‘ज़र’ यानी सोना और ‘दोज़ी’ यानी कढ़ाई..ज़रदोज़ी (Zardosi) का मतलब है सोने के तार से सिलाई। ये वही फ़न है जिसने मुग़ल दरबारों की शान बढ़ाई, नवाबों की महफ़िलें सजाईं, और आज लखनऊ (Lucknow) की गलियों में काम करता आ रहा है।
मुग़ल हुकूमत के दौरान ईरान से आई आर्टिस्टिक रोशनी ने भारतीय फ़न को नया रंग दिया। इसी रवायत का हिस्सा बनी ज़रदोज़ी। जो सिर्फ़ कढ़ाई नहीं, बल्कि एक तहज़ीब है। शुरुआत में चांदी और सोने के असली तारों से सिल्क, साटन और मखमल पर की जाने वाली ये कारीगरी कलाबत्तू कहलाती थी। आज इसकी जगह सोने, चांदी और तांबे की परत चढ़े धागों ने ले ली है। दबका, कोरा, कटोरी, टिकेना और सितारा जैसी चीज़ें इसमें रौनक़ बिखेरती हैं। ख़ास गाहक की फ़रमाइश पर मोती, क़ीमती और क़ीमती पत्थर भी जड़े जाते हैं।

पहले ये नफ़ासत-भरी कढ़ाई दरबारी लिबासों, जूतों और तलवारों के मियान पर की जाती थी। इसका वज़न भारी होता है, मगर नज़ारा दिलकश! कढ़ाई की ये तकनीक आड़ी नाम की सुई से होती है। लकड़ी की छड़ी से जुड़ी क्रोशिया जैसी सुई, इसलिए इसे आड़ी वर्क भी कहते हैं।
लखनऊ: ज़रदोज़ी का गढ़
ज़रदोज़ी को सच्चा पनपना मिला अवध के नवाबों, ख़ासकर नवाब वाजिद अली शाह (1847–56) के दौर में। 18वीं-19वीं सदी में हैदराबाद, कलकत्ता, वाराणसी, भोपाल, कश्मीर और दिल्ली के अमीर हिंदू, मुस्लिम और यूरोपीय तबक़े में यह मक़बूल हो गई।
लखनऊ के कश्मीरी मोहल्ला और आगा मीर देवड़ी में ज़रदोज़ी कढ़ाई का गढ़ है। कश्मीरी मोहल्ला का नाम उन कश्मीरी पंडितों से पड़ा जो 1775 में अवध दरबार के फ़ैज़ाबाद से लखनऊ आने पर बसे। एक हज़ार परिवारों की बस्ती में अब सिर्फ़ 40 कश्मीरी पंडित परिवार बचे हैं। ट्रेड यूनियन के मुताबिक़ यहां की 70 फ़ीसद आबादी ज़रदोज़ी से जुड़ी है जिसमें ज़्यादातर शिया मुस्लिम है।

कारख़ानों के मालिक कारख़ंदार होते हैं, जो कारीगरों को रखते और प्रोडक्शन देखते हैं। ज़रदोस या ज़रदोसान बचपन से यहेहुनर सीखते हैं । लखनऊ में एक ही ख़ानदान में पीढ़ियों तक ये काम चलता आ रहा है।
नक़्शा बनने की कहानी
डिज़ाइन बनाने से पहले वर्कशॉप में ट्रेसिंग शीट पर नक़्शा उतारा जाता है, सुई से सुराख़ किए जाते हैं। कपड़े पर ट्रेसिंग शीट रखकर मिट्टी के तेल और रॉबिन ब्लू का घोल लेपा जाता है। घोल सुराख़ों से रिसकर कपड़े पर डिज़ाइन छोड़ देता है। फिर कपड़ा लकड़ी के फ़्रेम अड्डा पर तान दिया जाता है, जिस पर 5 से 7 कारीगर एक साथ बैठते हैं। आड़ी सुई धागे को कपड़े के ऊपर-नीचे दोनों तरफ़ से गुज़ारती है। काम तेज़ होता है, मगर वक़्त और सब्र बहुत मांगता है। इसीलिए ये कढ़ाई महंगी होती है।

मेहनत की कहानी
टेक्सटाइल मंत्रालय के मुताबिक़ लखनऊ में 10,000 से ज़्यादा Micro and Small Enterprises ज़रदोज़ी से जुड़े हैं। पहले सिर्फ़ मर्द ये काम करते थे, अब 15 फ़ीसद कारीगर औरतें हैं।

डिज़ाइन चोरी और जमाख़ोरी रोकने के लिए 1971 में अंजुमन-ए-ज़रदोसान बना, मगर 1990 के दशक में मज़दूरी के वादे पूरे न हो सके और 2000 की शुरुआत में यह बंद हो गया। Daily and weekly wages की जगह पीस-रेट ने ले ली। 7–8 घंटे की मेहनत पर अब महज़ 150 रुपये मिलते हैं। सोने-चांदी की बढ़ती क़ीमतें और चीनी मशीनरी की कंपटीशन ने आग में घी डाला। नक़ली माल ने असली की क़ीमत गिरा दी।

तहज़ीब का सवाल
जो कभी शाही पेशा था, अब कारख़ंदारों, फ़ैशन डिज़ाइनरों और स्टॉकिस्टों के लिए सिर्फ़ कमाई का ज़रिया बन गया। बहुत से कारीगर काम छोड़ चुके हैं। ज़रदोज़ी सिर्फ़ कारीगरों की रोज़ी-रोटी नहीं, ये लखनऊ की अवधी संस्कृति और तहज़ीब की पहचान है। अगर यह फ़न बुझ गया, तो लखनऊ की रोशनी भी फीकी पड़ जाएगी। सवाल यह है कि क्या हम अपनी विरासत को बचा पाएंगे, या उसे सितारों की तरह सिर्फ़ देखते रह जाएंगे?
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