Sunday, March 1, 2026
24.5 C
Delhi

मैं थिएटर से इतना प्यार क्यों करता हूं,समझा नहीं सकता: नसीरुद्दीन शाह

दिल से एक एक्टर कभी संतुष्ट नहीं होता, जिस दिन वो संतुष्ट हो जाता है, वो मर जाता है। ये शब्द है अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के। आवाज़ द वॉयस को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि वो 14 साल के थे जब पहली बार ड्रामा स्कूल के मंच पर कदम रखा था। जिस पल उन्होने मंच पर होश संभाला उस वक्त उन्हे लगा कि वो अपने घर आ गए है। उस दौरान उन्हे महसूस हुआ था कि ये वही जगह है, जहां उन्हे होना चाहिए। उस दिन के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

वो कहते हैं कि “मैं इसे इतना प्यार क्यों करता हूं, मैं समझा नहीं सकता लेकिन क्या कोई कभी प्यार को समझा पाया है? मैं थिएटर में और बहुत कुछ एक्सप्लोर करना चाहता हूं और वक्त बीतता जा रहा है।”नसीरूद्दीन शाह कहते हैं कि अलकाजी (ओम पुरी) से उन्होंने काफी सारी चीज़े सीखी। दृश्यों को किस तरह से रचा जाना चाहिए, एक अभिनेता को कितनी मेहनत करनी चाहिए और एक प्रोडक्शन बनाने में कितनी तैयारी करनी पड़ती हैं। करीब हर चीज़ के बारे में अलकाजी का ज्ञान उन्हें बहुत छोटा महसूस करवाता था, इसलिए नसीरुद्दीन शाह को लगता था कि उन्होंने उनसे अनजाने में विनम्रता भी सीखी।

थिएटर ने नसीरूद्दीन शाह को समझदार बनाए रखा है। लोगों और दुनिया में उनकी रुचि के दायरे को बढ़ाया है। ये मुझे उन लोगों तक पहुंचने में भी मदद करता है, जिन तक मैं वास्तविक जीवन में नहीं पहुंच सकता। वो कहते हैं कि “हर एक दर्शक दूसरे से अलग होता है और आपके काम की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर नहीं होनी चाहिए कि दर्शक कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। कोई अच्छा या बुरा दर्शक नहीं होता, सिर्फ अच्छा और बुरा प्रदर्शन होता है।”

जब नसीरुद्दीन शाह से पूछा गया कि नए थिएटर प्रोडक्शन और फिल्में जिनका दर्शकों को इंतज़ार करना चाहिए तो उन्होंने कहा कि अगला प्रोडक्शन दास्तानगोई है। जो अशोक लाल को दो कहानियां है। जिन्हें 24 सितंबर 2024 को सफदर दिल्ली स्टूडियो में प्रेजेंट किया जाएगा।

इस ख़बर को पूरा पढ़ने के लिए hindi.awazthevoice.in पर जाएं।

ये भी पढ़ें: कश्मीर की कला में पश्मीना और आधुनिक चरखा से निखार 

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

शहंशाहों का कारवां और रेशमी धागों का जादू: Parsi Gara, जब फ़ारस के फूल हिंदुस्तान की मिट्टी में मुस्कुराए

‘गारा’ फारसी लैंग्वेज का लफ्ज़ (‘Gara’ is a Persian word) है, जिसका मतलब होता है ‘सुई से काम करना’ या ‘सिलाई। लेकिन पारसी गारा में ये सिलाई जादू में बदल गई।

आख़िर पंजाब में माइग्रेंट वर्कर्स का विरोध क्यों हो रहा है?

माइग्रेंट वर्कर्स का विरोध करने वाले लोग दावा करते हैं कि पंजाब में 70 लाख से 1.5 करोड़ के बीच माइग्रेंट वर्कर्स रहते हैं। लेकिन सच तो ये है कि किसी के पास साफ़, वेरिफाइड नंबर नहीं हैं। वे जो आंकड़े बताते हैं, वे असलियत से बहुत दूर लगते हैं।

Gurdwara Sri Dukh Niwaran Sahib: जहां हर तकलीफ़ का हल और दिल को सुकून मिलता है

Gurdwara Sri Dukh Niwaran Sahib सिर्फ़ एक इबादतगाह नहीं,...

Gurdaspur killings: सीमा पार से खतरों का बदलता चेहरा

पंजाब के गुरदासपुर ज़िले में एक बॉर्डर आउटपोस्ट पर दो पुलिसवालों - असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर गुरनाम सिंह और होम गार्ड अशोक कुमार की हत्या ने भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर बढ़ते सुरक्षा ख़तरों (Gurdaspur killings: Changing face of cross-border threats) को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

Topics

शहंशाहों का कारवां और रेशमी धागों का जादू: Parsi Gara, जब फ़ारस के फूल हिंदुस्तान की मिट्टी में मुस्कुराए

‘गारा’ फारसी लैंग्वेज का लफ्ज़ (‘Gara’ is a Persian word) है, जिसका मतलब होता है ‘सुई से काम करना’ या ‘सिलाई। लेकिन पारसी गारा में ये सिलाई जादू में बदल गई।

आख़िर पंजाब में माइग्रेंट वर्कर्स का विरोध क्यों हो रहा है?

माइग्रेंट वर्कर्स का विरोध करने वाले लोग दावा करते हैं कि पंजाब में 70 लाख से 1.5 करोड़ के बीच माइग्रेंट वर्कर्स रहते हैं। लेकिन सच तो ये है कि किसी के पास साफ़, वेरिफाइड नंबर नहीं हैं। वे जो आंकड़े बताते हैं, वे असलियत से बहुत दूर लगते हैं।

Gurdaspur killings: सीमा पार से खतरों का बदलता चेहरा

पंजाब के गुरदासपुर ज़िले में एक बॉर्डर आउटपोस्ट पर दो पुलिसवालों - असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर गुरनाम सिंह और होम गार्ड अशोक कुमार की हत्या ने भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर बढ़ते सुरक्षा ख़तरों (Gurdaspur killings: Changing face of cross-border threats) को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं।

Goodword Publication: बच्चों में तालीम, तसव्वुर और पॉज़िटिव सोच की एक रोशन मिसाल

Goodword दरअसल CPS International यानी सेंटर फॉर पीस एंड स्पिरिचुअलिटी से...

Bagh printing: सिंध से बाग तक का सफ़र, जहां रंगों में बसती है परंपरा

बाग प्रिंटिंग से जुड़े खत्री समुदाय का मूल निवास वर्तमान पाकिस्तान के सिंध क्षेत्र में माना जाता है। समय के साथ यह समुदाय राजस्थान के मालवा-मारवाड़ क्षेत्रों से होता हुआ मध्य प्रदेश के धार ज़िले के बाग गांव में आकर बस गया। यहां की बाग नदी का पानी इस छपाई के लिए बेहद उपयुक्त साबित हुआ।

पढ़ाई का ऐसा माहौल कि 18 किमी दूर से आते हैं स्टूडेंट्स: जानिए कश्मीर की Iqbal Library की कहानी

हर सुबह, समीना बीबी इकबाल लाइब्रेरी-कम-स्टडी सेंटर (Iqbal Library)...

Related Articles

Popular Categories