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हज़ और क़ुर्बानी: एक मुस्लिम धर्मिक प्रक्रिया

कुरान करीम में हज़ और क़ुर्बानी का भी जिक्र है। इस्लामी वचनों में हज़ धर्मिक यात्रा के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखता है, और यह इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की वाणी का प्रमाण है। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की परीक्षा के दौरान भी एक रक्षास की घटना का वर्णन किया गया है, जब उन्हें अपने पुत्र इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की क़ुर्बानी करने के लिए आदेश दिया गया था। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने अपनी नेकी और आस्था का प्रदर्शन करते हुए खुदा की आदेश का पालन किया।

आयत 2 में अल्लाह तआला ने कहा है, “अहले किताब! हज़ का महीना वक्त याद करो, जब हमने इब्राहीम को परखा था कि क्या वह हमारे वादे को सच मानता है या नहीं, और हमने उनसे कहा था कि अपनी राह चलते रहो और अपनी घूसल, अपने सिर और पैर को सफ़ेद करो और क़ाबिले की जगह को पावन करो।” इससे स्पष्ट होता है कि हज़ धार्मिक यात्रा के दौरान मुसलमानों को आत्म-शुद्धि के लिए अपने शरीर को सफाई करनी चाहिए और हज़ क्षेत्र को पवित्र बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

हज़: धार्मिक यात्रा में आत्म-शुद्धि और पवित्रता

इसलिए, हर साल जब हज़ का महीना आता है और जुल हिज्जा का चांद दिखता है, मुसलमान जो हज़ करने का संभावना नहीं रखते हैं, वे ईद-उल-अज़हा के दिन क़ुर्बानी करके अपनी आस्था का प्रदर्शन करते हैं। इसके अलावा, वे अपने बाल और नाख़ूनों को भी काटने से बचाते हैं और बुराईयों से दूर रहने का प्रयास करते हैं। इन तरीकों से वे अपनी आस्था और धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हैं।

कुरान करीम में हज़ और क़ुर्बानी का भी जिक्र है। अल्लाह तआला फ़रमाता है, “अहले किताब! हज़ का महीना वक्त याद करो, जब हमने इब्राहीम को परखा था कि क्या वह हमारे वादे को सच मानता है या नहीं, और हमने उनसे कहा था कि अपनी राह चलते रहो और अपनी घूसल, अपने सिर और पैर को सफ़ेद करो और क़ाबिले की जगह को पावन करो।” (सूरह बकर, आयत 2)

हज़ के दौरान हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) की परीक्षा के दौरान एक रक्षास की घटना भी हुई। उन्हें खुदा ने अपने पुत्र इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की कुर्बानी के लिए आदेश दिया। इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने खुदा के आदेश का पालन करते हुए इस्माईल (अलैहिस्सलाम) की कुर्बानी के लिए तैयार हो गए। इस घटना से उनकी परीक्षा और नेकी की प्रशंसा की गई।

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