पंजाब की ज़मीन अपने समृद्ध इतिहास, बहादुरी की दास्तानों, सांस्कृतिक विरासत और शाही शान-ओ-शौक़त के लिए दुनिया भर में जानी जाती है। इसी तारीख़ी ज़मीन पर बसा संगरूर शहर कभी मशहूर जींद रियासत की राजधानी हुआ करता था। आज भी शहर में कई ऐसी तारीख़ी इमारतें मौजूद हैं, जो उस दौर की शाही शान और शानदार कला की कहानी बयान करती हैं। इन्हीं में Banasar Bagh (बनासर बाग़) और उसके अंदर मौजूद ज़िला म्यूज़ियम की ख़ास जगह है।
Banasar Bagh (बनासर बाग़) के अंदर बना ये म्यूज़ियम सिर्फ़ पुरानी चीज़ों को महफ़ूज़ रखने की जगह नहीं है, बल्कि ये जींद रियासत के इतिहास, शाही ज़िंदगी, कला, संस्कृति और विरासत की एक पूरी तस्वीर पेश करता है। लंबे वक़्त तक मरम्मत और नवीकरण (renovation) के काम की वजह से ये म्यूज़ियम आम लोगों और सैलानियों के लिए बंद रहा। लेकिन अब इस तारीख़ी धरोहर को महफ़ूज़ करने और इसे नया रूप देने के बाद दोबारा लोगों के लिए खोल दिया गया है। इसके दोबारा खुलने से संगरूर की तारीख़ी और सांस्कृतिक पहचान को एक नई मज़बूती मिली है।
बनासर बाग़ का तारीख़ी पसमंज़र
पंजाब की तारीख़ में जींद रियासत की एक अहम जगह रही है। जींद के हुक्मरानों ने संगरूर को एक सुनियोजित और ख़ूबसूरत शहर बनाने में बड़ा किरदार निभाया। शहर में महल, बाग़, दरबार और कई दूसरी तारीख़ी इमारतें बनवाई गई। Banasar Bagh (बनासर बाग़) भी इसी शाही विरासत का एक अहम हिस्सा है। इस बाग़ का इस्तेमाल जींद के हुक्मरान गर्मियों में रहने के लिए करते थे। बाग़ के बीच में बनी संगमरमर की बारादरी इसकी सबसे दिलकश ख़ासियतों में से एक है।

चारों तरफ़ पानी से घिरी ये बारादरी उस दौर की ख़ूबसूरती, वास्तुकला और शाही सुख-सुविधाओं की शानदार मिसाल है। Banasar Bagh (बनासर बाग़) के अंदर बना दरबार हॉल भी तारीख़ के लिहाज़ से बेहद अहम है। यहां रियासत के प्रशासन से जुड़े काम होते थे। हुक्मरान अपने मंत्रियों, अफ़सरों और लोगों के साथ दरबार लगाया करते थे। वक़्त के साथ इस इमारत को जींद रियासत से जुड़ी दुर्लभ चीज़ों को महफ़ूज़ रखने और लोगों को दिखाने के लिए म्यूज़ियम में तब्दील कर दिया गया।
वास्तुकला का शानदार नमूना
Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) की अहमियत सिर्फ़ यहां रखी गई पुरानी चीज़ों की वजह से नहीं है। इसकी इमारत खुद कला और वास्तुकला का एक शानदार मेल है। इसमें मुग़ल, राजस्थानी और फ़ारसी कला का असर साफ़ दिखाई देता है। तारीख़ी जानकारी के मुताबिक, इस इमारत की नींव 1870 में जींद रियासत के हुक्मरान महाराजा रघबीर सिंह ने रखी थी। महाराजा रघबीर सिंह को कला, साहित्य और वास्तुकला में ख़ास दिलचस्पी थी। उनके दौर में संगरूर को जयपुर की तर्ज़ पर बसाने और ख़ूबसूरत बनाने की कोशिश की गई। इसी दौरान शहर में कई शानदार इमारतें भी बनवाई गई।
इमारत की छत पर की गई मीनाकारी और सोने की बारीक कारीगरी इसकी ख़ास पहचान है। बताया जाता है कि इस काम के लिए फ़ारस से माहिर कारीगर बुलाए गए थे। छत और इमारत के अंदर किए गए रंग-बिरंगे नक्शे और सजावट उस दौर के कारीगरों की बेहतरीन हुनरमंदी को दिखाते हैं। इस इमारत की लकड़ी पर की गई नक्क़ाशी भी लोगों का ध्यान खींचती है। मशहूर कलाकार और आर्किटेक्ट भाई राम सिंह का नाम इस इमारत की अंदरूनी सजावट और लकड़ी की कारीगरी से जोड़ा जाता है। दरवाज़ों, झरोखों और लकड़ी के दूसरे हिस्सों पर की गई बारीक नक्काशी पंजाबी कला की समृद्ध परंपरा की ख़ूबसूरत मिसाल है।

दुर्लभ तारीख़ी ख़ज़ानों का संग्रह
Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) में दाख़िल होते ही ऐसा महसूस होता है, जैसे हम तारीख़ के किसी पुराने दौर में पहुंच गए हों। यहां जींद रियासत के हुक्मरानों और शाही ख़ानदान से जुड़ी कई दुर्लभ चीज़ों को संभालकर रखा गया है। इनमें पुराने हथियार, तलवारें, ढालें, पिस्तौल और बंदूकें शामिल हैं। इसके अलावा शाही लिबास, पुराने दस्तावेज़, सिक्के, हुक्मरानों की तस्वीरें और दूसरी तारीख़ी चीज़ें भी यहां मौजूद हैं। ये सभी चीज़ें उस दौर की शाही ज़िंदगी से रूबरू कराती हैं। म्यूज़ियम में मज़हबी और अदबी अहमियत रखने वाली चीज़ें भी मौजूद हैं। सोने की बारीक
कारीगरी वाली किरपानें और हाथ से लिखे पुराने मज़हबी ग्रंथों की पोथियां उस दौर की मज़हबी आस्था और कारीगरी की खूबसूरत झलक दिखाती हैं। यहां रखी हर चीज़ अपने आप में एक कहानी कहती है। हथियार उस दौर की जंग और लड़ाई के तरीके के बारे में बताते हैं, सिक्के आर्थिक और हुकूमती निज़ाम की झलक देते हैं, जबकि तस्वीरें और शाही लिबास उस दौर की ज़िंदगी और कला के शौक़ के बारे में बताते हैं।

मरम्मत और बहाली के बाद नई शक्ल
वक़्त के साथ पुरानी और तारीख़ी इमारतों को मौसम और दूसरे प्राकृतिक असर की वजह से नुकसान पहुंचता है। बनासर बाग़ और म्यूज़ियम भी इससे अछूता नहीं रहा। इमारत की पुरानी वास्तुकला और अंदर की कलात्मक विरासत को महफ़ूज़ रखने के लिए इसकी मरम्मत और बहाली की ज़रूरत महसूस हुई। पंजाब सरकार के पर्यटन और सांस्कृतिक मामलों से जुड़े विभाग की तरफ़ से इस तारीख़ी इमारत की मरम्मत और देखभाल का काम करवाया गया। इस दौरान इमारत को मज़बूत करने के साथ-साथ छत की कलात्मक सजावट, लकड़ी के काम, रोशनी और दूसरी ज़रूरी चीज़ों पर भी ख़ास ध्यान दिया गया।
मरम्मत का सबसे बड़ा मक़सद इमारत को नई मज़बूती देना था, लेकिन साथ ही इसकी पुरानी वास्तुकला और तारीख़ी शक्ल को बरक़रार रखना भी ज़रूरी था। इसलिए कोशिश की गई कि जहां तक मुमकिन हो, पुराने तरीकों और इमारत की असली कलात्मक शैली को ही कायम रखा जाए। मरम्मत के बाद Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) को दोबारा लोगों के लिए खोलना संगरूर की विरासत को महफ़ूज़ रखने की दिशा में एक अहम क़दम माना जा रहा है। अब स्थानीय लोगों के साथ-साथ सैलानियों और तारीख़ में दिलचस्पी रखने वाले लोगों को भी इस शानदार विरासत को करीब से देखने का मौक़ा मिलेगा।

रिसर्च करने वालों की नज़र में अहमियत
संगरूर की तारीखी इमारतों पर रिसर्च करने वाले स्थानीय रिसर्चर राजीव जिंदल के मुताबिक, बनासर बाग़, शाही समाधियां, घंटाघर और रणबीर क्लब जैसी इमारतें संगरूर की वास्तुकला की विरासत का अनमोल हिस्सा हैं। ऐसी पुरानी इमारतों की मरम्मत करना आम इमारतों की मरम्मत से कहीं ज़्यादा मुश्किल काम होता है। इसमें सबसे बड़ी चुनौती ये होती है कि इमारत की असली बनावट, कलात्मक काम और तारीख़ी पहचान को किसी भी तरह का नुकसान न पहुंचे।
इसी वजह से Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) की मरम्मत और देखभाल को एक अहम कोशिश माना जा रहा है। इससे न सिर्फ़ इस पुरानी इमारत को महफ़ूज़ रखा जा सकेगा, बल्कि आने वाली नस्लों को भी संगरूर की इस शानदार तारीखी विरासत को करीब से जानने और समझने का मौक़ा मिलेगा।
नई पीढ़ी के लिए विरासत का सबक
म्यूज़ियम सिर्फ़ बीते दौर की चीज़ों को देखने की जगह नहीं होते। ये नई पीढ़ी को इतिहास से जोड़ने वाले अहम तालीमी मरकज़ भी होते हैं। Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) में रखी चीज़ें स्टूडेंट्स को किताबों में पढ़े इतिहास को असल रूप में समझने का मौक़ा देती हैं। स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट्स के लिए ऐसी जगहें पढ़ाई और रिसर्च के लिहाज़ से बेहद फ़ायदेमंद हो सकती हैं।

यहां रखे हथियार, सिक्के, दस्तावेज़, तस्वीरें और दूसरी कलात्मक चीज़ों के ज़रिए स्टूडेंट्स उस दौर की सियासत, समाज, मज़हब और कला के अलग-अलग पहलुओं को समझ सकते हैं। इस तरह Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) सिर्फ़ पुरानी चीज़ों को महफ़ूज़ रखने की जगह नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी तारीख़ और विरासत से जोड़ने का एक ज़रिया भी बन सकता है।
सैलानियों के लिए बड़ी संभावनाएं
Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) का दोबारा खुलना संगरूर के सैलानी सफ़र के लिए भी अहम है। अगर इस जगह को संगरूर की दूसरी तारीख़ी इमारतों से जोड़कर एक हेरिटेज टूरिस्ट सर्किट के तौर पर विकसित किया जाए, तो संगरूर पंजाब के अहम विरासती सैलानी ठिकानों में अपनी जगह बना सकता है। आने वाले वक़्त में डिजिटल गाइड, ऑडियो-विज़ुअल शो, जानकारी केंद्र और दूसरी आधुनिक सुविधाएं इस म्यूज़ियम को और दिलचस्प बना सकती हैं। इससे नौजवानों के साथ-साथ बाहर से आने वाले सैलानियों की दिलचस्पी भी बढ़ेगी।
संगरूर के बनासर बाग़ में मौजूद ज़िला म्यूज़ियम जींद रियासत की समृद्ध विरासत, पंजाब की शाही रवायत और बेहतरीन कला का एक अनोखा नमूना है। इसकी खूबसूरत वास्तुकला, सोने की मीनाकारी, लकड़ी की नक़्क़ाशी और अंदर महफ़ूज़ रखी गई दुर्लभ तारीख़ी चीज़ें इसे पंजाब की अहम विरासती जगहों में शामिल करती हैं। इस तारीख़ी इमारत की मरम्मत और बहाली करके इसे दोबारा लोगों के लिए खोलना सिर्फ़ एक पुरानी इमारत की मरम्मत नहीं है। ये पंजाब की सांस्कृतिक यादों और विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की एक अहम कोशिश भी है।

ज़रूरत इस बात की है कि ऐसी तारीख़ी जगहों की लगातार देखभाल की जाए और उन्हें आधुनिक सुविधाओं से जोड़ा जाए। Banasar Bagh Museum (बनासर बाग़ म्यूज़ियम) हमें याद दिलाता है कि इतिहास सिर्फ़ किताबों में लिखे अल्फ़ाज़ों का नाम नहीं है। इतिहास हमारी इमारतों, पुरानी चीज़ों, कला और विरासत की यादों में भी ज़िंदा रहता है। इसलिए ये हमारी साझा ज़िम्मेदारी है कि हम अपनी इस अनमोल विरासत को समझें, इसे महफ़ूज़ रखें और आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित तरीके से पहुंचाएं।
लेख– सविंदर कौर
इस लेख को पंजाबी में पढ़ें
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