कर्नाटक की हरी-भरी पहाड़ियों और मैदानों के बीच बसा धारवाड़ ज़िला, अपने नाम की तरह ही “विश्राम की जगह” है। यहां रुकते थे थके-हारे यात्री, पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार के बीच का सफर तय करते हुए। मगर इस ज़िले की पहचान सिर्फ इसके नाम से नहीं, बल्कि यहां की अद्भुत कसूती कढ़ाई (Dharwad Kasuti Embroidery) से है। एक ऐसी कला, जो चालुक्य काल से चली आ रही है।

चालुक्य काल की देन
छठी से बारहवीं सदी तक चालुक्य राजाओं का शासन रहा। वे कला और संस्कृति के बड़े पारखी थे। इसी दौर में कला और वास्तुकला का पुनर्जागरण (Renaissance) हुआ, और इसी से जन्मी कर्नाटक की कसूती कढ़ाई। धर्म का भी इस कला पर गहरा असर रहा। मंदिरों के गोपुरम, पुष्करणी, तुलसी और बृंदावन के डिज़ाइन इस कढ़ाई में आसानी से दिखते हैं।
हालांकि ये कला सदियों पुरानी है, लेकिन इसे 20वीं और 21वीं सदी के आख़िर में ख़ास पहचान मिली, जब इसे सलवार-कमीज़ पर किया जाने लगा।

कसूती की ख़ासियत
कसूती कढ़ाई (Dharwad Kasuti Embroidery) की सबसे बड़ी ख़ासियत है कि इसकी सटीकता और पेचीदगी। इसके ज्योमेट्री और सुडौल पैटर्न अट्रैकटिव ग्रिड बनाते हैं। इसके डिज़ाइन की बारीकी का राज है इसके धागों की गिनती। परंपरागत रूप से ये कढ़ाई इलकल साड़ी और ब्लाउज़ पर की जाती थी, जिसमें मोर, कमल की बेल, हाथी, पालकी, और धागों के अपोज़िट रंगों का इस्तेमाल होता था।
कसूती चार ख़ास तरह की हैं, न्येगे, मुरगी, मेंथाये और गावंती। 700 से ज़्यादा डिज़ाइन सूती और रेशमी कपड़ों पर उकेरे जाते हैं।

कैसे पड़ा नाम और इतिहास
‘कसूती’ नाम बना है ‘क’ (हाथ) और ‘सूती’ (सूत) से, यानी हाथ से सूत के धागों से की गई कारीगरी। 15वीं सदी के साहित्यिक साक्ष्य मिलते हैं, लेकिन ये कला इससे भी पुरानी हो सकती है। चालुक्य काल में महिलाएं अपने कपड़े खुद सजाती थीं, और शादी से पहले लड़कियां अपनी साड़ी-ब्लाउज़ पर कसूती कढ़ाई करती थीं। 17वीं सदी में कला सीखना महिलाओं के लिए गर्व की बात थी, और कसूती उनमें सबसे अहम थी।
डिज़ाइन: प्रकृति, धर्म और रोज़मर्रा
महिलाएं अपने आस-पास की चीज़ों को कपड़े पर उतारती थीं-
- धार्मिक डिज़ाइन: रथ, पालकी, मंदिर के गोपुरम, कमल, तुलसी
- प्राकृतिक डिज़ाइन: मोर, हाथी, पक्षी, फूल
- डेली लाइफ के डिज़ाइन: पायल, पालना, पालकी
चंद्रकाली साड़ी-एक परंपरा
विवाहिता को काली साड़ी पहनाई जाती थी, जिसे कसूती से सजाया जाता था। इसे चंद्रकाली साड़ी कहते थे। इसमें मुरगी और नेगी टांके लगाए जाते थे।

आज कैसी है ये कला
पहले ये सिर्फ सूती साड़ियों तक महदूदल थी, लेकिन अब ये सिल्क, जॉर्जेट, शिफॉन और सलवार-सूट, ड्रेस मटेरियल, बैग, होम-डेकोर तक फैल गई है। कसूती ने खुद को बदला है, मगर अपनी हैंडमेड बारीकी नहीं खोई।
कसूती- कर्नाटक की समृद्ध इतिहास, शिल्प और सौंदर्य
कसूती सिर्फ कढ़ाई नहीं, बल्कि हाथों की जुबान है जो सदियों से कर्नाटक की संस्कृति की दास्तान सुनाती है।
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