उर्दू अदब की तारीख़ में कई ऐसे शायर गुज़रे हैं जिन्होंने अपनी शायरी के ज़रिए इश्क़, रूहानियत और इंसानी जज़्बात को बड़ी ख़ूबसूरती से बयां किया। उन्हीं नामों में एक अहम नाम मुकर्रम अहमद मीर ‘नज़र’ अली ‘दर्द’ काकोरवी का भी है। उनकी शायरी में सूफ़ियाना रंग, इश्क़-ए-हक़ीक़ी की तड़प और अल्लाह की क़ुर्बत की आरज़ू साफ़ दिखाई देती है।
‘दर्द’ काकोरवी की पैदाइश 1891 में उत्तर प्रदेश के इटावा में हुयी। आपके वालिद हकीम हबीब अली ‘हबीब’ काकोरवी अपने दौर के मशहूर शायर, अदीब और हकीम थे। घर का माहौल इल्म, अदब और शायरी से भरपूर था, इसलिए बचपन से ही ‘दर्द’ काकोरवी के दिल में इल्म और अदब का शौक़ पैदा हो गया।
आपकी शुरुआती तालीम आपके बड़े भाई हकीम वसी अली काकोरवी की निगरानी में हुई। इसके बाद आप अपने दूसरे भाई रज़ी अली ‘अफ़गार’ के साथ रामपुर चले गए। उस ज़माने में रामपुर उर्दू अदब का एक बड़ा मरकज़ था। वहीं रहते हुए आपकी शायरी और अदबी ज़ौक़ को नई दिशा मिली। आप करीब पैंतीस साल तक रामपुर में रहे और इसी दौरान आपने शायरी और नसर (गद्य) दोनों में अपनी पहचान बनाई।
‘दर्द’ काकोरवी को अरबी, फ़ारसी और उर्दू तीनों ज़बानों पर बेहतरीन पकड़ हासिल थी। यही वजह थी कि उनकी शायरी में फ़ारसी लफ़्ज़ों की नफ़ासत, उर्दू की मिठास और सूफ़ियाना तास्सुर एक साथ नज़र आता है। वे सिर्फ़ शायर ही नहीं बल्कि एक अच्छे निबंधकार और लेखक भी थे। उनके अशआर, मज़ामीन और तहरीरें उस दौर के मशहूर रिसालों और अदबी पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होती रहीं।
उनकी ग़ज़लों का सबसे ख़ास पहलू उनका रूहानी अंदाज़ है। ‘दर्द’ काकोरवी के यहां साक़ी, मय, पैमाना और मयख़ाना जैसे अल्फ़ाज़ सिर्फ़ दुनियावी मायने नहीं रखते, बल्कि ये इश्क़-ए-इलाही, रूहानी कैफ़ियत और ख़ुदा की पहचान के इस्तिआरे (प्रतीक) बन जाते हैं। यही वजह है कि उनकी शायरी सूफ़ी फ़िक्र से गहरे तौर पर जुड़ी हुई महसूस होती है।
“‘दर्द’ के दिल को बना मख़ज़न-ए-फ़व्वारा-ए-नूर,
मेरी तारीकी-ए-क़िस्मत के उजाले साक़ी।”
मुझे लगता है कि, इस शेर में शायर अल्लाह से यह दुआ करता है कि उसके दिल को नूर का ख़ज़ाना बना दिया जाए, ताकि उसकी ज़िंदगी की तमाम तारीकियां रौशनी में बदल जाएं। यही उनकी शायरी का असल पैग़ाम भी है।
“अपना बे-ख़ुद मुझे लिल्लाह बना ले साक़ी,
बुर्क़ा फिर चेहरा-ए-अनवर से हटा ले साक़ी।”
यहां ‘साक़ी’ से मुराद वह रूहानी रहबर है जो इंसान को दुनिया की मोहब्बत से निकालकर इश्क़-ए-हक़ीक़ी की मंज़िल तक पहुंचा देता है। पूरी ग़ज़ल में इबादत, फ़ना, इश्क़ और रूहानी कैफ़ियत का ख़ूबसूरत इज़हार मिलता है।
एक और ग़ज़ल में ‘दर्द’ काकोरवी इंसानी दिल की बेचैनी और मोहब्बत की गहराई को यूं बयान करते हैं कि मोहब्बत छिपाने से भी नहीं छिपती। दिल का दर्द, उम्मीद, मायूसी और इश्क़ की आग इंसान के वजूद का हिस्सा बन जाती है। यही एहसास उनकी शायरी को आम इश्क़िया ग़ज़लों से अलग पहचान देता है।
ज़िंदगी के आख़िरी दिनों में ‘दर्द’ काकोरवी काकोरी से कराची चले गए। वहीं उन्होंने अपनी बाक़ी ज़िंदगी गुज़ारी। 1972 में उनका इंतिक़ाल हुआ और कराची ही में उन्हें सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
मुकर्रम अहमद मीर ‘नज़र’ अली ‘दर्द’ काकोरवी की शायरी आज भी उर्दू अदब के चाहने वालों के दिलों में ज़िंदा है। उनकी ग़ज़लों में इश्क़-ए-हक़ीक़ी, सूफ़ियाना फ़िक्र, रूहानी तजुर्बात और इंसानी जज़्बात का ऐसा ख़ूबसूरत संगम मिलता है जो हर दौर के क़ारी को अपनी तरफ़ मुतवज्जेह करता है। उन्होंने अपनी इल्मी और अदबी ख़िदमात के ज़रिए उर्दू शायरी को एक ऐसी रूहानी आवाज़ दी, जिसकी गूंज आज भी महसूस की जा सकती है।
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