पंजाब (Punjab) की तहज़ीब में हाथों से स्वेटर और जुराबें बुनने (Knitting) की रिवायत काफ़ी पुरानी और गहरी रही है। सलाइयों की मदद से धागों को आपस में जोड़कर ऊनी कपड़े तैयार करना एक हुनर है। लेकिन ये हुनर असल में पंजाब (Punjab) का अपना नहीं था। 19वीं सदी से पहले पंजाब (Punjab) में सर्दियों के दौरान ऊनी स्वेटर पहनने का रिवाज नहीं था। अमीर लोग पश्मीना शॉल या लोई ओढ़ते थे, जो बारीक ऊन से बनी चादरें होती थी। वहीं, आम लोग मोटे खद्दर के कपड़े पहनते थे, रूई भरे कुर्ते इस्तेमाल करते थे और ठंड से बचने के लिए कंबल ओढ़ते थे।
ब्रिटिश हुकूमत के दौर में यूरोप से आए ईसाई मिशनरियों ने उत्तर भारत और पंजाब (Punjab) में बुनाई (Knitting) के इस हुनर को शुरू किया और इसे फैलाया। शुरुआत में मिशनरी स्कूलों, अनाथ आश्रमों और जेलों में महिलाओं को जुराबें बुनना सिखाया जाता था। इसी वजह से पंजाबी में लंबे समय तक इस हुनर को “जुराब बुनना” ही कहा जाता रहा। हालांकि, धीरे-धीरे ये हुनर इतना मशहूर हुआ कि पंजाब (Punjab) के लगभग हर घर की पहचान बन गया।
रेडियो, धूप और सलाइयां
20वीं सदी के बीच तक आते-आते स्वेटर बुनना पंजाबी औरतों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा बन गया था। सर्दियों के दिनों में घर के आंगन या छत पर गुनगुनी धूप में चारपाइयों पर बैठकर औरतों की महफ़िलें सजती थी। एक तरफ़ रेडियो पर गाने बजते थे, तो दूसरी तरफ़ रंग-बिरंगे ऊन के गोलों से स्वेटर बुनती सलाइयों की आवाज़ सुनाई देती थी।
ये महफ़िलें पुराने ज़माने के ‘त्रिंझण’ की ही एक नई शक्ल थी। त्रिंझण में भी औरतें एक साथ बैठकर अपने काम करती थी और सुख-दुख बांटती थी।

इन महफ़िलों में औरतें एक-दूसरे से स्वेटर बुनने (Knitting) के नए-नए डिज़ाइन सीखती थी। इनमें गूंथी हुई बुनाई, जालीदार डिज़ाइन और अलग-अलग रंगों से बनने वाले पैटर्न शामिल थे। माएं अपनी बेटियों के दहेज के लिए ख़ास स्वेटर, कोटियां और शॉल भी बुनती थी। उस दौर में हाथों से बुना हर स्वेटर सिर्फ़ सर्दी से बचने का ज़रिया नहीं था, बल्कि उसमें परिवार का प्यार, सब्र और अपनापन भी झलकता था।
रिसाले और रंग-बिरंगे धागे
उस दौर में स्वेटर बुनने (Knitting) के शौक़ को बढ़ावा देने में अख़बारों और रिसालों का भी बड़ा हाथ था। ‘द ट्रिब्यून’ जैसे बड़े अख़बारों में अलग-अलग तरह के ऊन, बुनाई (Knitting) के लिए नई सलाइयों और विदेशी धागों के इश्तिहार छपते थे। ‘इंडिया लेडीज़ मैगज़ीन’ और ‘गुड नीडलवर्क एंड निटिंग’ जैसे रिसालों में कार्डिगन और दस्ताने बनाने के पूरे डिज़ाइन छपते थे। ये विदेशी रिसाले काफ़ी महंगे होते थे। इसलिए औरतें पूरा रिसाला ख़रीदने के बजाय उसमें दिए गए डिज़ाइनों को कॉपियों में उतारकर संभालकर रख लेती थी।
उस समय शिमला और लाहौर फ़ैशन के बड़े मरकज़ हुआ करते थे। वहां के मशहूर स्टोरों से ख़ास तौर पर अच्छी क़िस्म का ऊन मंगवाया जाता था। पंजाब (Punjab) की औरतों ने यूरोप से आए बुनाई (Knitting) के डिज़ाइनों को अपने देसी अंदाज़ में ढाला। उन्होंने ऐसे ख़ूबसूरत स्वेटर और दूसरे ऊनी कपड़े तैयार किए, जो दिखने में बेहद शानदार होने के साथ-साथ मज़बूत भी होते थे।

लुधियाना बना ऊनी कपड़ों की राजधानी
पंजाब (Punjab) में हाथों से स्वेटर बुनने की रिवायत के साथ-साथ मशीनों से बुनाई (Knitting) का काम भी तेज़ी से बढ़ने लगा। 20वीं सदी की शुरुआत तक लुधियाना इस कारोबार का एक बड़ा मरकज़ बनकर उभरा। 1911 तक शहर में जुराबें बनाने के लिए 150 मशीनें और बनियान बनाने के लिए आठ मशीनें लगाई जा चुकी थी। 1947 के बाद, जब लाखों लोग पंजाब (Punjab) आए, तो उनकी मेहनत और हुनर ने लुधियाना के होज़री कारोबार को पूरे देश में मशहूर कर दिया।
शहर में ऊन से धागा बनाने, उसे रंगने और कपड़े बुनने के लिए बड़े पैमाने पर फैक्ट्रियां लगाई गईं। कुछ ही दशकों में लुधियाना के इस औद्योगिक बदलाव ने उसे ‘भारत का मैनचेस्टर’ कहलाने का सम्मान दिलाया। यहां बने ऊनी कपड़े और स्वेटर सिर्फ़ भारत के अलग-अलग हिस्सों में ही नहीं, बल्कि रूस, मिडिल ईस्ट और यूरोप जैसे देशों में भी भेजे जाने लगे।

घर की इस कला में आई गिरावट
बदलते वक़्त के साथ पिछले दो-तीन दशकों में पंजाब (Punjab) के घरों में हाथों से स्वेटर बुनने (Knitting) का रिवाज कम होता गया है। बाज़ार में सस्ते, रेडीमेड और नए फ़ैशन के मशीन से बने स्वेटर मिलने लगे हैं। ऐसे में महीनों तक मेहनत करके हाथों से स्वेटर बुनने (Knitting) का चलन धीरे-धीरे कम हो गया। इसके अलावा, आज की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी, पढ़ाई और नौकरी की भागदौड़ के चलते नई पीढ़ी की लड़कियां भी सलाइयों से स्वेटर बुनने से दूर होती चली गईं।
अब गांवों और शहरों के आंगनों में सर्दियों की धूप में बैठकर ऊन के धागे सुलझाने और नए-नए डिज़ाइन बनाने के पुराने नज़ारे बहुत कम देखने को मिलते हैं। इस तरह, वक़्त के साथ ये घरेलू हुनर, जो कभी परिवार के लोगों को एक-दूसरे के क़रीब लाता था, अब धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों तक सिमटता जा रहा है।

नया दौर और इस हुनर की वापसी
पिछले कुछ सालों में स्वेटर बुनने (Knitting) की इस कला ने नए अंदाज़ में फिर से अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है। आज दुनियाभर में हाथों से बनी चीज़ों की क़द्र बढ़ रही है। साथ ही, तनाव कम करने और सुकून पाने के लिए भी लोग बुनाई (Knitting) को अपना रहे हैं। ख़ास तौर पर, सोशल मीडिया के ज़रिए पंजाब के युवा कलाकार क्रोशिया और ऊन की बुनाई (Knitting) से नए-नए डिज़ाइन तैयार कर रहे हैं। इनमें टोपियां, स्टाइलिश मफ़लर, खिलौने और घर में इस्तेमाल होने वाली कई तरह की चीज़ें शामिल हैं।

यही वजह है कि अब ये कला सिर्फ़ सर्दी से बचने का ज़रिया नहीं रही, बल्कि फ़ैशन, अपनी पसंद के मुताबिक़ चीज़ें बनाने और एक नए शौक़ के तौर पर भी उभर रही है। पंजाब (Punjab) में बुनाई (Knitting) का ये सफ़र बताता है कि कैसे बाहर से आया एक हुनर धीरे-धीरे यहां की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गया। वक़्त के साथ बहुत कुछ बदला, लेकिन इस कला ने आज भी पंजाब की विरासत में अपनी ख़ास जगह बना रखी है।
लेख: मनमीत कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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