उर्दू शायरी में कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं जो सिर्फ़ इश्क़ की बात नहीं करतीं, बल्कि इंसान की पूरी ज़िंदगी को अपने अशआर में समेट लेती हैं। इफ़्तिख़ार आरिफ़ ऐसी ही आवाज़ हैं। उनकी शायरी में जुदाई का दर्द है, घर की तलाश है, मां की याद है, दुआ है और इंसान के अंदर चलती रहने वाली एक ख़ामोश बातचीत भी है।
“मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मो’तबर कर दे
मैं जिस मकान में रहता हूं उस को घर कर दे”
लखनऊ से शुरू हुआ सफ़र
इफ़्तिख़ार हुसैन आरिफ़ की पैदाइश 21 मार्च 1944 को लखनऊ में हुई। उनका बचपन इसी शहर की तहज़ीब, ज़बान और अदबी माहौल में गुज़रा। बंटवारे के बाद 1965 में वह पाकिस्तान चले गए। लखनऊ से पाकिस्तान तक का यह सफ़र उनकी शख़्सियत और शायरी दोनों पर गहरा असर छोड़ता है।
उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए. की पढ़ाई पूरी की। उनकी तालीम में साहित्य के साथ-साथ उर्दू और अंग्रेज़ी का अध्ययन भी शामिल रहा। बाद में उन्होंने पत्रकारिता का अध्ययन न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से किया।
यानी उनकी शायरी सिर्फ़ जज़्बात की पैदावार नहीं, बल्कि गहरे अध्ययन और फ़िक्र का नतीजा भी है।
ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
पाकिस्तान जाकर नई ज़िंदगी
1965 में पाकिस्तान पहुंचने के बाद इफ़्तिख़ार आरिफ़ ने रेडियो पाकिस्तान से अपने पेशेवर सफ़र की शुरुआत की। बाद में वह पाकिस्तान टेलीविज़न से भी जुड़े और मशहूर कार्यक्रम ‘कसौटी’ से उनका नाम जुड़ा। इसके बाद उन्होंने लंदन में भी कई साल गुज़ारे और उर्दू अदब की ख़िदमत से जुड़े रहे।
उनकी ज़िंदगी का यह सफ़र—लखनऊ, कराची, लंदन और फिर पाकिस्तान के अदबी संस्थानों तक—उनकी शायरी में मौजूद हिजरत यानी (एक जगह से दुसरी जगह जाना) और पहचान के एहसास को समझने की एक अहम कुंजी है।
शायरी में दर्द भी, उम्मीद भी
इफ़्तिख़ार आरिफ़ की शायरी की सबसे ख़ास बात यह है कि उनका दर्द सिर्फ़ मायूसी पैदा नहीं करता। उसमें उम्मीद की एक रौशनी भी दिखाई देती है।
ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है
ऐसी तन्हाई कि मर जाने को जी चाहता है
“दुआ को हाथ उठाते हुए लरज़ता हूं
कभी दुआ नहीं मांगी थी मां के होते हुए”
इन अशआर में बड़े-बड़े फ़लसफ़े नहीं, बल्कि आम इंसान के बेहद क़रीबी एहसास मौजूद हैं। यही वजह है कि पाठक उनके शेर में अपना कोई ज़ख़्म, अपनी कोई याद या अपना कोई सवाल महसूस कर लेता है।
कर्बला, रवायत और इंसानी फ़िक्र
इफ़्तिख़ार आरिफ़ की शायरी में इस्लामी इतिहास और कर्बला के प्रतीक भी अहम जगह रखते हैं। और उनके कलाम में धार्मिक प्रतीकों को आधुनिक इंसानी तर्जुबों के साथ जोड़ा गया है।
उनकी यही ख़ासियत उन्हें महज़ रोमांटिक शायर की पहचान से आगे ले जाती है। उनके यहां मोहब्बत निजी एहसास भी है और इंसानी रिश्तों, समाज और इतिहास को समझने का ज़रिया भी।
रिंद जो ज़र्फ़ उठा लें वही साग़र बन जाए
जिस जगह बैठ के पी लें वही मय-ख़ाना बने
इफ़्तिख़ार आरिफ़ का पहला प्रमुख काव्य-संग्रह ‘महर-ए-दो-नीम’ 1984 में प्रकाशित हुआ। इसमें 64 ग़ज़लें और 46 नज़्में शामिल थीं। इस किताब की भूमिका फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लिखी थी और गोपीचंद नारंग ने भी उनके कलाम पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
इसके बाद ‘हर्फ़-ए-बरीयाब’, ‘जहान-ए-मालूम’ और ‘बाग़-ए-गुल-ए-सुर्ख़’ जैसे संग्रह सामने आए। बाद में उनकी शायरी को ‘सुख़न-ए-इफ़्तिख़ार’ नाम से कुल्लियात की शक्ल में भी प्रकाशित किया गया।
अदब की ख़िदमत और सम्मान
इफ़्तिख़ार आरिफ़ ने सिर्फ़ शायरी नहीं की, बल्कि पाकिस्तान के अदबी और भाषाई संस्थानों में भी अहम ज़िम्मेदारियां निभाईं। वह Pakistan Academy of Letters और National Language Authority से जुड़े रहे।
उनकी अदबी सेवाओं के लिए उन्हें Pride of Performance, Sitara-e-Imtiaz और Hilal-e-Imtiaz जैसे बड़े सम्मान मिले। बाद में उन्हें Nishan-e-Imtiaz से भी सम्मानित किया गया।
इफ़्तिख़ार आरिफ़ की शायरी की असल ख़ूबसूरती शायद यही है कि वह बहुत बड़ी बात को भी बेहद सादा लफ़्ज़ों में कह देते हैं। उनकी शायरी में लखनऊ की तहज़ीब, हिजरत का दर्द, घर की तलाश, मां की याद, इश्क़, आस्था और इंसानियत—सब एक साथ दिखाई देते हैं।
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