उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे हुए हैं, जिन्होंने अपने कलाम से न सिर्फ़ लोगों के दिलों को छुआ, बल्कि अपनी शख़्सियत और ख़िदमात से भी एक अलग पहचान बनाई। सिकंदर अली वज्द ऐसे ही एक क़ाबिल शायर थे। उनकी शायरी में ज़िंदगी के तजुर्बे, ग़म की कैफ़ियत, उम्मीद की रौशनी और अपने वतन से मोहब्बत के रंग दिखाई देते हैं। वे ग़ज़ल और नज़्म, दोनों पर समान रूप से महारत रखते थे। उनकी शायरी में सादगी भी थी और गहराई भी, जो पढ़ने और सुनने वालों को अपने साथ जोड़ लेती थी।
हैदराबाद सिविल सर्विस से करियर की शुरुआत
सिकंदर अली वज्द की पैदाइश 22 जनवरी 1914 को महाराष्ट्र के औरंगाबाद में हुयी थी। बचपन से ही अदब और इल्म से उनका रिश्ता मज़बूत होता गया। उन्होंने अपनी ज़िंदगी में साहित्य और सरकारी सेवा, दोनों को अहमियत दी। साल 1935 में उनका चयन हैदराबाद सिविल सर्विस में हुआ। इसके बाद उन्होंने न्यायिक सेवा में काम किया और मुंसिफ़ मजिस्ट्रेट के पद पर नियुक्त हुए।
सरकारी सेवा में आगे बढ़ते हुए वे सेशंस जज के पद तक पहुंचे और इसी ओहदे से रिटायर हुए। उनकी शख़्सियत की ख़ास बात यह थी कि न्यायिक सेवा की ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ उनका साहित्यिक सफ़र भी लगातार जारी रहा। वे अदालत में क़ानून और इंसाफ़ से जुड़े मामलों को देखते थे, तो दूसरी ओर उनकी शायरी इंसानी ज़िंदगी के एहसासात और तजुर्बों को बयान करती थी।
साल 1972 में सिकंदर अली वज्द महाराष्ट्र से राज्यसभा के लिए चुने गए।
शायरी में ग़म के साथ उम्मीद भी
सिकंदर अली वज्द की शायरी का एक अहम पहलू यह था कि वे मुश्किल हालात में भी उम्मीद की गुंजाइश तलाशते थे। उनके अशआर में इंसान की तकलीफ़, दिल की कैफ़ियत और वक़्त के साथ बदलती ज़िंदगी का बयान मिलता है।
ज़ुल्मत-ए-शब ही सहर हो जाएगी
शिद्दत-ए-ग़म चारा-गर हो जाएगी
इन अशआऱ में अंधेरी रात के बाद सवेरा होने का यक़ीन दिखाई देता है। शायर मानो कहता है कि ग़म चाहे कितना ही गहरा क्यों न हो, हमेशा एक जैसा नहीं रहता। वक़्त बदलता है और मुश्किलों के बीच से भी राहत का रास्ता निकल सकता है। यही उम्मीद उनकी शायरी को ख़ास बनाती है।
रोने वाले यूं मुसीबत पर न रो
ज़िंदगी इक दर्द-ए-सर हो जाएगी
यहां शायर इंसान को ग़म से घबराने के बजाय उसका सामना करने की बात कहता है। ज़िंदगी में परेशानियां आती रहती हैं, लेकिन अगर इंसान हर वक़्त उन्हीं में उलझा रहे, तो जीने का सुकून भी खो सकता है। उनके कलाम में ऐसे ही ख़याल मिलते हैं, जो इंसान को अपने हालात पर सोचने का मौक़ा देते हैं।
वज्द की शायरी सिर्फ़ ग़म और उदासी तक महदूद नहीं थी। उसमें मोहब्बत, याद और दिल के रिश्तों की नज़ाकत भी थी।
देर से आ रही है याद तेरी
क्या तुझे याद आ रहा हूं मैं
इन दो मिसरों में याद की एक दिलचस्प कैफ़ियत सामने आती है। शायर महबूब को याद करते हुए यह सवाल भी करता है कि क्या दूसरी तरफ़ भी उसे याद किया जा रहा है। यही सादगी और दिल से निकला हुआ अंदाज़ उनके अशआर को असरदार बनाता है।
फ़ज़ा जां-फ़ज़ा ज़र्रा-ज़र्रा हसीं है
हक़ीक़त में मुल्क-ए-दकन गुलज़मीं है
उर्दू अदब की ख़िदमत और पद्मश्री सम्मान
सिकंदर अली वज्द ने अपनी शायरी के ज़रिए उर्दू अदब को ख़ुशहाल किया। वे महाराष्ट्र में अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू के अध्यक्ष भी रहे। इस ज़िम्मेदारी के ज़रिए उनका जुड़ाव उर्दू भाषा और साहित्य को आगे बढ़ाने वाली सरगर्मियों से रहा।
साल 1970 में उन्हें साहित्य के क्षेत्र में उनकी ख़िदमात के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी साहित्यिक उपलब्धियों की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान का प्रतीक था।
उनकी प्रमुख काव्य कृतियों में ‘लहू-तरंग’, ‘आफ़ताब-ए-ताज़ा’, ‘अवराक़-ए-मुसव्विर’ और ‘बयाज़-ए-मरयम’ के नाम शामिल हैं। दस्तियाब तफ़सिलात के मुताबिक, ‘लहू-तरंग’ 1944 में, ‘आफ़ताब-ए-ताज़ा’ 1952 में और ‘बयाज़-ए-मरयम’ 1974 में प्रकाशित हुई थीं। उनकी तीसरी काव्य कृति ‘अवराक़-ए-मुसव्विर’ का विमोचन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने किया था। यह उनके साहित्यिक सफ़र से जुड़ा एक अहम पड़ाव था।
वज्द उर्दू के साथ फ़ारसी और अंग्रेज़ी भाषा पर भी अच्छी पकड़ रखते थे। उनकी आवाज़ भी सुरीली बताई जाती है। जब वे अपनी ग़ज़लें और नज़्में तरन्नुम में पेश करते थे, तो सुनने वाले उनके कलाम में डूब जाते थे। इस तरह उनका रिश्ता सिर्फ़ लिखने तक सीमित नहीं था, बल्कि वे अपनी आवाज़ और अंदाज़ से भी महफ़िलों में असर पैदा करते थे।
विरासत जो आज भी ज़िंदा है
सिकंदर अली वज्द का इंतक़ाल 16 जून 1983 को औरंगाबाद में हुआ। लेकिन उनके जाने के बाद भी उनकी साहित्यिक विरासत को ज़िंदा रखने की कोशिशें जारी रहीं। औरंगाबाद में उनके नाम से सिकंदर अली वज्द मेमोरियल ट्रस्ट साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने का काम करता है। शहर के टाउन हॉल के पास उनके नाम से एक सभागार भी मौजूद है।
सिकंदर अली वज्द की ज़िंदगी इस बात की मिसाल है कि इंसान अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान बना सकता है। उन्होंने न्यायिक सेवा में ज़िम्मेदारियां निभाईं, सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लिया और साथ ही उर्दू शायरी की दुनिया में भी अपनी जगह बनाई।
उनकी शायरी में ग़म के साथ उम्मीद, याद के साथ मोहब्बत और अपनी मिट्टी के साथ गहरा रिश्ता दिखाई देता है। उनके अशआर आज भी पाठकों को ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव को समझने और मुश्किल वक़्त में उम्मीद का दामन थामे रखने का पैग़ाम देते हैं। यही वजह है कि सिकंदर अली वज्द का नाम उर्दू अदब की उस रवायत का हिस्सा है, जहां लफ़्ज़ सिर्फ़ ख़याल बयान नहीं करते, बल्कि दिलों तक पहुंचकर एक एहसास बन जाते हैं।
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