उम्र सिर्फ़ एक नंबर है। अगर हौसला हो, तो किसी भी उम्र में अपने ख़्वाबों को ज़िंदा रखा जा सकता है। इस बात की मिसाल हैं 65 साल की गुरबख़्श कौर (Gurbaksh Kaur), जिन्होंने पंजाब सरकार की तरफ़ से करवाई जा रही ‘खेड़ा वतन पंजाब दियां’ में हिस्सा लिया और 200 मीटर की दौड़ में पहला मुक़ाम हासिल किया। इस कहानी को और भी ख़ास बनाता है उनका 14 साल का पोता जोबनप्रीत सिंह, जिसने भी इन खेलों में हिस्सा लिया। दादी और पोते की इस जोड़ी ने एक साथ खेल के मैदान में उतरकर साबित कर दिया कि खेलों के लिए जुनून की कोई उम्र नहीं होती।
बचपन से ही खेलों का था शौक़
गुरबख़्श कौर (Gurbaksh Kaur) बताती हैं कि उन्हें बचपन से ही खेलों का बहुत शौक़ था। स्कूल के दिनों में वो खो-खो, लंबी कूद, ऊंची कूद और दौड़ जैसी कई खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेती थी। उनका ख़्वाब पंजाब पुलिस में भर्ती होने का था, लेकिन कम उम्र में शादी हो जाने की वजह से उनका ये ख़्वाब पूरा नहीं हो सका। हालांकि, ज़िंदगी की ज़िम्मेदारियों के बीच भी खेलों के लिए उनका जुनून कम नहीं हुआ। शादी के बाद भी उन्होंने अपने इस शौक़ को ज़िंदा रखा। वो अपने पोते के स्कूल में होने वाली पेरेंट्स की खेल प्रतियोगिताओं में भी हिस्सा लेती रहीं। अब तक वो दौड़ के मुकाबलों में चार मेडल जीत चुकी हैं।

फिटनेस और खान-पान का रखते हैं ख़ास ख़याल
अपनी सेहत के बारे में बात करते हुए गुरबख़्श कौर (Gurbaksh Kaur) बताती हैं कि वो घर पर थोड़ी-बहुत कसरत करती रहती हैं और घर का बना खाना खाना पसंद करती हैं। उनके परिवार के लोग घर पर ही सब्ज़ियां उगाते हैं। वो ज़्यादातर जैविक सब्ज़ियों और फलों का इस्तेमाल करती हैं। उनका मानना है कि एक्टिव लाइफस्टाइल और संतुलित खान-पान से सेहतमंद रहने में मदद मिलती है।

परिवार का मिलता है पूरा साथ
गुरबख़्श कौर (Gurbaksh Kaur) बताती हैं कि जब भी वो किसी खेल मुकाबले में हिस्सा लेती हैं, तो उनका परिवार बहुत ख़ुश होता है। परिवार के लोग उनका हौसला बढ़ाते हैं और उन्हें आगे भी इसी तरह खेलों में हिस्सा लेते रहने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके पोते जोबनप्रीत सिंह का भी उनके साथ खेलों में हिस्सा लेना इस बात की ख़ूबसूरत मिसाल है कि खेल अलग-अलग पीढ़ियों को एक-दूसरे के क़रीब लाने का ज़रिया बन सकते हैं।

नौजवानों को खेलों से जुड़ने का पैग़ाम
नौजवानों को पैग़ाम देते हुए गुरबख़्श कौर (Gurbaksh Kaur) कहती हैं कि उन्हें खेलों से दूर नहीं रहना चाहिए। खेलों से जुड़े रहने पर शरीर सेहतमंद रहता है। साथ ही, ज़िंदगी में अनुशासन और ख़ुद पर भरोसा भी बढ़ता है। 65 साल की उम्र में 200 मीटर की दौड़ में पहला मुक़ाम हासिल करना और अपने 14 साल के पोते के साथ खेल के मैदान में उतरना, गुरबख़्श कौर (Gurbaksh Kaur) के मज़बूत हौसले की कहानी है।
उनकी ये कामयाबी सिर्फ़ एक जीत नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो उम्र या हालात की वजह से अपने ख़्वाबों को पूरा करने की कोशिश छोड़ देते हैं। गुरबख़्श कौर (Gurbaksh Kaur) का जज़्बा बताता है कि अगर दिल में हौसला हो, तो उम्र कभी भी अपनी मंज़िल तक पहुंचने के रास्ते में रुकावट नहीं बन सकती।
लेख: अभिलाषा अग्रवाल
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