मॉस्को की एक बुज़ुर्ग रूसी प्रोफ़ेसर, जिनकी ज़ुबान पर हिंदी का ठहराव है और दिल में भारत के लिए इश्क़। ऐसी हैं डॉ. ल्यूदमीला खोखलोवा,जो भारत चौथे सबसे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्म श्री’ से नवाज़ी जा चुकी हैं।

पद्म श्री: एक ऐतिहासिक पल
23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने डॉ. खोखलोवा को ‘साहित्य और शिक्षा’ कैटेगरी में पद्म श्री से सम्मानित किया। सरकारी साइटेशन में उन्हें मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ़ एशियन एंड अफ़्रीकन स्टडीज़ के ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ इंडियन फ़िलोलॉजी’ में एसोसिएट प्रोफ़ेसर बताया गया है और भारत-विद्या (इंडोलॉजी) में उनके योगदान के बारे में बताया गया।
बता दें कि पद्म पुरस्कारों की शुरुआत 1954 से अब तक दस से भी कम रूसी विद्वानों को ये सम्मान मिला है। यानी डॉ. खोखलोवा उन गिने-चुने विदेशी नागरिकों में शामिल रहीं जिन्हें भारत ने अपना बनाया।
मॉस्को से हिंदी तक: पांच दशकों का सफ़र
31 अक्टूबर 1945 को रूस में पैदा हुई डॉ. खोखलोवा ने मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी से हिंदी भाषा और साहित्य में साल 1970 में मास्टर्स किया। चार साल बाद मॉस्को की ‘इंस्टीट्यूट ऑफ़ लिंग्विस्टिक्स’ से भारतीय भाषा-विज्ञान में पीएचडी की, जिसका विषय हिंदी और राजस्थानी का तुलनात्मक अध्ययन था।
आज उनका अकादमिक काम हिंदी, पंजाबी और अन्य नई हिंद-आर्य भाषाओं तक फैला हुआ है। मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में वे Undergraduate and postgraduate levels पर हिंदी और पंजाबी पढ़ाती हैं, साथ ही वेस्टर्न नई हिंद-आर्य भाषाओं के ऐतिहासिक विकास, हिंदी-उर्दू व्याकरण, वाक्य-रचना और सामान्य भाषा-विज्ञान के कोर्स भी कराती हैं। पद्म पुरस्कार साइटेशन के मुताबिक़, उन्होंने रूसी, अंग्रेज़ी और हिंदी में छह किताबें और 92 रिसर्च पेपर लिखे हैं। Phonology, morphology, vocabulary, and historical linguistics. जैसे गहरे विषयों पर।

सिर्फ़ किताबी नहीं, दिल की भी उस्ताद
डॉ. खोखलोवा का काम क्लासरूम और शोध-पत्रों तक सीमित नहीं रहा। वे सालों से रूसी छात्रों को भारत को सिर्फ़ भाषा से आगे देखने की तरफ़ इंस्पायर करती रही हैं। उनके अपने शब्दों में, वे छात्रों को भारत के बारे में ज़्यादा बताने और “उनके दिलों में भारत के लिए मोहब्बत जगाने” की कोशिश करती हैं।
दिलचस्प है हिंदी को लेकर उनका Remark। कई छात्रों को दोस्त या घरवाले कहते हैं कि हिंदी सीखने का कोई फ़ायदा नहीं, क्योंकि ‘भारत में तो सब अंग्रेज़ी बोलते हैं।’ मगर डॉ. खोखलोवा कहती हैं कि ये सोच अब बदल रही है। भारत आने-जाने के अपने तजुर्बों को याद करते हुए उन्होंने कहा, ‘मैं देखती हूं कि बहुत बदलाव आया है। पहले जो लोग अंग्रेज़ी बोलते थे, अब वे हिंदी भी बोल रहे हैं और रूस में हिंदी सीखने वालों के लिए ये बदलाव एक नई उमंग का सबब बन सकता है।
उनकी एकेडमिक जर्नी उन्हें बार-बार भारत लाई। 2007 और 2013 में जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी, और 2016 में हैदराबाद यूनिवर्सिटी में Research Visits and Training की।
हिंदी व्याकरण से सिख धर्मशास्त्र तक
डॉ.खोखलोवा की Scholarliness हिंदी से आगे भी फैली। पद्म साइटेशन में सिख धर्म की उत्पत्ति और विकास पर उनके रिसर्च और अहम सिख ग्रंथों के अनुवाद का ज़िक्र है। उन्होंने गुरु नानक की ‘जपजी’ को पंजाबी से रूसी में ट्रांसलेट किया, और दसवें सिख गुरु गोबिंद सिंह से जुड़ी ‘जाप साहिब’ का भी अनुवाद किया। रूसी पाठकों के लिए ये काम भारतीय धार्मिक-दार्शनिक परंपराओं तक उनकी अपनी ज़ुबान में पहुंचने का पुल बना।
उनके पंजाबी प्रेम को विदेशों में भी पहचान मिली। साल 2005 में लंदन की ‘पंजाबी साथ’ ने उन्हें सम्मानित किया, और 2007 में भारत सरकार ने रूस में हिंदी अध्ययन में योगदान के लिए नवाज़ा।
नतीजा नहीं, नई शुरुआत
डॉ. खोखलोवा के लिए पद्म श्री किसी सफ़र का अंत नहीं, बल्कि और काम करने की वजह है। शायद यही उनके सफ़र को ख़ास बनाता है। जन्म भारत से हज़ारों किलोमीटर दूर, करियर रूस में फिर भी हिंदी उनकी मास्टर्स का विषय बनी, भारतीय भाषा-विज्ञान उनकी पीएचडी का, और भारत की भाषाएं-संस्कृति पांच दशकों से ज़्यादा की ज़िंदगी का मक़सद।
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