Wednesday, September 9, 2026
35 C
Delhi

जोश मल्सियानी: दीवान-ए-ग़ालिब की शरह लिखने वाले शायर 

पंडित लभु राम को अदब की दुनिया में सब उन्हें जोश मल्सियानी के नाम से जानते हैं। 1 फ़रवरी 1884 को जालंधर के मल्सियान क़स्बे में पैदा हुए थे। बड़े होकर उर्दू शाइरी में इतना नाम कमाया कि लोग उनका शागिर्द बनने के लिए तरसते थे।

घर में पढ़ाई-लिखाई का माहौल नहीं था

दादा गुड़ बेचने का काम करते थे, पिता पेशावर के क़िस्सा-ख़्वानी बाज़ार में मिठाई की दुकान चलाते थे। यानी घर में किताबों वाला माहौल बिल्कुल नहीं था। लेकिन मां ने बड़ी मेहनत से बेटे को पढ़ाया-लिखाया। 1897 में वर्नाक्यूलर मिडिल पास की, फिर जालंधर के कई स्कूलों में टीचर भी बन गए।

स्कूल के ज़माने से ही लिखते थे शेर

बात यह है कि शेर लिखना तो स्कूल के दिनों से ही शुरू हो गया था, लेकिन बरसों तक अपना कलाम किसी को दिखाया ही नहीं। बस चुपचाप ख़ुद के लिए लिखते रहे। फिर एक दिन विक्टर हाई स्कूल जालंधर में पढ़ाते-पढ़ाते उनके हाथ एक किताब लगी। दाग़ देहलवी के शागिर्द सैयद शब्बर हसन नसीम भरतपुरी का दीवान। बस, वहीं से राब्ता शुरू हो गया। चिट्ठी-पत्री के ज़रिए भाषा और शाइरी पर बातें होने लगीं। और इसी रास्ते से जोश साहब ख़ुद भी उस्ताद दाग़ देहलवी के शागिर्द बन गए। यानी सीधा नाता जुड़ गया उर्दू शाइरी की सबसे बड़ी रिवायत से।

एक दिलचस्प बात – शतरंज के भी बड़े शौक़ीन थे, इतना कि शतरंज पर एक किताब भी लिख डाली।

ग़ालिब को समझाने वाला काम

जोश मल्सियानी का सबसे बड़ा काम है “दीवान-ए-ग़ालिब मा’ शरह” (1950) मतलब ग़ालिब के दीवान को आसान ज़बान में समझाना। आज भी जो लोग ग़ालिब को ठीक से समझना चाहते हैं, वो इस किताब का सहारा लेते हैं। इसके अलावा इक़बाल की शाइरी पर उनके लेख “जर्राह” के नाम से लाहौर की पत्रिका “पारस” में छपते रहे। “आजकल” नाम की मासिक पत्रिका भी उन्होंने संपादित की।

1971 में सरकार ने उन्हें पद्म श्री से नवाज़ा। उनके इकलौते बेटे बाल मुकुंद भी शाइर निकले, “अर्श मल्सियानी” के नाम से मशहूर हुए।  शाइरी बाप से बेटे तक चली। 27 जनवरी 1976 को नकोदर में उनका इंतक़ाल हो गया।

देश से प्यार, दिल में जोश कहते हैं कि अपनी मिट्टी से हमें भी उतना ही प्यार है जितना किसी और को। अगर जान देने की नौबत आए, तो वो हिम्मत भी है। जो लोग दुनिया बदलने के बड़े-बड़े दावे करते हैं, जोश साहब कहते हैं  अरे भाई, वो ताक़त हममें भी है, बस दिखाने की बात है।

वतन की सर-ज़मीं से इश्क़ ओ उल्फ़त हम भी रखते हैं
खटकती जो रहे दिल में वो हसरत हम भी रखते हैं

ज़माने को हिला देने के दावे बांधने वालो
ज़माने को हिला देने की ताक़त हम भी रखते हैं

दिल का दर्द, किसी को नहीं पता— एक शेर में बड़ी मार्मिक बात कहते हैं — दिल पर क्या गुज़रती है, यह न पूरी तरह हम ख़ुद समझ पाते हैं, न कोई और समझ सकता है। बस ख़ुदा जाने और दिल जाने।

दिल पे जो गुज़री कोई क्या जाने
ये तो हम जानें या ख़ुदा जाने

आंसू सिर्फ़ पानी नहीं — कहते हैं कि आंसुओं को हल्के में मत लो, इनमें उम्मीदों की पूरी कश्तियां डूब जाती हैं। यानी रोना सिर्फ़ नमी नहीं, टूटे हुए ख़्वाबों की कहानी है।

डूब जाते हैं उमीदों के सफ़ीने इस में
मैं न मानूंगा कि आंसू है ज़रा सा पानी

होली को भी दिया रूहानी रंग— एक शेर में होली को बहार की ख़ुशख़बरी और ख़ुदा की रहमत से जोड़ते हैं। एक हिंदुस्तानी तहवार को इतने प्यार से बयान करना बताता है कि उनकी शाइरी में गंगा-जमुनी तहज़ीब कितनी गहरी थी।

चमन चमन में नवेद-ए-बहार है होली
नुज़ूल-ए-रहमत-ए-परवरदिगार है होली

जालंधर उस ज़माने में उर्दू शाइरी का बड़ा अड्डा हुआ करता था  यहीं से आगे चलकर हफ़ीज़ जालंधरी और क़ैस जालंधरी जैसे नाम भी निकले। जोश मल्सियानी उसी माहौल की पैदावार थे। दाग़ देहलवी की शागिर्दी और ग़ालिब पर लिखी शरह उन्हें सिर्फ़ एक शाइर नहीं, बल्कि एक उस्ताद और अदब के रखवाले के तौर पर भी याद रखने लायक़ बनाती है।

ये भी पढ़ें: राबिया बसरी: मोहब्बत-ए-इलाही की पहली सूफ़ी शायरा 

आप हमें FacebookInstagramTwitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

गुरु नानक की उदासियाँ: ईश्वर से पहले मनुष्य की खोज का रास्ता

अपनी एक यात्रा के दौरान गुरु नानक पाकपत्तन शरीफ़...

हिमाचली बुनाई की कला ‘कुल्लू पट्टी’: हर धागे में बसी है पहाड़ों की कहानी

पहाड़ों की गोद में बसा कुल्लू वैली अपनी खूबसूरती...

IFFJK 2026: कश्मीर बना Global Cinema का नया Hotspot! दुनिया भर की हज़ारों फ़िल्में

सदियों से अपने हुस्न, अपनी शिकारों और अपनी ख़ूबसूरती...

क़ैस जालंधरी: पंजाब का वो शाइर जिसने अपनी सरज़मीन को जन्नत से बरतर कहा

समर चन्द ने अदब की दुनिया में "क़ैस जालंधरी"...

Topics

गुरु नानक की उदासियाँ: ईश्वर से पहले मनुष्य की खोज का रास्ता

अपनी एक यात्रा के दौरान गुरु नानक पाकपत्तन शरीफ़...

हिमाचली बुनाई की कला ‘कुल्लू पट्टी’: हर धागे में बसी है पहाड़ों की कहानी

पहाड़ों की गोद में बसा कुल्लू वैली अपनी खूबसूरती...

IFFJK 2026: कश्मीर बना Global Cinema का नया Hotspot! दुनिया भर की हज़ारों फ़िल्में

सदियों से अपने हुस्न, अपनी शिकारों और अपनी ख़ूबसूरती...

चमकौर से Machhiwara तक: दशमेश पिता का तारीख़ी सफ़र

दिसंबर 1704 ईस्वी की कड़ाके की ठंड वाली पोह...

Related Articles

Popular Categories