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अख़लाक़ अहमद आहन: फ़ारसी और उर्दू अदब की एक ख़ास आवाज़

फ़ारसी और उर्दू अदब की दुनिया में प्रोफ़ेसर अख़लाक़ अहमद आहन एक ऐसी शख़्सियत हैं, जिन्होंने तालीम, तहक़ीक़, तनक़ीद और शायरी—चारों मैदानों में अपनी अलग पहचान बनाई है। वह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के फ़ारसी विभाग से वाबस्ता हैं और इससे पहले जामिया मिल्लिया इस्लामिया में भी तदरीस की ज़िम्मेदारी निभा चुके हैं।

उनका तालीमी सफ़र भी काफ़ी दिलचस्प रहा है। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से भूगोल ऑनर्स में बी.ए. किया। इसके बाद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एम.ए. किया और आधुनिक फ़ारसी शायरी के विषय पर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। इसके अलावा उन्होंने इतिहास में भी एम.ए. किया और तेहरान की तर्बिय्यत मुदर्रिस यूनिवर्सिटी से आधुनिक फ़ारसी में एडवांस कोर्स किया।

फ़ारसी अदब से गहरा रिश्ता

प्रोफ़ेसर अख़लाक़ ने फ़ारसी अदब के कई अहम पहलुओं पर शोध और आलोचना का काम किया है। अमीर ख़ुसरो, मिर्ज़ा अब्दुल क़ादिर बेदिल और उमर ख़य्याम जैसे बड़े अदबी नामों पर उनका काम ख़ास अहमियत रखता है।

उन्होंने फ़ारसी और उर्दू दोनों ज़बानों में लिखा है। उनकी शायरी में फ़ारसी अदब की रवायत, सूफ़ियाना फ़िक्र और इंसानी जज़्बात का ख़ूबसूरत मेल दिखाई देता है।

उनका यह शेर उनकी शायरी की कैफ़ियत को बख़ूबी बयान करता है।

“ये कैसी जगह है कि दिल खो रहा है
बयाबां है, सहरा है, गुलशन है क्या है।”

इन अशआर में एक ऐसी उलझन और कैफ़ियत दिखाई देती है, जहां शायर ख़ुद तय नहीं कर पा रहा कि सामने वीराना है, सहरा है या फिर कोई ख़ूबसूरत गुलशन।

शायरी में इश्क़ और रूहानी कैफ़ियत

प्रोफ़ेसर अख़लाक़ के कलाम में इश्क़ सिर्फ़ एक जज़्बा नहीं, बल्कि एक रूहानी सफ़र भी है। उनकी शायरी में जुदाई, तन्हाई, हिज्र, विसाल और रूहानी तलाश बार-बार सामने आती है।

“सितारों की गर्दिश, दिलों का बिछड़ना
ये कैसी ख़ुदा की है, कैसी ख़ुदाई।”

यहां शायर आसमान की गर्दिश और इंसानी रिश्तों के बिछड़ने को एक साथ रखकर ज़िंदगी के बड़े सवालों की तरफ़ इशारा करता है।

उनके अशआर में मोहब्बत की कशिश भी है और रूह की बेचैनी भी।

“वो जादू अदाएं, अदाओं में जादू
ये पहुंचाएं हम को फ़ना से बक़ा तक।”

इश्क़ की यही कैफ़ियत उनकी शायरी को महज़ रोमानी एहसास तक सीमित नहीं रहने देती, बल्कि उसे एक गहरी रूहानी तलाश में बदल देती है।

इश्क़, हिज्र और दर्द

उनकी शायरी में दर्द का रंग भी बहुत गहरा है। कहीं महबूब का जल्वा है, कहीं हिजाब की कैफ़ियत और कहीं आशिक़ की बेबसी।

“तेरा जल्वा है आज तौबा-शिकन
आओ, शौक़-ए-हिजाब रहने दो।”

इन अल्फ़ाज़ में इश्क़ की वह कैफ़ियत है, जहां दीदार की चाह और पर्दे की कशमकश एक साथ दिखाई देती है।

एक और शेर में वह कहते हैं।

“कोई जलता है तमाशा बन के उस की बज़्म में,
मैं ग़रीब-ए-शहर था, पिन्हां का पिन्हां जल गया।”

यहां महफ़िल की चमक के बीच एक ऐसे इंसान का दर्द सामने आता है, जो अपनी ही कैफ़ियत में ख़ामोशी से जलता रहा।

तहक़ीक़ और अदबी ख़िदमात

शायरी के साथ-साथ प्रोफ़ेसरअख़लाक़  आहन ने फ़ारसी साहित्य के इतिहास, पत्रकारिता और आलोचना पर भी काम किया है। उनकी किताबों में ‘मसाला-ए-तमसील दर अदबियात-ए-फ़ारसी’, ‘हिंदुस्तान में फ़ारसी सहाफ़त की तारीख़’, ‘Amir Khusro’s India’, ‘मक़ालात-ए-मौलाना अर्शी’, ‘आसफ़ी रामपुरी’ और ‘मिर्ज़ा बेदिल’ जैसी किताबें शामिल हैं।

उनका काम सिर्फ़ भारत तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने देश-विदेश के सेमिनारों और शेरी-अदबी महफ़िलों में शिरकत की और उनके लेख व शायरी अलग-अलग पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे।

उनकी उर्दू शायरी का फ़ारसी और पश्तो जैसी ज़बानों में अनुवाद भी हुआ है, जो उनकी अदबी पहुंच और मक़बूलियत को दर्शाता है।

अदबी काम का एतराफ़

प्रोफ़ेसर अख़लाक़ अहमद आहन को उनके साहित्यिक और शोध कार्य के लिए कई संस्थाओं ने सम्मानित किया है। इनमें इको, ईरान, अफ़ग़ानिस्तान कल्चर हाउस, बिहार उर्दू अकादमी और दिल्ली उर्दू अकादमी शामिल हैं।

उनके साहित्यिक काम पर ईरान के सहर टीवी चैनल ने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म भी बनाई।

एक शायर और मुहक़्क़िक़

प्रोफ़ेसर अख़लाक़ अहमद आहन की शख़्सियत में एक तरफ़ उस्ताद और मुहक़्क़िक़ दिखाई देते हैं, तो दूसरी तरफ़ एक संवेदनशील शायर। उनका अदबी सफ़र फ़ारसी की पुरानी रवायत को समझते हुए उसे आज के एहसास से जोड़ने की कोशिश है।

“लगा के आग बुझाने की बात करते हो,
फफोले दिल में सजाने की बात करते हो।”

यही उनकी शायरी का ख़ास रंग है—सादा मगर असरदार अल्फ़ाज़, गहरी फ़िक्र और दिल की कैफ़ियत को शेर में ढालने का हुनर। फ़ारसी और उर्दू अदब के बीच उनकी मौजूदगी इस बात की याद दिलाती है कि ज़बानें अलग हो सकती हैं, लेकिन जज़्बात और इंसानी एहसास की ज़बान एक ही होती है।

ये भी पढ़ें: अमृता प्रीतम: मोहब्बत, तन्हाई और बंटवारे के दर्द की आवाज़

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