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गौहर जान: वो मशहूर तवायफ़ जिससे महात्मा गांधी ने भी मांगी थी आज़ादी की लड़ाई में मदद

गौहर जान | करीब डेढ़ सौ साल पहले ये उस दिन की बात है जब भारत पर अंग्रेजों की हुकूमत थी। शाही कपड़े और महंगे जेवरात पहने एक औरत बेशकीमती बग्घी में कोलकता की सड़कों पर घूम रही थी। सात घोड़ों वाली इस बग्घी को जब एक अंग्रेज अफ़सर ने देखा तो उसे लगा कि शायद कोई शाही परिवार हो या फ़िर कोई बड़ा अंग्रेज अधिकारी। वह दौड़ कर बग्घी के पास आया और सम्मान में अपना hat उतार कर सर झुका दिया। लेकिन ये सम्मान कुछ ही देर का रहा।

कुछ वक्त बाद ही जब उसे मालूम हुआ कि ये कोई ब्रिटिश या शाही घराने की महिला नहीं, बल्कि एक तवायफ़ थी तो वह गुस्से से आगबबूला हो गया। उसने तुरंत  उस महिला पर एक हज़ार रुपये का जुर्माना लगा दिया। लेकिन वो सातवें आसमान से गिरा जब बदले में उस औरत ने यह कहते हुए दो हज़ार रुपये का जुर्माना भर दिया कि उसके लिए एक हज़ार रुपये की कोई अहमियत नहीं है।

आपको शायद हज़ार, दो हज़ार रुपये की ये रकम बहुत मामूली लगे, लेकिन याद रहे कि ये उस दौर की बात है जब दो हज़ार रुपये में एक माध्यम वर्गीय परिवार में बेटी की शादी हो जाती थी। ये कोई पहली बार नहीं हुआ जब इस नामी तवायफ़ ने ब्रिटिश हुकूमत की मुखालफ़त की। इससे पहले और बाद में भी अपने प्रोग्राम की बहुत ऊंची फीस मांगने की वजह से ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें इसे कम करने की चेतावनी दी थी। लेकिन उन्होंने इन बातों को कभी कोई तवज्जो नहीं दी। अपनी शर्तों पर पूरी ज़िंदगी जीने वाली इस महिला का नाम था ‘गौहर जान’। ये कहानी  गौहर के फ़र्श से अर्श और अर्श से फ़िर से फ़र्शपर आने की है।

तस्वीर साभार: theprint (बाएं) last.fm (दाएं)

ईसाई परिवार में लिया था जन्म

आज दुनिया भले ही उन्हें गौहर जान के नाम से जानती हो, पर ये उनका असली नाम नहीं था। माँ बाप बड़े प्यार से अपनी इस बेटी को नाम दिया था एंजेलिना योवार्ड। एंजेलिना  का जन्म 18 जून 1873 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ। पति से तलाक के बाद माँ विक्टोरिया एक मुस्लिम जमींदार ‘खुर्शीद’ के साथ बनारस आ गईं और अपना धर्म बदल कर  मलका जान बन गईं, और एंजेलिना बन गई गौहर जान। बनारस में गौहर के लिए ज़िंदगी आसान नहीं थी। गौहर जब महज़ 13 साल की थी तो उसके साथ रेप जैसी घीनौनी वारदात हुई। दर दर गुहार लगायी लेकिन कभी कोई सुनवाई नहीं हुई। इसके बाद तो गौहर ने अपनी किस्मत खुद बदलने की सोची और खुद को संगीत में रमा दिया। माँ मलका जान को शुरू से ही शास्त्रीय नृत्य संगीत में काफ़ी रुचि थी। इसलिए अपनी बेटी गौहर जान को भी उन्होंने इसकी तालीम दिलवाई। कोई यू हीं तो अपने पहले प्रदर्शन से शाही दरबार में जगह नहीं बना पाता।

पहली गायकी से बनाई राज दरबार में जगह

गौहर जान वैसे तो हर जगह अपनी माँ के साथ ही गाना गाने जाती थीं, लेकिन 1887 में जब उन्होंने दरभंगा राज्य में अपनी सोलो परफॉरमेंस दी तो पूरा दरबार उनकी गायकी का मुरीद हो गया। उन्हे वहां का दरबारी संगीतकार बना दिया गया। गौहर की आवाज़ के तो लोग वैसे ही कायल थे, पर अपने नृत्य से समा बांध देने का गुण भी उनके अंदर है ये लोगों को तब मालूम हुआ जब 1896 में तब के कलकत्ता में उन्होंने नृत्य प्रदर्शन किया। औरतों को जब घूंघट से बाहर आने तक की इज़ाज़त नहीं थी तब कलकत्ता में इन्हें 1st dancing girl का खिताब दिया गया। 

कलकत्ता में प्रदर्शन के बाद उनकी लोकप्रियता चारों तरफ फैल गयी। साथ ही इनकी रईसी और रुतबा भी बढ़ता गया। देखते ही देखते वो बन गयीं दुनिया की सबसे मशहूर और महंगी तवायफ़। आपको बता दें, उस दौर में तवायफ़ों का जिस्मफ़रोशी से कोई वास्ता नहीं था। उनका रिश्ता था तो सिर्फ़ राग, गीत और संगीत से। तवायफें तहज़ीब कि पाठशाला हुआ करती थीं।

तस्वीर साभार: homegrown

देश की पहली रिकॉर्डिंग सुपरस्टार

ये वो वक़्त था जब रुपये की कीमत बहुत ज़्यादा थी और गौहर उस वक्त भी करोड़पति थी। गौहर जहां भी जातीं एक हजार रुपये का नज़राना लिए बगैर गाना शुरू नहीं करतीं थीं। यही वजह थी कि वो सिर्फ महंगी महफिलों और राजसी दरबारों में ही गाती थीं। आम लोग भी उनके गानों के बहुत दीवाने थे, लेकिन ये लोग न तो इतनी महंगी रकम चुका सकते थे, न ही राजसी महफिलों में इन्हें आने की इज़ाज़त थी। भारत में नयी नयी आयी ग्रामोफ़ोन कंपनी ने इस बाज़ार को समझा और मौके का फ़ायदा उठाने की सोची। 

ग्रामोफोन कॉम्पनी ने गौहर से जब उनकी आवाज़ रिकॉर्ड करने की बात कही तो उन्होंने एक गाना गाने के लिए तीन हज़ार रुपये लेने की शर्त राखी। ये रकम मंज़ूर भी कर ली गयी । तारीख थी, 2 नवंबर 1902, वो तारीख़  जब पूरे देश ने पहली बार ग्रामोफोन पर किसी औरत की गुनगुनाती आवाज़ सुनी। इस दिन वो एशिया की ऐसी पहली सिंगर बनीं जो इलेक्ट्रॉनिक तरीके से रिकॉर्ड की गयी। लोगों ने इनकी आवाज़ इतनी पसंद की कि 1902 से लेकर 1920 तक गौहर जान की आवाज़ में  हिन्दी, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल, अरबी, फ़ारसी  गीतों के 600 डिस्क निकाले गए।  गौहर जब भी गाने रिकार्ड करने जातीं, उनके जेवरात और कपड़े हमेशा नए होते। उनकी रिकॉर्डिंग की एक ख़ास बात और थी कि अपने गाने के आख़िर में वो कहतीं थीं  ‘My name is Gauhar Jaan’

बिल्ली की शादी में खर्च किए करोड़ों रुपये

गौहर के बारे में एक किस्सा और भी बड़ा मशहूर है। कहते हैं उन्होंने अपनी पालतू बिल्ली की शादी में पूरे 20,000 रुपये खर्च किए, जिसकी कीमत आज के समय में 9 करोड़ 6 लाख रुपये के बारे के बराबर होगी। गौहर के चाहने वालों की फौज देश ही नहीं, विदेशों में भी थी। गौहर की फोटो Austria में बनी माचिस की डिब्बियों पर छपती थी। कहीं भी महफ़िल जमती तो गौहर वहां की शान होती।  उनके लिए कहा जाता था, ‘महफ़िल बिना गौहर जैसे शौहर बिना दुल्हन’। 

तस्वीर साभार: getbengal

स्वराज फंड इकट्ठा करने के लिए गांधी ने मांगी मदद

जब पूरा भारत आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, तो महात्मा गांधी ने भी स्वराज फंड में पैसे जमा करने के लिए गौहर जान को भी संदेश भेजा था। गौहर ने बदले में शर्त रखी कि वो गाना तभी शुरू करेंगी जब बापू भी उस महफ़िल में हो। उस वक्त तो महात्मा गांधी ने हामी भर दी पर मौके पर आए नहीं। गौहर पूरी रात इंतज़ार करती रहीं। अगले दिन जब फंड के पैसे लेने गांधी ने शौकत अली को भेजा तो गौहर गुस्से से भरी बैठी थीं। वो बोलीं–  “आपके बापू ईमान की बात तो करते हैं, लेकिन एक मामूली तवायफ़ से किया अपना वादा भी न पूरा कर सके। वो खुद नहीं आये इसलिए स्वराज फंड अब आधी रकम का ही हकदार बनता है”। 

तस्वीर साभार: scroll (बाएं) ndtv (दाएं)

अकबर इलाहाबादी और गौहर का मशहूर किस्सा

गौहर एक बार इलाहाबाद गयीं जो आज प्रयागराज कहलाता है। वहां उनकी मुलाकात अकबर इलाहाबादी से हुई। अकबर इलाहाबादी ने उनके लिए एक कागज़ पर शेर लिखा और गौहर को पढ़ने के लिए थमा दिया।  इस पर लिखा था ‘खुशनसीब आज कौन है भला गौहर के सिवा, सब कुछ अल्लाह ने दे रखा है शौहर के सिवा’  जी हाँ, गौहर की ज़िंदगी में शौहर तो आये लेकिन फिर भी तन्हाई के सिवा कुछ भी न आया। उन्होंने शादी की सैय्यद गुलाम अब्बास से। अब्बास उनके तबलावादक थे। लेकिन शादी के बावजूद भी गौहर तन्हा ही रहीं क्योंकि अब्बास शायद उनके नहीं, उनकी दौलत के दीवाने थे। अब्बास ने कुछ वक्त बाद उन्हें कानूनी दांव-पेंच में उलझा दिया और उनकी आधी से ज़्यादा जायदाद हड़प ली। मां गुज़र गई तो रिश्तेदारों ने भी उनकी दौलत को बहुत बर्बाद किया। हालात ऐसे हो गए कि कभी करोड़पति रही इस गायिका को दर-दर कि ठोकरें खानी पड़ गयीं।

तस्वीर साभार: paperjewels (बाएं) peopleofar (दाएं)

चार दिन बाद छपी मौत की ख़बर

न वो आवाज़ के दीवानों की महफिलें रहीं, न वो शानो शौकत। वो रूतबा, वो पैसा, ज़मीन जायदाद, और ख़ुद गौहर जान, गुमनामी के अंधेरों में खोते चले गए। मुफ़लिसी और गुमनामी के बीच ज़िंदगी जी रही गौहर ने 17 जनवरी 1930 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया। हैरानी और दुःख की बात ये रही कि उनकी मौत की खबर चार दिन बाद अखबार में महज़ चार लाइनों में छपी। ऐसी शख़्सियत जिसने हिंदुस्तानी संगीत को नई ऊंचाई दी, अपनी शर्तों ज़िंदगी जी, और सबसे बड़ी बात आज़ादी की लड़ाई में शिरकत की, वो अपने आख़िरी दिनों में एकदम तन्हा हो गयी थी। करोड़पति रही उस औरत के पास अपने इलाज़ तक के लिए पैसे न रहे।और वक़्त के साथ गौहर जान भी महज़ इतिहास का एक पन्ना भर बन कर रह गयीं।

इसे भी पढ़ें: क्रिकेट का ‘काबुलीवाला’- अब्दुल अज़ीज़ की दिलचस्प कहानी

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