भारतीय खेलों की तारीख़ में बहुत कम ऐसे लोग हुए हैं, जिन्हें द्रोणाचार्य अवॉर्ड हासिल करने वाले Gurbaksh Singh Sandhu (गुरबख़्श सिंह संधू) जैसा सम्मान और मुक़ाम मिला हो। दो दशकों से ज़्यादा वक़्त तक भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी टीम के चीफ़ नेशनल कोच रहे संधू ने भारतीय मुक्केबाज़ी को एक मामूली दावेदार से बदलकर दुनिया की मज़बूत टीमों में शामिल करने में अहम किरदार निभाया।
उनका मुक्केबाज़ी का सफ़र सैनिक स्कूल, जामनगर से शुरू हुआ। स्कूल में मुक्केबाज़ी की ट्रेनिंग पढ़ाई का ज़रूरी हिस्सा थी। यहीं से उनके अंदर इस खेल के लिए उम्रभर का जुनून पैदा हुआ। राज्य स्तर के चैंपियन बनने के बाद संधू ने 1975 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स (NIS), पटियाला से मुक्केबाज़ी कोचिंग का डिप्लोमा हासिल किया। उन्होंने ये ट्रेनिंग मशहूर कोच ओ.पी. भारद्वाज की रहनुमाई में ली। ओ.पी. भारद्वाज मुक्केबाज़ी में भारत के पहले द्रोणाचार्य अवॉर्ड हासिल करने वाले कोच थे।
संधू ने अपने उस्ताद की सीख को आगे बढ़ाया और 1993 में भारतीय राष्ट्रीय टीम की ज़िम्मेदारी संभाली। उन्होंने ट्रेनिंग के तरीक़ों में वैज्ञानिक सोच, बेहतर तकनीक, सही फुटवर्क और रिंग में बेहतर रणनीति को शामिल किया। उनके कोचिंग करियर का सबसे अहम पड़ाव 2008 की बीजिंग ओलंपिक में आया। इसी दौरान विजेंदर सिंह ने 75 किलो वज़न वर्ग में ऐतिहासिक कांस्य पदक जीता। ये भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ी का ओलंपिक में पहला पदक था।
इसके बाद इंटरनेशनल लेवल पर कई बड़ी कामयाबियां मिली। इनमें 2009 की मिलान वर्ल्ड चैंपियनशिप में विजेंदर सिंह का कांस्य पदक, 2010 की दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में 7 पदक, जिनमें 3 गोल्ड मेडल शामिल थे, 2010 की ग्वांगझू एशियन गेम्स में 9 पदक और 2012 की लंदन ओलंपिक के लिए 8 भारतीय पुरुष मुक्केबाज़ों का क्वालीफाई करना शामिल है। उस वक़्त ये एक रिकॉर्ड था।
इस मशहूर कोच ने SaddaPunjab से बातचीत में उन्होंने अपनी विरासत, खेलों के मामले में पंजाब के हरियाणा से पीछे रह जाने की वजहों और पंजाब में मुक्केबाज़ी जैसी combat sports की पुरानी शान वापस लाने के लिए अपनी योजना के बारे में खुलकर बात की।
सुनहरे दौर पर एक नज़र
Sadda Punjab: कोच संधू, जब आप 1993 से शुरू हुए अपने लंबे सफ़र को पीछे मुड़कर देखते हैं—बीजिंग में विजेंदर के ऐतिहासिक कांस्य पदक से लेकर लंदन 2012 के लिए आठ मुक्केबाज़ों के क्वालीफाई करने तक—तो आपकी निगरानी में भारतीय मुक्केबाज़ी में आए बदलाव की कौन-सी बात सबसे ज़्यादा नज़र आती है?
कोच गुरबख़्श सिंह संधू: “जब मैंने 1993 में भारतीय राष्ट्रीय टीम की ज़िम्मेदारी संभाली, तो हमारे मुक्केबाज़ों में हिम्मत या मेहनत की कोई कमी नहीं थी। कमी सिर्फ़ वैज्ञानिक तैयारी और रिंग के अंदर सही रणनीति की थी। हमें अपने खिलाड़ियों को सिखाना पड़ा कि सामने वाले मुक्केबाज़ को कैसे समझना है, सही फ़ासला कैसे बनाए रखना है, फुटवर्क पर कैसे काम करना है और रिंग में बदलते हालात के हिसाब से तुरंत अपना खेल कैसे बदलना है। हमने सिर्फ़ ज़ोरदार हमला करने वाली मुक्केबाज़ी से आगे बढ़कर ऐसे ‘स्मार्ट मुक्केबाज़’ तैयार करने पर ध्यान दिया, जो दिमाग़ से भी खेल सकें।”

जब विजेंदर ने 2008 में बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीता, तो इससे भारतीय मुक्केबाज़ी में एक बड़ी मानसिक रुकावट टूट गई। अचानक पूरे देश को यक़ीन हुआ कि एक भारतीय मुक्केबाज़ भी ओलंपिक पोडियम तक पहुंच सकता है और क्यूबा, रूस या यूरोप के बेहतरीन मुक्केबाज़ों को टक्कर दे सकता है।
इसके बाद वर्ल्ड चैंपियनशिप के पदक, एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल और लंदन 2012 के लिए आठ मुक्केबाज़ों का ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करना इस बात का सबूत था कि बीजिंग की कामयाबी कोई इत्तेफ़ाक़ नहीं थी। ये एक सोची-समझी और वैज्ञानिक ट्रेनिंग व्यवस्था का नतीजा थी।”
हरियाणा आगे और पंजाब पीछे क्यों?
SaddaPunjab: हाल ही में एशियन गेम्स के लिए चुनी गई टीम पर नज़र डालें तो 11 में से 8 मुक्केबाज़ हरियाणा से हैं। पंजाब से आपका गहरा रिश्ता रहा है। आपके हिसाब से हरियाणा मुक्केबाज़ी और दूसरी लड़ाकू खेलों (combat sports) में इतना आगे कैसे निकल गया, जबकि पंजाब पीछे रह गया लगता है?
कोच गुरबख़्श सिंह संधू: “मैं पंजाब के बारे में कोई नकारात्मक बात नहीं करना चाहता, लेकिन हमें हक़ीक़त को मानना होगा। खेलों के लिए सुविधाओं और काम करने के तरीक़े के मामले में हरियाणा इस वक़्त पंजाब से काफ़ी आगे है। सबसे बड़ा फ़र्क़ सरकारी मदद और खिलाड़ियों के भविष्य की सुरक्षा में है।
हरियाणा में राज्य के मंत्री और यहां तक कि मुख्यमंत्री भी खेल मुकाबलों में खुलकर शामिल होते हैं। वो सिर्फ़ खिलाड़ियों की तारीफ़ नहीं करते, बल्कि सरकारी नौकरी की गारंटी और तुरंत इनाम का भी ऐलान करते हैं। मुक्केबाज़ विजेंदर सिंह या अखिल कुमार को ही देखिए। दोनों SP और DSP जैसे बड़े पुलिस पदों पर रह चुके हैं।
जब कोई नौजवान या उसके माता-पिता देखते हैं कि खेल में कामयाबी मिलने से परिवार का भविष्य सुरक्षित हो सकता है और एक अच्छी ज़िंदगी मिल सकती है, तो इससे सोच पूरी तरह बदल जाती है। पंजाब में जयपाल सिंह जैसे खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत और हौसले से SP जैसे मुक़ाम हासिल किए, लेकिन उनके पीछे हरियाणा जैसी साफ़ और लंबे वक़्त की सरकारी पॉलिसी का सहारा कम दिखाई देता है।
इसके अलावा पटियाला या SAI सेंटरों में होने वाले सिलेक्शन ट्रायल्स का माहौल देखिए। हरियाणा से बड़ी तादाद में माता-पिता वहां पहुंचते हैं। वो अपने ख़र्च पर कमरे लेते हैं, रिंग के पास खड़े होकर अपने बच्चों का हौसला बढ़ाते हैं और उनकी सेहत का ख़याल रखने के लिए घर का बना घी और पिन्नियां तक साथ लाते हैं। इसके मुक़ाबले पंजाब से माता-पिता की मौजूदगी काफ़ी कम दिखाई देती है। हरियाणा में खेल सिर्फ़ खिलाड़ी की ज़िम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे परिवार का मिशन बन जाता है। वहां के मज़बूत क्लब कल्चर से भी खिलाड़ियों को सहारा मिलता है।
खिलाड़ी, माता-पिता और कोच—सभी को अच्छी तरह मालूम होता है कि अगर खिलाड़ी कामयाब होता है, तो आगे उसे कौन-सा इनाम या फ़ायदा मिल सकता है। यही साफ़ तस्वीर एक नौजवान को खेल को अपना करियर बनाने के लिए हौसला देती है।”

पंजाब के लिए ज़मीनी स्तर की एक योजना
SaddaPunjab: अगर आपको पंजाब सरकार और खेल विभाग के लिए मुक्केबाज़ी के पूरे सिस्टम को नए सिरे से तैयार करने की कोई ठोस और सोच-समझकर बनाई गई योजना बनानी हो, तो शुरुआत कहां से होनी चाहिए?
कोच गुरबख़्श सिंह संधू: “मुक्केबाज़ी और कुश्ती जैसी लड़ाकू खेलें आम तौर पर गांवों और दूर-दराज़ के इलाक़ों में ज़्यादा फलती-फूलती हैं। हमारे गांवों के नौजवानों में पहले से ही शारीरिक ताक़त और मेहनत करने की अच्छी क्षमता होती है। आप सिर्फ़ उन खिलाड़ियों पर ध्यान देकर खेलों का माहौल नहीं बना सकते, जिन्होंने पहले ही मेडल जीत लिए हैं। आपको सुविधाएं और ट्रेनिंग वहीं पहुंचानी होगी, जहां असली टैलेंट मौजूद है।
लुधियाना ज़िले के गांव चक्कर को ही देखिए। कनाडा में रहने वाले दो सिद्धू भाइयों ने अपने पुश्तैनी गांव को गोद लिया और उसे एक वर्ल्ड-क्लास मुक्केबाज़ी सेंटर में बदल दिया। मैं वहां उनके घर पर कई हफ़्तों तक रहा और वहां के लड़कों-लड़कियों को ट्रेनिंग और सही रहनुमाई देता रहा। गांव के स्तर पर शुरू की गई इसी पहल ने बिना सरकारी ग्रांट पर निर्भर हुए सिमरनजीत कौर बाठ जैसी वर्ल्ड चैंपियन और कई मेडल जीतने वाले खिलाड़ी तैयार किए। ये इस बात की मिसाल है कि अगर सही जगह पर सही सुविधाएं और रहनुमाई मिले, तो गांवों से भी बड़े स्तर के खिलाड़ी सामने आ सकते हैं।”
पंजाब को ज़मीनी स्तर पर तीन सूत्री योजना अपनानी चाहिए:
- तहसील और ब्लॉक स्तर पर सेंटर:
ब्लॉक और तहसील स्तर पर कम से कम एक या दो Centres of Excellence बनाए जाएं। ख़ास तौर पर उन गांवों में, जहां मुक्केबाज़ी को लेकर लोगों में जुनून है। इसके लिए बहुत बड़ी तैयारी की ज़रूरत नहीं है—एक बुनियादी रिंग, ज़रूरी सामान और एक समर्पित कोच से शुरुआत की जा सकती है।
- प्रवासी पंजाबियों को साथ जोड़ें:
पंजाब के पास विदेशों में रहने वाले पंजाबियों का बड़ा नेटवर्क और आर्थिक मदद की ताक़त है। सरकार को ऐसे प्रवासी पंजाबियों को स्थानीय खेल केंद्रों की ज़िम्मेदारी देनी चाहिए, जो उनके मैनेजमेंट और खर्च में मदद करने के लिए तैयार हों। साथ ही, सरकार की निगरानी भी बनी रहनी चाहिए।
- चार ज़ोन वाला घरेलू टूर्नामेंट कैलेंडर:
पंजाब के खिलाड़ियों को लगातार मुकाबले खेलने के मौके कम मिलते हैं। इसके लिए पंजाब को चार अलग-अलग ज़ोन में बांटकर नियमित इंटर-ज़ोन और इंटर-डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट करवाए जाने चाहिए। इन मुकाबलों में अच्छे कैश प्राइज़ भी रखे जाएं। क्योंकि लगातार मुकाबले खेलने से खिलाड़ियों का हुनर निखरता है और उन्हें बड़े मुकाबलों के लिए बेहतर तैयारी मिलती है।
कोचिंग का स्तर, भत्ते और नौजवान खिलाड़ियों की भलाई
SaddaPunjab: खेलों के लिए सुविधाएं तैयार करना तो एक पहलू है, लेकिन कोच और नौजवान खिलाड़ियों की रोज़मर्रा की ज़रूरतों और भलाई का क्या? साथ ही, पंजाब के नौजवानों के सामने नशे की जो समस्या है, उससे निपटने में खेल किस तरह मदद कर सकते हैं?
कोच गुरबख़्श सिंह संधू: “कोच किसी भी खेल व्यवस्था की रीढ़ होते हैं। पंजाब में हर ज़िले में दो से तीन कोच हैं, लेकिन उनकी तकनीकी जानकारी को लगातार बेहतर करना ज़रूरी है। सरकार को उन्हें NIS पटियाला और SAI में छोटे रिफ्रेशर कोर्स के लिए भेजना चाहिए।
एक और अहम बात ये है कि जब राज्य की टीमें कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों में जाती हैं, तो अच्छे और होनहार स्थानीय कोचों को भी राष्ट्रीय टीम के साथ ऑब्ज़र्वर के तौर पर भेजा जाना चाहिए। इससे उन्हें दुनिया के बेहतर ट्रेनिंग तरीक़ों और रणनीतियों को समझने का मौक़ा मिलेगा।
कोचों को उनकी तनख़्वाह के अलावा उनके काम और नतीजों के आधार पर आर्थिक इनाम भी मिलना चाहिए। क्योंकि सही इंसेंटिव से कोचों का हौसला और लगन बढ़ती है।” खिलाड़ियों की भलाई की बात करें तो पंजाब सरकार ने 2023 में खिलाड़ियों के लिए खाने के भत्ते और खेल के सामान की मदद शुरू की थी, लेकिन इसमें लगातार मदद मिलना सबसे ज़रूरी है।
एक मुक्केबाज़ को हर दिन अच्छी और पौष्टिक खाने की ज़रूरत होती है। हर चार महीने में एक बार बड़ी रकम देने से रोज़ की ज़रूरत पूरी नहीं होती। खिलाड़ियों को हर 15 दिन में आर्थिक मदद दी जानी चाहिए, ताकि वो बिना किसी रुकावट के अपनी रोज़ की खाने का इंतज़ाम कर सकें।
Inspire Institute of Sport, Reliance और Army Institute of Sports जैसे निजी संस्थानों को देखिए। ये संस्थान इसलिए कामयाब हैं क्योंकि वहां खिलाड़ियों को ट्रेनिंग के साथ 24 घंटे की देखभाल, खाना और दूसरी ज़रूरी सुविधाएं एक तय व्यवस्था के तहत मिलती हैं। अगर पंजाब में भी खिलाड़ियों को ऐसी लगातार मदद और सही माहौल मिले, तो खेल न सिर्फ़ उनके करियर को बेहतर बना सकते हैं, बल्कि नौजवानों को नशे से दूर रखने में भी अहम किरदार निभा सकते हैं।
इंसानी जुड़ाव – कोचिंग, सोच और ज़िंदगी के सबक
SaddaPunjab: आपको सिर्फ़ एक रणनीति बनाने वाले कोच के तौर पर ही नहीं, बल्कि अपने मुक्केबाज़ों के लिए एक रहनुमा और पिता जैसी शख़्सियत के तौर पर भी याद किया जाता है। आपने विजेंदर सिंह जैसे बड़े सितारों को कैसे संभाला और आपकी कोचिंग का सबसे अहम उसूल क्या था?
Gurbaksh Singh Sandhu (गुरबख़्श सिंह संधू): “कोचिंग में सिर्फ़ 30 फ़ीसदी हिस्सा शारीरिक ट्रेनिंग का होता है। बाकी 70 फ़ीसदी हिस्सा खिलाड़ी की सोच, उसकी भावनाओं को समझने और उसे सही रहनुमाई देने का होता है। भारतीय खिलाड़ी अपने परिवारों से बहुत गहराई से जुड़े होते हैं। नेशनल कैंप के दौरान अफ़सर अक्सर सख़्त नियम रखने की बात करते थे और कहते थे कि मुक्केबाज़ों को कई महीनों तक घर नहीं जाना चाहिए। लेकिन मैं चुपके से अपने मुक्केबाज़ों को वीकेंड पर थोड़े वक़्त के लिए घर जाने की इजाज़त दे देता था।
जो खिलाड़ी अपने माता-पिता से मिलकर वापस आता था, वो कैंप में दोगुनी ताक़त और नए जोश के साथ लौटता था। हर मुक्केबाज़ को संभालने का तरीक़ा अलग होता है। विजेंदर की ही मिसाल ले लीजिए। उसमें बहुत ज़्यादा आत्मविश्वास था। मुकाबले से पहले वो रिंग के कोने में खड़े मेरी तरफ़ देखकर कहता था, ‘सर, आप आराम से बैठिए, मैं उसे संभाल लूंगा।’
जब किसी खिलाड़ी में इतना भरोसा हो, तो एक समझदार कोच पीछे हट जाता है और उसे अपनी रणनीति पर अमल करने देता है। दूसरी तरफ़, जिन मुक्केबाज़ों का ध्यान जल्दी भटक जाता था, उन्हें जोश दिलाने के लिए कभी सख़्त बातें करनी पड़ती थीं और कभी हौसला बढ़ाने के लिए सख़्ती भी करनी पड़ती थी। हॉस्टल में रहने वाले वो मुक्केबाज़, जो ग़रीब परिवारों से आते थे, मेरे अपने बच्चों जैसे थे। जब किसी खिलाड़ी को यक़ीन होता है कि उसका कोच सच में उसकी भलाई की फ़िक्र करता है, तो वह रिंग में अपने कोच के लिए पूरी जान लगा देता है।”
SaddaPunjab: आपकी कामयाबियां बहुत लोगों के लिए एक मिसाल हैं। लेकिन यक़ीनन इसके पीछे कई कुर्बानियां और बहुत से लोगों की मेहनत भी रही होगी। क्या आप इस बारे में कुछ बताना चाहेंगे?
Gurbaksh Singh Sandhu (गुरबख़्श सिंह संधू): “सबसे पहले मैं अपनी पत्नी और बच्चों का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। अगर मुझे ऐसा जीवनसाथी और घर का ऐसा माहौल नहीं मिलता, जहां मुझे लगातार हौसला मिलता रहे, तो शायद मेरा ध्यान अपने काम से भटक सकता था।
मैं उन 8 से 10 कोचों का भी दिल से शुक्रगुज़ार हूं, जो लगातार हमारे मुक्केबाज़ों की देखभाल करते थे और हमारे मक़सद को पूरा करने में साथ देते थे। इनमें क्यूबन कोच B.I. फर्नांडीज़ का ख़ास ज़िक्र करना चाहूंगा, जो आज भी हरियाणा में ‘हाई परफॉर्मेंस कोच’ के तौर पर काम कर रहे हैं।
Gurbaksh Singh Sandhu (गुरबख़्श सिंह संधू) कहते हैं कि उन तमाम कोचों का भी शुक्रगुज़ार हूं, जो ज़मीनी स्तर पर दिन-रात मेहनत करते हैं। आख़िर में, हमारे बायोमेट्रिक्स एक्सपर्ट्स और मनोवैज्ञानिकों समेत वैज्ञानिक टीम ने भी खिलाड़ियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने में अहम किरदार निभाया। मैं उन सभी का बहुत शुक्रगुज़ार हूं।”
SaddaPunjab: कोच साहब, आपको रिटायर हुए लगभग दस साल हो चुके हैं। अब जब आप अपनी ज़िंदगी के उन सालों को पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उसे किस तरह देखते हैं? और क्या हम आपकी तरफ़ से किसी प्रेरणादायक संदेश के साथ यह बातचीत ख़त्म कर सकते हैं?
Gurbaksh Singh Sandhu (गुरबख़्श सिंह संधू): “अब मैं पटियाला में अपने उसी घर में रहता हूं, जिसे मैंने सालों में बड़े प्यार से बनाया है। मैं अपनी ज़िंदगी के लिए बहुत शुक्रगुज़ार हूं और मैंने इसके हर पल को दिल से जिया है।
मुक्केबाज़ी ने मुझे सब कुछ दिया है। मुक्केबाज़ी में बिताई मेरी पूरी ज़िंदगी ने मुझे एक बुनियादी बात सिखाई है—‘कुछ भी नामुमकिन नहीं है।’ जब साफ़ सोच, सही रणनीति और इंसानियत के लिए सच्ची हमदर्दी एक साथ हों, तो एक भारतीय मुक्केबाज़ पूरी दुनिया जीत सकता है।”
लेख: गौरव एस. करीर
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