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National Reading Day 2026: आज के वक्त में क्यों ज़रूरी हो गया है पढ़ने की आदत को फिर ज़िंदा करना

डिजिटल दौर में जहां मोबाइल स्क्रीन और सोशल मीडिया ने हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा घेर लिया है, वहीं अब एक नई और दिलचस्प बात सामने आ रही है लोग फिर से किताबों की तरफ लौटना चाहते हैं। कागज़ की खुशबू, पन्नों की सरसराहट और कहानी में खो जाने का सुकून आज भी अपनी अलग अहमियत रखता है।

इसी सोच को मज़बूत करने के लिए 2026 को यूनाइटेड किंगडम में ‘National Year of Reading’ के तौर पर मनाया जा रहा है।

भारत में ‘National Reading Day’ की कहानी 

भारत में हर साल 19 जून को National Reading Day मनाया जाता है। यह दिन केरल के मशहूर शिक्षक और पुस्तकालय आंदोलन के जनक P. N. Panicker को समर्पित है। उनका मानना था कि शिक्षा और किताबें किसी भी समाज की तरक्की की असली चाबी हैं।

1909 में जन्मे पनिक्कर ने 1926 में अपने गांव में एक पुस्तकालय की शुरुआत की। 1945 में केरल में पहली सार्वजनिक लाइब्रेरी आंदोलन की नींव पड़ी और देखते ही देखते यह एक बड़ा अभियान बन गया। 1996 में उनकी पुण्यतिथि, 19 जून, को National Reading Day घोषित किया गया। इस दिन लोगों को किताबें पढ़ने, खरीदने और पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए प्रेरित किया जाता है।

किताबों से युवाओं को जोड़ने का नया तरीका

आज की पीढ़ी को पढ़ने के लिए प्रेरित करने का तरीका बदल रहा है। अगर किसी बच्चे को फुटबॉल पसंद है, तो उसे खेल से जुड़ी किताबें दी जाएं। जिसे संगीत पसंद है, उसे गानों के बोल या कलाकारों की कहानियां पढ़ने को मिलें। जब पढ़ाई उनकी दिलचस्पी से जुड़ती है, तो पढ़ना बोझ नहीं, बल्कि मज़ा बन जाता है।

पढ़ने का मतलब सिर्फ़ मोटी किताबें नहीं है। इसमें कहानियां, ग्राफ़िक नॉवेल, कॉमिक्स, ऑडियोबुक, पॉडकास्ट और ई-बुक्स सब शामिल हैं। जो बच्चे खुद को ‘रीडर’ नहीं मानते, वे भी रोज़ाना ऑनलाइन ख़बरें, स्पोर्ट्स रिपोर्ट या गीतों के बोल पढ़ते हैं। यानी पढ़ना हमारी ज़िंदगी का हिस्सा है बस हमें उसका एहसास करना है।

क्यों घट रही है पढ़ने की आदत?

ब्रिटेन में बच्चों और युवाओं के बीच पढ़ने की आदत पिछले 20 सालों में सबसे कम स्तर पर पहुंच गई है। केवल एक तिहाई बच्चे ही खाली समय में किताबें पढ़ना पसंद करते हैं। (Teenage boys)किशोर लड़कों और आर्थिक रूप से कमज़ोर बच्चों में यह गिरावट ज्यादा है।

एक बड़ी वजह स्क्रीन टाइम है। तीन और चार साल के कई बच्चों के पास स्मार्टफोन है और 13 साल से कम उम्र के आधे बच्चे सोशल मीडिया इस्तेमाल करते हैं। लेकिन सिर्फ़ यही वजह नहीं है। गरीबी, लाइब्रेरी बंद होना, माता-पिता की व्यस्तता और संसाधनों की कमी भी बड़ी समस्याएं हैं।

बच्चे के जीवन के पहले 1000 दिन बेहद अहम होते हैं। इस दौरान साथ बैठकर कहानी पढ़ना सिर्फ़ भाषा नहीं सिखाता, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव भी मज़बूत करता है। सोने से पहले कहानी सुनाना एक जादुई पल हो सकता है, जब बच्चा और माता-पिता साथ में एक नई दुनिया में प्रवेश करते हैं।

पढ़ना एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को मिलने वाला तोहफ़ा है। अगर यह सिलसिला टूट गया, तो हम सिर्फ़ किताबें नहीं, बल्कि कल्पना और सोचने की ताकत भी खो देंगे।

स्कूलों, समुदायों और पुस्तकालयों को साथ लाकर एक राष्ट्रीय संवाद तैयार किया जाए। मकसद है हर बच्चे तक किताबें पहुंचाना। लेकिन सिर्फ़ घोषणाएं काफ़ी नहीं हैं। अच्छे पुस्तकालय, प्रशिक्षित लाइब्रेरियन, शिक्षकों पर कम काम का बोझ और ज़रूरतमंद परिवारों को सहायता ये सब ज़रूरी कदम हैं।

भारत में किताबों का बदलता कारोबार

भारत में पढ़ने का स्वरूप तेज़ी से बदल रहा है। ई-बुक्स और ऑडियोबुक्स का बाज़ार लगातार विस्तार कर रहा है। अनुमान है कि 2024 में ई-बुक इंडस्ट्री का रेवेन्यू करीब 236.40 मिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है, जबकि 2027 तक इसके यूज़र्स की संख्या करीब 13.3 करोड़ होने की संभावना है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय भाषाओं का प्रभाव भी मज़बूत बना हुआ है ट्रेड बुक्स की कुल बिक्री में करीब 45 प्रतिशत हिस्सेदारी हिंदी, तमिल, बंगाली जैसी भाषाओं की है। कुल मिलाकर भारत का बुक मार्केट 2024 में करीब 10.37 बिलियन डॉलर (86,000 करोड़ रुपये से अधिक) आंका गया है, जो 2030 तक बढ़कर लगभग 14.6 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।

ये भी पढ़ें: शायर-ए-इंक़लाब: जोश मलीहाबादी की ज़िंदगी और अदबी सफ़र

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