कोलकाता के एक आम घर में जन्म लेने वाली शर्मिला मोना सिन्हा ने बचपन में ये महसूस किया कि बेटी होना अपने साथ कुछ ऐसी उम्मीदें लाता है, जिनसे कभी पूरी तरह आज़ादी नहीं मिलती। तीसरी बेटी होने के नाते उन्हें अक्सर लगता कि काश वो लड़का होतीं और वह सब कर पातीं जो लड़के करते हैं। लेकिन वक्त ने करवट ली। वॉल स्ट्रीट पर अपनी पहचान बनाने के बाद उन्होंने फ़िलैंथ्रॉपी और औरतों के हक़ूक़ के मैदान में क़दम रखा। और अब, दशकों बाद, शर्मिला मोना सिन्हा (Sharmila Mona Sinha) को अमेरिका के मशहूर ‘नेशनल वुमेन्स हॉल ऑफ फेम’ (America’s renowned ‘National Women’s Hall of Fame’) में शामिल किया गया है। ये सम्मान उन्हें 24 सितंबर को न्यूयॉर्क के सेनेका फॉल्स में दिया गया। पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, वो इंद्रा नूयी के बाद इस हॉल ऑफ फेम में जगह पाने वाली दूसरी भारतीय मूल की औरत हैं (She is the second woman of Indian origin, after Indra Nooyi, to be inducted into this Hall of Fame)। ये संस्था औरतों की कामयाबियों को मान्यता देती है और अमेरिकी औरतों की हक़ूक़ की शुरुआती तहरीक से जुड़े शहर में मौजूद है।
बचपन की तल्ख़ यादों से लेकर औरतों की आम ज़िंदगी में शिरकत का नया नज़रिया
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, शर्मिला (Sharmila Mona Sinha) की परवरिश ने जेंडर असमानता की उनकी समझ को गहराई दी। ऐसे माहौल में बड़ी होना, जहां बेटों को तरजीह दी जाती थी, उन्हें बेटी होने की मजबूरियों से वाक़िफ़ कर गया। उन्होंने कहा, ‘मैं लड़का बनना चाहती थी और वो करना चाहती थी जो लड़के करते थे।’ ये तजुर्बा उनके पूरे बचपन का तअ’रूफ़ तो नहीं था, लेकिन औरतों के साथ होने वाले ग़ैरबराबर सुलूक को समझने का एक अहम ज़रिया ज़रूर बना। कोलकाता में मदर टेरेसा के एक यतीमख़ाने में वॉलंटियरिंग के दौरान उन्होंने देखा कि लड़कों को लड़कियों से जल्दी गोद ले लिया जाता था। ये बात उनके ज़ेहन में घर कर गई कि जेंडर एक बच्चे के परिवार मिलने की उम्मीदों को कैसे मिटा सकता है। किशोरावस्था में उन्हें पता चला कि उनकी दादी ने हिंदुस्तान की आज़ादी की तहरीक में औरतों को तंज़ीम करने में मदद की थी। ये ख़ानदानी विरासत उन्हें औरतों की आम ज़िंदगी में शिरकत का नया नज़रिया दिया।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी से कॉर्पोरेट अमेरिका और फ़िलैंथ्रॉपी तक का सफ़र
18 साल की उम्र में शर्मिला हिंदुस्तान छोड़कर मैसाचुसेट्स के स्मिथ कॉलेज गईं। इकनॉमिक्स में डिग्री ली और बाद में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एमबीए किया। उन्होंने मॉर्गन स्टेनली में इन्वेस्टमेंट बैंकर के तौर पर काम शुरू किया। प्रॉक्टर एंड गैंबल, यूनिलीवर और एलिज़ाबेथ आर्डेन जैसी कंपनियों (Companies such as Procter & Gamble, Unilever, and Elizabeth Arden) के साथ काम किया। यहीं से उन्होंने फंडरेज़िंग, मैनेजमेंट और स्ट्रैटेजी के गुर सीखे, जिन्हें बाद में उन्होंने समाजी कामों में लगाया। वो ‘Women Moving Millions’ की लीडर बनीं, जिसके मेंबर्स ने औरतों और लड़कियों के लिए काम करने वाली तंज़ीमों को तक़रीबन 1 अरब डॉलर दिए हैं। उन्होंने ‘Raising Change’ की शुरुआत में भी हाथ बंटाया। स्मिथ कॉलेज में ट्रस्टी के तौर पर ‘Women for the World’ कैंपेन चलाया, जिसमें करीब 486 मिलियन डॉलर जमा हुए। वो ऑस्कर नॉमिनेटेड डॉक्युमेंट्री ‘टू किल ए टाइगर’ की एग्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर (Executive producer of the Oscar-nominated documentary ‘To Kill a Tiger’) भी रहीं।
क़ानूनों से टकराव और ‘पावर शेयरिंग’ का पैग़ाम
2022 से वो ‘Equality Now’ की सीईओ हैं, जो औरतों और लड़कियों के क़ानूनी हक़ूक़ के लिए लड़ती है। उनके इस सफ़र को ‘National Women’s Hall of Fame’ में जगह मिली, जहां रोज़ा पार्क्स, माया एंजेलो और मिशेल ओबामा जैसी 300 से ज़्यादा औरतें शामिल हैं।
अपनी इंडक्शन स्पीच में उन्होंने अपनी मां की आदत का ज़िक्र किया, जो हर रोज़ एक मुट्ठी चावल किसी ज़रूरतमंद के लिए अलग रखती थीं। उन्होंने कहा, “मैं ये बेनज़ीर सम्मान अकेले अपना नहीं समझती। मैं इसे एक मुट्ठी चावल की तरह लेती हूं, जो मेरे हाथ में यह ज़िम्मेदारी देती है कि मैं इसे आगे बढ़ाऊं।” उन्होंने आगे कहा, “मैंने ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा ताक़त के बारे में सोचते हुए गुज़ारा है। वॉल स्ट्रीट, कारोबार, फ़िलैंथ्रॉपी और औरतों की बराबरी की जंग (Wall Street, business, philanthropy, and the fight for women’s equality) में मैंने देखा कि आख़िरकार ताक़त यह तय करती है कि किसकी आवाज़ है, किसका चुनाव है और कौन हमारी ज़िंदगी को शक्ल देता है।’ उन्होंने ये भी कहा, “हमें सिखाया जाता है कि ताक़त महदूद है, अगर मैं तुम्हें कुछ दूं, तो मेरे पास कम रह जाएगी। मेरी ज़िंदगी ने मुझे उल्टा सिखाया। ताक़त बांटने से ताक़त दुगुनी हो जाती है। मैं यहां खड़ी हूं क्योंकि बहुतों ने अपनी ताक़त मेरे साथ बांटी।”

शर्मिला मोना सिन्हा की कहानी ये साबित करती है कि तीसरी बेटी होना कमज़ोरी नहीं, बल्कि एक ऐसी ताक़त है जो दुनिया के तौर-तरीक़े बदल सकती है।
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