साउथ मुंबई की हलचल भरी सड़क के पार एक सदी पुरानी इमारत में एक खामोश कोशिश जारी है।यह कोशिश है उन नायाब फारसी और उर्दू अनुवादों को बचाने की,जो भारतीय धर्मग्रंथों के हैं। ये किताबें हमारे Pluralistic और Inclusive अतीत की आख़िरी निशानियां हैं।
करीमी लाइब्रेरी (Karimi Library), जो 152 साल पुराने अंजुमन-ए-इस्लाम संस्थान (Anjuman-i-Islam Institution) के अंदर मौजूद है, ने 32 से ज़्यादा पवित्र हिंदू ग्रंथों जिनमें महाभारत, रामायण, भगवद गीता और शिव पुराण शामिल हैं को संरक्षित करने के लिए एक बड़ा अभियान शुरू किया है। ये किताबें 1867 से 1896 के बीच छपी थीं।
ये इमारत, जो छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस के पास खड़ी है, संस्कृत, अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी, मराठी, पश्तो और अरबी में किताबों, अख़बारों और पांडुलिपियों का ख़ज़ाना है। इसमें इतिहास, दर्शन, धर्मशास्त्र, साहित्य, भूगोल और कई विषयों पर किताबें हैं, जिनमें से कुछ 150 साल से भी पुरानी हैं।
इसकी नींव 1874 में बदरुद्दीन तैयब जी (Badruddin Tyab) ने रखी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक,पद्मश्री डॉ. ज़हीर काज़ी, जो अंजुमन-ए-इस्लाम के अध्यक्ष हैं, ने बताया कि ये लाइब्रेरी 1898 में तब स्थापित हुई जब ताजिर (merchant) काज़ी अब्दुल करीम पोरबंदरी ने 4,500 क़ीमती किताबें दान कीं, और इसका नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया।

धार्मिक किताबों के अलावा, यहां मुगल बादशाह औरंगज़ेब के फरमान (royal decrees) भी मौजूद हैं। सबसे हैरान करने वाली चीज़ है कि 1875 के पुराने अख़बार, जिनमें जयपुर गज़ट,अंबाला गज़ट और काहिरा का अल-क़ायरा शामिल हैं। ये अख़बार भारत के शुरुआती स्वतंत्रता संग्राम की झलक देते हैं।

इलाज–कीमियाई केमिकल से
रिपोर्ट्स के मुताबिक डॉ. काज़ी बताते हैं कि ‘किताबें बूढ़ी हो चुकी हैं, पन्ने नाज़ुक (brittle) हो गए हैं। इन्हें फफूंद (fungus) और कीड़ों से बचाने के लिए ख़ास केमिकल से ट्रीटमेंट करना पड़ता है। जो किताबें ज़्यादा ख़राब हालत में हैं, उनके पन्नों को ख़ास कागज़ से चिपकाकर (pasting) बचाया जाता है।’
इन किताबों को डिजिटल बनाने (digitisation) का प्रोसेस भी तेज़ी से चल रही है। एक्सपर्ट्स की टीम हर पन्ने को स्कैन करके अंजुमन- ए-इस्लाम के क्लाउड अकाउंट पर अपलोड कर रही है।
आज़ादी की पहली खबरें
माडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि लाइब्रेरी के इंचार्ज मोहम्मद ग़ालिब मुल्ला ने खुलासा किया कि अब तक 1,00,000 से ज़्यादा किताबों के पन्ने और 70,000 अख़बारों व मैगज़ीन के पन्ने डिजिटाइज़ हो चुके हैं। बस 2,250 पन्ने बाकी हैं। इन अख़बारों के सोर्स (source) के बारे में ज़्यादा मालूम नहीं है, लेकिन मुल्ला का कहना है कि ये अंजुमन-ए-इस्लाम ने ही ख़रीदे होंगे, क्योंकि ये संस्थान शुरू से एक सीखने का सेंटर रहा है।

रवादारी का आईना
ये किताबें इतनी सहिष्णुता (tolerance) को दिखाती है कि ये भारतीयों के लिए आंखें खोलने वाली बात है कि हमारी विरासत (heritage) इस लाइब्रेरी में ज़िंदा है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई स्वतंत्रता सेनानी इस अंजुमन-ए-इस्लाम के मैनेजमेंट से जुड़े थे और ये लाइब्रेरी उनकी सीक्रेट मीटिंग्स की गवाह रही है।
बहाली और नए सिरे का उद्घाटन
करीमी लाइब्रेरी की इमारत की भी मरम्मत (renovation) हो रही है, और कोशिश है कि उसकी पुरानी-दुनिया (old-world) छाप बरकरार रहे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) तक बहाली का काम पूरा करके इसे जनता के लिए फिर से खोलने की मंशा है।

एक मिसाल
करीमी लाइब्रेरी सिर्फ किताबों का कलेक्शन नहीं ये गंगा-जमुनी तहज़ीब (Ganga-Jamuni culture) की ज़िंदा मिसाल है, जहां फारसी, उर्दू और संस्कृत एक साथ पलीं। यहां महाभारत और रामायण उर्दू-फारसी में मौजूद हैं जो ये बताता है कि हमारे बुज़ुर्गों ने धर्म, भाषा और मज़हब की दीवारें कभी नहीं खड़ी कीं।
यह बहाली (restoration) सिर्फ कागज़ों को बचाना नहीं है बल्कि ये हमारी सोच को बचाना है,जो आज के दौर में बिखरती नज़र आती है।जब 150 साल पुराने अख़बार हमें बताते हैं कि आज़ादी की पहली लड़ाई कैसे लड़ी गई, तो हमें अपनी जड़ों (roots) पर गर्व होता है।
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