया था।

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ये भी पढ़ें: सुभाष चंद्र बोस: संघर्ष, साहस और समर्पण की मिसाल

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