Friday, October 16, 2026
21.2 C
Delhi

त्रिपुरा की रिसा: जो बुनती है इतिहास, संजोती है पहचान और बिखेरती है चमक

नॉर्थ ईस्ट भारत के हरे-भरे पहाड़ों में बसा त्रिपुरा,जहां 19 अलग-अलग आदिवासी समुदाय सदियों से एक साथ रहते आ रहे हैं। यहां की संस्कृति की रूह है हैंडलूम बुनाई, जो कमर की करघनी (लॉइन लूम) पर पीढ़ियों से बुनी जा रही है। इन कपड़ों में हर गांठ, हर रंग, हर डिज़ाइन कोई कहानी कहता है। किसी नदी की, किसी पहाड़ की, या किसी पुरखे की रूह की। और इन्हीं बुनाओं के बीच ‘त्रिपुरा रिसा’ आज अपने GI टैग (Geographical Indication) के साथ एक अलग पहचान बना चुकी है। ये सिर्फ कपड़ा नहीं, ये त्रिपुरा की इज़्ज़त, शान और शिनाख्त है।

Image-Wikipedia

 रिसा, रिगनाई और रिकुटू-तीन हिस्सों वाला पहनावा


रिसा : ऊपरी बॉडी पर लपेटा जाने वाला छोटा, गहरे कढ़ाई-भरा आंचल। इसे मेहमानों को इज़्ज़त की निशानी के तौर पर भेंट किया जाता है।


रिगनाई : कमर के नीचे पहना जाने वाला लपेटन (स्कर्ट), जिसे ‘पहनना’ का लोकल लैंग्वेज में मतलब है। इसे देसी साड़ी का रूप भी कह सकते हैं।


रिकुटू : यह चुनरी या पल्लू की तरह कंधे पर डाला जाता है।


सबसे खास बात है कि त्रिपुरा की 12-14 साल की हर लड़की को ‘रिसा सोरमानी’ समारोह में पहली बार रिसा पहनाई जाती है यानी ये स्त्रीत्व की दस्तक है।

Image-pinterest.com  

चकमा बुनाई यानी ज्यामिति का जादू

चकमा जनजाति की महिलाएं ‘पिनोन’ (लोअर बॉडी) और ‘हादी’ (अपर बॉडी) बुनती हैं। इनका रंग काला, नीला और गहरा लाल और इन पर बने ज्योमेट्रिकल पैनल आंखों को बांध लेते हैं। इन पैनलों को लोकल लैंग्वेज में ‘ख्वबुंग’ कहते हैं, जो नदियों, पहाड़ों और पुरखों की याद को कपड़े पर उकेरते हैं।

Image-pinterest.com  

क्यों आई रिसा ख़बरों में?

त्रिपुरा सरकार ने रिसा को राज्य का ‘सिग्नेचर गारमेंट’ बनाने का बीड़ा उठाया है। इसके तहत:

  • आंगनवाड़ी और ASHA कार्यकर्ताओं को रिसा यूनिफॉर्म दी गई।
  • त्रिपुरा हैंडलूम एंड हैंडिक्राफ्ट्स विकास निगम में रिसा बनाने की ट्रेनिंग शुरू की गई। 
  • रिसा को ‘इंडिया हैंडलूम ब्रांड’ के तहत ब्रैंड किया जा रहा है, जो ‘वोकल फॉर लोकल’ अभियान को ताकत देता है।

संस्कृति की गोद में रिसा

  • रिसा सभी 19 आदिवासी समुदायों में बुना जाता है, लेकिन हर समुदाय के अपने डिज़ाइन हैं।
  • पुरुष शादियों और त्योहारों में इसे पगड़ी की तरह बांधते हैं।
  • गरिया पूजा (चैत्र मास की आख़िरी तारीख़) के मौके पर रिसा धार्मिक अनुष्ठानों का हिस्सा है। ये त्रिपुरी और रियांग जनजातियों का फसल उत्सव है, जहां गरिया नृत्य भी होता है।
Image-pinterest.com  

प्रकृति से बुनाई तक, सदियों का सफ़र

त्रिपुरा के हैंडलूम सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि सस्टेनेबिलिटी और अपनी जड़ों से जुड़ाव की मिसाल हैं।
रिसा में रंग आते हैं प्राकृतिक रंगों से। जिसमें हल्दी, गेरू, नील और पेड़ों की छाल शामिल है। हर धागा कुदरत के साथ सदियों पुराना इज्तिमाई बयां करता है।

Image-pinterest.com  

आख़िर क्यों है रिसा ख़ास?

क्योंकि ये सिर्फ कपड़ा नहीं, ये मां-बहनों की उंगलियों की मेहनत है, ये आदिवासी युवती की पहली शान है, यह मेहमान को दी जाने वाली इज़्ज़त है, और आज ये ग्लोबल पहचान है, GI टैग के साथ।

जब हम रिसा की बात करते हैं, तो हम सिर्फ बुनाई की बात नहीं करते बल्कि हम इतिहास, अस्मिता (आइडेंटिटी) और सम्मान की बात करते हैं। ये वो ‘जिंदा कैनवस’ है, जिस पर हर सदी ने अपना रंग चढ़ाया है। आज ज़रूरत है इसे सिर्फ दिखाने की नहीं, समझने की, संजोने की, और आगे बढ़ाने की।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Hot this week

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

Topics

हसन नईम: ग़म को अपनी ताक़त बनाने वाले शायर

हसन नईम ने अपनी शायरी के ज़रिए ज़िंदगी के...

5,000 घंटे की उड़ान, चार दशक की ख़िदमत: Air Chief Marshal AP Singh का शानदार सफ़र

जब कोई लड़ाकू विमान आवाज़ की रफ़्तार को पार...

वहीद अख़्तर: शायरी, फ़लसफ़े और इल्म की दुनिया का एक अहम नाम

उर्दू अदब की दुनिया में शायरी सिर्फ़ अल्फ़ाज़ का...

मुजतबा हुसैन: हंसी के पीछे छुपी सच्चाई का बेमिसाल क़लमकार

उर्दू अदब में तंज़-ओ-मज़ाह की बात हो और मुजतबा...

Balbir Singh Senior: भारतीय हॉकी को गोल्ड की राह दिखाने वाले

भारतीय हॉकी के इतिहास में जब भी बड़े खिलाड़ियों...

Related Articles

Popular Categories