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असम साहित्य सभा का 77वां सम्मेलन: भाषा और संस्कृति का संगम

असम साहित्य सभा असम की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित संस्था है, जो भाषा, संस्कृति और साहित्य को सहेजने का काम कर रही है। 1917 में पद्मनाथ गोहानीबरुआ और शरत चंद्र गोस्वामी द्वारा स्थापित यह संस्था अब 108 साल पूरे कर चुकी है। यह सिर्फ साहित्य का मंच नहीं, बल्कि समाज को एकजुट करने वाला मंच भी है। हर दो साल में होने वाले इस आयोजन में सभी जाति और धर्म के लोग हिस्सा लेते हैं। इस बार 77वां पाठशाला सम्मेलन 31 जनवरी को 1,200 बीघा भूमि पर हुआ, जिसे स्थानीय लोगों ने खुशी-खुशी उपलब्ध कराया। किसी ने आर्थिक मदद की, तो किसी ने खेत, बांस और पुआल देकर सहयोग दिया।

इस बार का अधिवेशन ख़ास रहा क्योंकि पहली बार व्यापार मेले की जगह विज्ञान मेले का आयोजन किया गया। साथ ही बाजाली हाट में स्थानीय वस्तुओं और खानपान की प्रदर्शनी, विज्ञान प्रदर्शनी, लोक नृत्य, सड़क कविता और खुले वातावरण में काव्य पाठ जैसी अनोखी पहल हुई। आयोजन स्थल पर 10,000 लोगों के बैठने की क्षमता वाला भोजन कक्ष भी बनाया गया।

समारोह समिति ने असम आंदोलन के शहीदों और स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मान देने के लिए उनकी प्रतिमाएं स्थापित की। यह अधिवेशन असमिया भाषा, संस्कृति और एकता को मज़बूत करने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम साबित हो रहा है।

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ये भी पढ़ें: असम की हथकरघा परंपरा : जहां हर बुनावट में छिपी है संस्कृति, आजीविका और आत्मनिर्भरता

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