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असम के हाजो गांव में है ‘पोवा मक्का’

पोवा मक्का हाजो (Powa Mecca Hajo): मस्जिद, मुसलमानों का इबादतगाह है जहां मुसलमान इकठ्ठे हो कर एक साथ नमाज अदा करते हैं, मज़ार किसी पीर फकीर की कब्र होती है, जहां अक्सर लोग अपनी मन्नतें ले कर जाते हैं और दुआ करते हैं। ऐसा माना जाता है कि पीर फकीर की मज़ार पर हाजिर होकर दुआ करने से दुआ जल्दी कुबूल हो जाती है और मुराद पूरी हो जाती है।

मस्जिद और मज़ार में अक्सर कई मील का फासला होता है, लेकिन असम के हाजों गांव में एक छत के नीचे मस्जिद और मज़ार दोनों हैं, जिसे पोवा मक्का के नाम जाना जाता है इसकी एक बेहद दिलचस्प भी कहानी है। 

पोआ मक्का
Masjid – ‘Poa Mecca’ is in Hajo village of Assam (Awaz The Voice)

एक ही छत के नीचे मस्जिद और मज़ार

असम का हाजो गांव जहां एक ही छत के नीचे एक मस्जिद और एक मज़ार शरीफ स्थित है जिसे “पोआ मक्का” के नाम से जाना जाता है। मस्जिद की छत के नीचे स्थित ये मज़ार है हज़रत शाह गयासुद्दीन औलिया का है। हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और बौद्ध धर्म के मानने वाले सभी लोग बड़े एहतराम से अपनी मुरादें लेकर यहांं आते हैं, और खुशी खुशी वापस जाते हैं, लेकिन सवाल उठता है कि इस मज़ार का नाम “पोआ मक्का” यानी “मक्का शरीफ का एक चौथाई” कैसे पड़ा? इसी सवाल का जवाब पाने के लिए हमारे सहयोगी मंजर आलम पहुंचे हाजो।

क्या है मस्जिद और मज़ार का इतिहास 

मस्जिद में दाख़िल होते ही सबसे पहले आप की नज़र शाह ग़यासुद्दीन औलिया की मज़ार पर रूकेगी जिसकी दाईं तरफ ही है नमाज़ अदा करने का कमरा है। मस्जिद की दीवारों पर अरबी भाषा में आयतें लिखी हुई हैं साथ ही खाना काबा और बैतुल मुक़द्दस की तस्वीरें भी उकेरी गई हैं। कहा जाता है कि हजारों साल पहले जब भारत के इस इलाक़े में इस्लाम धर्म को मानने वाला कोई नहीं था, तब ईरान के बग़दाद से 70 औलियाओं के एक जत्थे ने हाजो की इस पहाड़ी पर डेरा डाला और सभी इस्लाम के प्रचार में जुट गए। इस जत्थे के सरदार थे शाह ग़यासुद्दीन औलिया. ग्यासुद्दीन औलिया ने ही इबादत के लिए मस्जिद को बनवाया था. इस्लाम धर्म के प्रचार में ये 70 औलिया इस कदर जुटे कि फिर अपने वतन वापस नहीं लौटे. इतिहास बताता है कि सभी औलिया इकराम का इंतेकाल इसी जगह हुआ और सभी को इस पहाड़ी में ही दफ़न किया गया. शाह ग़यासुद्दीन का इंतेक़ाल भी यहीं हुआ।

इस जगह का नाम “पोआ मक्का” कैसे पड़ा ?

इस जगह का नाम “पोआ मक्का” कैसे पड़ा ? लोगों के इस विषय पर अलग अलग मत है। कुछ लोग बताते हैं कि शाह ग़यासुद्दीन जब अपने वतन से निकले थे तो अपने साथ मक्के की सरज़मीं से पाव भर यानी एक चौथाई मिट्टी ले कर आये थे। शाह ग़यासुद्दीन की ये ख़्वाहिश थी कि जब भी उनका इंतेक़ाल हो तो उन्हें मस्जिद की छत के नीचे ही दफ़न किया जाए और उनके क़ब्र पर मक्के की पाव भर मिट्टी जो वह अपने साथ लाए थे डाल दी जाए। ग़यासुद्दीन के इंतेक़ाल के बाद उनके शागिर्दों ने उनकी ख़्वाहिश को पूरा किया। इसलिए इस जगह को “पोआ मक्का” के नाम से जाना जाने लगा।

स्थानीय लोग बताते है कि शाह गयासुद्दीन औलिया ने मक्का से लाई गई पाव भर मिट्टी से मस्जिद की बुनियाद रखी थी। इसलिए इसे “पोआ मक्का” कहा जाता है, लेकिन मज़ार के खादिम सईयद तौफीक हुसैन बताते हैं कि किसी भी जगह को उर्दू में मक़ाम कहते हैं और अगर किसी मक़ाम में जाने से मुरादें पूरी हो जाती हैं तो असमिया में उसे पुआ यानी “पा लिया” कहते हैं यानी जो मांगा वो मिल गया। अगर इसे पूरे जुमले में कहा जाए तो “ऐसा मक़ाम जहां जाकर जो चाहा था वो पा लिया”। लेकिन गाँव वाले उर्दू नहीं जानते हैं इस लिए मक़ाम को मक्का ही कहते रहे और इस तरह इस मज़ार का नाम “पोआ मक्का” पड़ गया।

पोआ मक्का
मज़ार शरीफ: शाह ग्यासुद्दीन औलिया (Shah Gyasuddin Auliya) Photo – DNN24)

कहते हैं कि धर्मों के औलिया अमर रहते हैं। शाह ग्यासुद्दीन औलिया (Shah Gyasuddin Auliya) के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। हजारों साल बीत गए उनके इंतेकाल को, लेकिन हाजो की इस “पोआ मक्का” में उनका वजूद आज भी मौजूद है। इस बात का सबूत ये है कि धर्म-जात, उम्र, लिंग भेद से परे जो यहां आया हर किसी की मुराद पुरी हुई। जिसने भी हाथ फैलाया वो खाली हाथ नहीं लौटा।अहोम राजाओं के दौर में राजा दारंगी और उनकी पत्नी नारायण चंद्रा भी यहां माथा टेकने आया करते थे, उन्होंने ही दरगाह शरीफ के लिए आस-पास की जमीन भेंट की।

साल 1726 में अहोम राजा रूद्र सिन्हा भी यहाँ पधारे थे। राजाओं की इस हाज़री ने “पोआ मक्का” को हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए पवित्र तीर्थ का दर्जा दे दिया। रोज़ाना सैकड़ों की संख्या में लोग अपनी मुरादें ले कर मज़ार शरीफ में आते हैं। अपनी मुरादें और खाली झोली ले कर आने वाले ये लोग दर्जनों ऐसे परिवार के लिए रोजी रोटी का सहारा बन जाते हैं जिन की दुकाने मज़ार शरीफ के अहाते में है।

मस्जिद और मज़ार कई बार भूकंप में ढह गए

हज़ारों साल पुरानी ये मस्जिद और मज़ार कई बार भूकंप में ढह गए, लेकिन कोई ना कोई ज़रिया निकल आया और हर बार मस्जिद और मज़ार की मरम्मत कर दी गई।1632  में ये ज़रिया शाहजहाँ बने तो साल 1657 में औरंगज़ेब। 1857 में जबरदस्त भूकंप ने एक बार फिर मस्जिद और मजार को ज़बरदस्त नुकसान पहुँचाया तो अहोम राजाओं ने उसे एक नयी शक्ल दी और अब इस ऐतिहासिक ज़मीं की देख-रेख असम सरकार द्वारा की जाती है। पोआ मक्का अपने में एक विशाल इतिहास संजोए हुए है। कहा ये भी जाता है कि इब्न-ए-बतूता भी अपने सफर के दौरान यहां आए और अपने दो दिन यहां बिताए, गौतम बुद्ध यहां पधारें और कुछ वक्त बिताया। इसलिए बौद्ध धर्म के मानने वाले भी बड़ी संख्या में “पोआ मक्का” आते हैं। कहते है कि यहां अलग अलग धर्मों के लोग आते है और उनकी मुरादें पूरी होती है।

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