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पर्दा नशीं, सुरों की मल्लिका शमशाद बेगम के जिंदा रहने के बावजूद सालों तक लोगों ने इन्हे मरा हुआ क्यों समझा?

14 अप्रैल 1919, जलियाँवाला बाग हत्याकांड के ठीक अगले दिन देश भर में मायूसी छाई हुई थी। हर तरफ तनाव का माहौल था। उसी दिन लाहौर के एक पंजाबी मुस्लिम परिवार में किलकारियों ने दस्तक दी। उस घर में एक बेटी ने (शमशाद बेगम) जन्म लिया। ये बेटी आगे चलकर हिन्दी सिनेमा में खनकती आवाज़ की मलिका बनीं। जब वो गातीं  तो सुनने वाले अपने दिल का करार खो बैठते। वो भारत की पहली ऐसी गायिका भी बनीं जिसने दूसरी अभिनेत्रियों को अपनी आवाज़ दी। एक ख़ास बात ये भी रही कि इस गायिका ने कभी भी संगीत की कोई ट्रेनिंग नहीं ली।

लेकिन ऐसा क्या हुआ की ‘मेरे पिया गये रंगून’ और ‘कजरा मोहब्बत वाला’ जैसे हिट गानों को आवाज़ देने वाली इस गायिका ने कुछ वक़्त बाद गानों से ही मुँह मोड़ लिया और जिंदा रहने के बावजूद भी दुनिया ने उन्हें मरा हुआ समझा। सुरों की बेताज ये गायिका हैं शमशाद बेगम।

स्कूल में अपने गानों के लिए शमशाद खूब तारीफ़ें बटोरती थीं। कव्वालियों का शौक रखने वाले उनके चाचा आमिर खान ने उनकी ये काबिलियत पहचानी और साल 1931 में उन्हें  लाहौर की एक बड़ी म्यूजिक कंपनी में ऑडीशन दिलाने ले गए। महज़ 12 साल की शमशाद बेगम ने इस ऑडिशन में जीत हासिल की। टेस्ट पास होते ही उन्हें  12 गानों का कॉन्ट्रैक्ट भी मिल गया। बात खुशी और जश्न की थी, लेकिन परिवार के लिए तो  ये उनके सम्मान पर एक चोट थी। शमशाद के वालिद, मियां हुसैन बख़्श मान को कतई बर्दाश्त नहीं था कि  उनकी बेटी बाहर जाकर गाने गाये। कई मिन्नतों और हाँथ पाँव जोड़ने के बाद, हुसैन बख़्श उनके  गायन के लिए तैयार हुए लेकिन एक शर्त के साथ। मियां हुसैन बख़्श ने शर्त रखी कि शमशाद को गाना बुर्क़ा पहनकर ही गाना होगा। साथ ही, जहां गाएंगी, वहां कोई कैमरा ना हो ताकि कोई उनकी फोटो ना खींच सके।

वालिद की बात मानते हुए शमशाद ने सारे गाने बुर्के में रिकॉर्ड किए। इसके एवज में उन्हें हर गाने के 15 रुपये मिले। इस तरह उन्हें 12 गानों के लिए एक सौ अस्सी  रुपए मिले। शमशाद ने इतनी ख़ूबसूरती से गानों को रिकॉर्ड किया कि बाद में उन्हें इनाम के तौर पर इस एलबम के लिए पांच हज़ार रुपए मिले।

शायद यही वजह भी है कि शमशाद बेगम की तस्वीरें बिल्कुल ना के बराबर हैं। शमशाद ने ताउम्र पिता की इन शर्तों के साथ काम किया और अपना एक मुकाम हासिल किया। एक इंटरव्यू में खुद शमशाद ने बताया था कि उनके परिवार में गाने गाना इतना बुरा माना जाता था कि जब भी वो घर में गुनगुनाती थीं तो उनके भाई उन्हें खूब मारते थे। कहते थे कि ये क्या फालतू काम करती हो।

पति गणपत और शमशाद बेगम

पति गणपत और शमशाद बेगम

शमशाद बेगम ने अपना पहला गीत लाहौर रेडियो पर पेश किया था। साल 1944 में उन्होंने  मुंबई में अपना पहला कदम रखा था। इसके  बाद पूरी दुनिया में शमशाद बेगम की आवाज़ का जादू छा गया। 40 और 50 के दशक में तो हर संगीत लेबल पर उनका ही नाम लिखा रहता था।  कुछ साल गुज़रे ही थे कि उन्हें फिल्मों में बतौर एक्ट्रेस ऑफर आने शुरू हो गए। लेकिन परिवार की बंदिशों की वज़ह से ये सफर कभी शुरू नहीं हो पाया।

हिम्मत की बात ये है की एक रूढ़ीवादी  परिवार से होने के बावजूद भी शमशाद अपनी शर्तों पर जीने का हुनर जानती थीं। गाने के सिलसिले में शमशाद का बाहर आना-जाना लगा रहता था। आस-पड़ोस के लोग भी उनके गाने सुनते थे। इनके पड़ोस में रहना वाला गणपत लाल बट्टो भी इनका प्रशंसक था। एक दिन दोनों की बात शुरू हुई,फिर दोस्ती हो गई। बातचीत का सिलसिला बढ़ा और फिर मोहब्बत हो गई जो परवान चढ़ती गई। मुस्लिम परिवार कि लड़की जिसे बुर्का हटाने तक कि इजाज़त नहीं थी, उसे मोहब्बत हुई भी तो एक हिन्दू लड़के से। सिर्फ धर्म ही नहीं बल्कि दोनों की उम्र में भी बड़ा फ़ासला था। शमशाद महज 13 साल की थीं और गणपत लॉ की पढ़ाई करने वाला एक नौजवान।

ये जानते हुए भी कि परिवार इसके लिए राजी नहीं होगा, शमशाद ने हिंदू गणपत से शादी करने का फैसला कर लिया। ये मोहब्बत उस दौर में परवान चढ़ रही थी  जब देश में  सांप्रदायिक हिंसा चरों तरफ फैली हुई थी। लेकिन, जमाने भर की मुख़ालफ़त  के बावजूद दोनों ने 1934 में शादी कर ली। गणपत ने लाहौर से मुंबई तक शमशाद का हर कदम पर ख़याल रखा। जहां उनके कदम होते, वहां गणपत अपना दिल बिछाए रहते।

शमशाद का मुंबई आने का किस्सा भी काफ़ी दिलचस्प है। 40 के दशक में रेडियो पर शमशाद के गाने सुनकर प्रोड्यूसर महबूब खान इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने शमशाद को मुंबई लाने की ठान ली। जब उनसे मिलने लाहौर पहुंचे तो पहला सामना पति से हुआ। महबूब खान ने शमशाद के पति गणपत से कहा कि अगर शमशाद मुंबई आने के लिए मान जाती हैं तो वो उन्हें वहां आलीशान फ्लैट, कार, आने-जाने की सुविधा और हर ज़रूरी  सामान देंगे। इतना ही नहीं, अगर कुछ लोग उनके साथ आना चाहें तो उनका खर्च भी वो खुद उठाएंगे।

महबूब खान (बाएं) शमशाद बेगम (दाएं)
महबूब खान (बाएं) शमशाद बेगम (दाएं)

शमशाद बेगम खुश थीं। शौक और शौहर दोनों के साथ उनका रिश्ता अच्छा रहा था। गणपत से उनकी एक बेटी भी हुई। लेकिन फ़िर एक ऐसा दौर आया कि सब बिखर गया। गणपत कि एक रोड एक्सीडेंट में मौत हो गई। पति की  मौत के बाद शमशाद टूट गयीं। और इस ग़म में शमशाद ने अपनी आवाज़ को अपने तक सीमित कर दिया। उन्होंने सिंगिंग  इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया। बुरी तरह टूट चुकीं शमशाद ने ज़्यादातर  लोगों से मिलना-जुलना छोड़ दिया और पूरा ध्यान बेटी की परवरिश में लगाया। गाने के जो भी ऑफर घर आते थे, शमशाद उन्हें ठुकरा देती थीं।

करियर की चोटी पर शमशाद ने जब गानों को ठुकराया तब संगीतकारों ने इंडस्ट्री में नयी आई गायिका लता मंगेशकर को काम देना शुरू कर दिया। पर संगीतकार लता मंगेशकर को भी बेगम की स्टाइल में ही गाने को बोलते थे। तमाम गाने हैं जिन्हें लता और उनकी बहन आशा ने शमशाद बेगम के ही अंदाज में गाया है। 

महीनों बीत गए पर शमशाद गानों से दूर ही रहीं। उन्हे मुंबई ले कर आये महबूब खान को ये गवारा न था। अपने गानों के लिए उन्हें चाहिए थी खुली आवाज़ की गायिका, जो शमशाद बेगम थीं। 1957 की फ़िल्म मदर इंडिया के लिए महबूब को नरगिस पर जमने वाली आवाज़ चाहिए थी।

शमशाद ने खूब इनकार किया, लेकिन जीत महबूब को मिली। जब शमशाद ने करीब डेढ़ साल बाद सफेद साड़ी में पहुंचकर ‘पी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली’ गाना रिकॉर्ड किया तो रिकॉर्डिंग स्टूडियो में मौजूद हर शख़्स की आंखें नम थीं।

शमशाद बेगम
शमशाद बेगम

मदर इंडिया के लिए उन्होंने चार गाने गाए और चारों सुपर हिट रहे। इसके बाद हावड़ा  ब्रिज, जाली नोट, लव इन शिमला, मुग़ले आज़म, ब्लफ़ मास्टर और घराना जैसी फिल्मों में भी उनकी  आवाज़  का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला। लेकिन न जाने क्यूँ उनकी वापसी कुछ लोगों को खटकने लगी थी। इस दौर में उन्हे इंडस्ट्री में अपने खिलाफ साज़िश  महसूस होने लगी। शमशाद बेगम कहतीं – मेरे जितने  गाने सुपर हिट होते हैं, मुझे गाने उतने ही कम मिलते हैं। 1966 में उन्होंने ज़्यादातर पंजाबी फिल्मों में गाने गायें। इस बीच उन्हें कुछ हिन्दी फिल्में भी मिलीं,  लेकिन वो ज़्यादातर  B-Grade थीं या उनके गाने लीड रोल पर फ़िल्माए नहीं होते थे। 70-71 तक आते आते फ़िल्म संगीत से शमशाद बेगम पूरी तरह दूर हो चुकी थीं। रिटायरमेंट के बाद वह मुंबई में ही अपनी बेटी और दामाद के साथ एकांतवास में जीने लगीं।

बेटी उषा के साथ शमशाद बेगम

शमशाद गुमनाम हो गयीं लेकिन ताज़्ज़ुब तब हुआ जब दुनिया ने उनकी  मौत से पहले ही उन्हे श्रद्धांजलि दे दी। 1998 में उनके जिंदा रहने के बावजूद भी दुनिया ने उन्हे मृत घोषित कर दिया और धीरे धीरे  भुला भी दिया। इसके बाद  साल 2004 में लोगों को उनकी याद तब आई जब एक पत्रिका के ज़रिये ये बात सामने आयी कि  जिन शमशाद बेगम का 1998 में ही मीडिया में इंतकाल बताया जा चुका है, वह अभी जिंदा हैं। चारों तरफ़ हल्ला मच गया और मीडिया में उनके interviews का तांता लग गया।

शमशाद बेगम
पद्मभूषण सम्मानित शमशाद बेगम

फिर सरकार को भी उनकी सुध मिली और पांच साल बाद भारत सरकार ने 2009 में उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित  किया। अनगिनत गानों को अपनी आवाज़ से सजाकर हमेशा-हमेशा के लिए ज़िंदा रखने वालीं  शमशाद बेगम ने 23 अप्रैल 2013 को मुंबई में आखिरी सांस ली।

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