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ग़ज़लों की जान, मुशायरों की शान और उर्दू अदब राहत इंदौरी के नाम

राहत इंदौरी, जिनका असल नाम राहत कुरैशी था, उर्दू ज़ुबान के मशहूर शायर, फिल्मी गीतकार और बेहतरीन तस्वीर साज़ थे। उनकी पैदाइश 1 जनवरी 1950 को इंदौर के एक आम ख़ानदान में हुई। उनके वालिद रफ़तुल्लाह कुरैशी और वालिदा मक़बूल उन-निसा बेगम थी। राहत इंदौरी साहब अपनी चार भाई-बहनों में चौथे नंबर पर थे। उनके दो बड़ी बहनें तकीरेब और तहज़ीब थी, एक बड़े भाई अकील और छोटे भाई आदिल।

तालीम और इब्तिदाई ज़िंदगी

राहत इंदौरी की तालीम का आगाज़ देवास और इंदौर के नूतन स्कूल से हुआ। उन्होंने इंदौर यूनिवर्सिटी से उर्दू में एम.ए. किया और “उर्दू मुशायरा” के मौज़ू पर पीएचडी की डिग्री हासिल की। उर्दू अदब के इस फ़नकार ने 16 साल तक इंदौर यूनिवर्सिटी में उर्दू अदब के उस्ताद के तौर पर अपने फराइज़ अदा किए। इसके अलावा, उन्होंने त्रैमासिक पत्रिका “शाखें” का 10 साल तक इदारा किया।

शायरी का सफ़र

राहत इंदौरी साहब का शायर बनने का सफ़र दिलचस्प है। बचपन में वे साइन बोर्ड  लिखने का काम करते थे। उनकी ख़त्ताती इतनी ख़ूबसूरत थी कि लोग उनसे मुतासिर हो जाते। लेकिन तक़दीर ने उनके लिए शायरी का रास्ता चुना। एक मुशायरे में उनकी मुलाकात मशहूर शायर जां निसार अख़्तर से हुई। राहत साहब ने उनसे शायर बनने की ख़्वाहिश ज़ाहिर की। अख़्तर साहब ने पहले 5 हज़ार शेर जुबानी याद करने की नसीहत दी। राहत साहब ने जब जवाब दिया कि वे पहले ही 5 हज़ार शेर याद कर चुके हैं, तो अख़्तर साहब ने कहा, “फिर तो तुम शायर हो। स्टेज संभालो!”

ज़ुबां तो खोल, नज़र तो मिला, जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूं, हिसाब तो दे
रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है

राहत इंदौरी

फैमिली और ज़ाती ज़िंदगी

राहत इंदौरी ने दो शादियां की। पहली शादी 27 मई 1986 को सीमा राहत से हुई, जिनसे उन्हें एक बेटी शिबिल और दो बेटे फैज़ल और सतलज हुए। दूसरी शादी अंजुम रहबर से 1988 में हुई, जिनसे एक बेटा हुआ। लेकिन ये शादी ज़्यादा दिन तक न चल सकी और उनका तलाक हो गया।

पिछले 40-45 सालों में राहत साहब ने न सिर्फ़ हिंदुस्तान बल्कि दुनिया के हर कोने में मुशायरों की रौनक़ बढ़ाई। उनकी शायरी में इश्क़ग़मजज़्बात और बग़ावत का शानदार मेल दिखता था।

उस की याद आई है सांसों जरा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

राहत इंदौरी

शायरी में तहज़ीब और हक़ीक़त

डॉ. राहत इंदौरी का मानना था कि शायरी और ग़ज़ल इशारे का फ़न है। उनकी नज़्मों और अशआर में हिंदुस्तानी तहज़ीब की झलक थी। वह कहते थे, “अगर मेरा शहर जल रहा है और मैं कोई रोमांटिक ग़ज़ल सुना रहा हूं, तो मैं अपने फ़न, अपने वतन और अपने वक़्त से गद्दारी कर रहा हूं।

फूलों की दुकानें खोलो, खुशबु का व्यापार करो
इश्क ख़ता है तो, ये ख़ता एक बार नहीं, सौ बार करो

राहत इंदौरी

पेंटिंग से शायरी तक

शायरी से पहले राहत साहब पेंटर बनना चाहते थे। उन्होंने किताबों के कवर डिज़ाइन किए और बॉलीवुड फिल्मों के पोस्टर और बैनर बनाए। लेकिन उनके शेरों ने जो शोहरत बटोरी, वह लाजवाब थी। उनके लिखे हुए गीत 11 से ज़्यादा बॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल हुए, जिनमें “मुन्ना भाई एमबीबीएस” का गाना शामिल है।

11 अगस्त 2020 को राहत इंदौरी इस दुनिया से रुख़सत हो गए। लेकिन उनके ये अल्फाज़ हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगे।

मैं मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना,
लहू से मेरी पेशानी पर हिंदुस्तान लिख देना

अभी गनीमत है सब्र मेरा, अभी लबालब भरा नहीं हूं मैं
वो मुझको मुर्दा समझ रहा है, उसे कहो मरा नहीं हूं मैं।

राहत इंदौरी

ये भी पढ़ें: उर्दू और फ़ारसी के समंदर, ग़ज़ल के ख़ुदा-ए-सुख़न शायर मीर तक़ी मीर 

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