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नए संसद भवन का शुभारंभ: गणेश चतुर्थी के पर्व के साथ नए संकल्प

नए संसद भवन में लोकसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री का संबोधन: आज प्रथम दिवस के प्रथम सत्र में नए सदन में आपने मुझे बात रखने के लिए अवसर दिया है इसलिए मैं आपका बहुत-बहुत आभार व्यक्त करता हूं। इस नए संसद भवन में मैं आप सभी माननीय सांसदों का भी ह्दय से स्वागत करता हूं। ये अवसर कई माइनो में अभूतपूर्व है। आज़ादी के अमृतकाल का ये उषाकाल है और भारत अनेक सिद्धियों के साथ नए संकल्प लेकर के, नए भवन में अपना भविष्य तय करने के लिए आगे बढ़ रहा है। विज्ञान जगत में चंद्रयान-3 की गगनचुंबी सफलता हर देशवासी को गर्व से भर देती है।

भारत की अध्यक्षता में G-20 का असाधारण आयोजन विश्व में इच्छित प्रभाव इस अर्थ में ये अद्वितीय उपलब्धियां हासिल करने वाला एक अवसर भारत के लिए बना। इसी आलोक में आज आधुनिक भारत और हमारे प्राचीन लोकतंत्र का प्रतीक नए संसद भवन का शुभारंभ हुआ है। सुखद संयोग है कि गणेश चतुर्थी का शुभ दिन है। गणेश जी शुभता और सिद्धी के देवता है, गणेश जी विवेक और ज्ञान के भी देवता है। इस पावन दिवस पर हमारा ये शुभारंभ संकल्प से सिद्धी की ओर एक नए विश्वास के साथ यात्रा को आरंभ करने का है।

आजादी के अमृतकाल में हम जब नए सकल्पों के लेकर चल रहे हैं तब, अब जब गणेश चतुर्थी का पर्व आज है तब लोकमान्य तिलक की याद आना बहुत स्वाभाविक है। आजादी के आदोंलन में लोकमान्य तिलक जी ने गणेश उत्सव को एक सार्वजनिक गणेश उत्सव के रूप में प्रस्थापित करके पूरे राष्ट्र में स्वराज्य की आहलेख जगाने का माध्यम बनाया था। लोकमान्य तिलक जी ने गणेश पर्व से स्वराज्य की संकल्पना को शक्ति दी उसी प्रकास से आज ये गणेश चतुर्थी का पर्व, लोकमान्य तिलक जी ने स्वतंत्र भारत स्वराज्य की बात कही थी। आज हम समृद्ध भारत गणेश चतुर्थी के पावन दिवस पर उसकी प्रेरणा के साथ आगे बढ़ रहे हैं। सभी देशवासियों को इस अवसर पर फिर एक बार मैं बहुत-बहुत बधाई देता हूं।

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