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इस्लाम में कुर्बानी की बहुत बड़ी फजीलत है

कुर्बानी” (sacrifice) शब्द का अर्थ है “करीबी”। लोग अपने चौपायों को अल्लाह के नाम पर कुर्बान करके इलाही करीबी हासिल करना चाहते हैं। इस्लाम में कुर्बानी का अज्र बहुत बड़ा है। ईद-उल-अजहा पर कुर्बानी करना हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की सुन्नत है। हज़रत सैयदना ज़ैद बिन अरकम (रज़ियल्लाहु अन्हु) फरमाते हैं कि सहाबा (रज़ियल्लाहु अन्हु) ने पूछा, “या रसूल अल्लाह, ये कुर्बानियां क्या हैं?” आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उत्तर दिया, “तुम्हारे बाप हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की सुन्नत है।” सहाबा ने पूछा, “हमारे लिए क्या सवाब है?” आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया, “हर बाल के बदले एक नेकी है।” सहाबा ने पूछा, “और अदन में से?” आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उत्तर दिया, “उसके हर बाल के बदले भी एक नेकी है।”

(इब्ने माजा) हज़रत जाबिर (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने बकरा ईद (Eid al-Adha (ईद उल-अज़हा) के दिन सिंग वाले चितकबरे खस्से दो मेंढ़े ज़बह किए। जब आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने उन्हें क़िब्ला की तरफ़ लिटा दिया।

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