हज़रत शेख बहाउद्दीन ज़कारिया (करीब 1170–1262 ई.) भारतीय उपमहाद्वीप के मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग, आलिम, शायर और सुहरावर्दिया सिलसिले के बड़े रहनुमा थे। उन्होंने मुल्तान को अपनी दावत, इल्म और रूहानियत का मरकज़ बनाया। उनकी तालीमात ने लाखों लोगों के दिलों पर असर डाला और उन्हें अपने दौर के सबसे बड़े रूहानी पेशवाओं में शुमार किया गया।
शुरुआती ज़िंदगी
हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया का ताल्लुक एक सम्मानित हाशिमी ख़ानदान से था, जिसका नसब हज़रत मुहम्मद के ख़ानदान से जुड़ता है। उनके बुज़ुर्ग मध्य एशिया के ख़्वारज़्म इलाक़े से पंजाब आए और मुल्तान के क़रीब आबाद हो गए। बचपन से ही उन्हें इल्म और दीन से गहरी दिलचस्पी थी।
इल्म हासिल करने के बाद उन्होंने कई शहरों का सफ़र किया और आख़िरकार 1222 ई. में मुल्तान को अपना ठिकाना बनाया। उनकी वजह से मुल्तान को “बग़दाद-ए-मशरिक़” यानी पूरब का बग़दाद कहा जाने लगा।
हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया मुल्तान से बेहद मोहब्बत करते थे। उन्होंने फ़ारसी में लिखा।
“हमारा मुल्तान जन्नत की तरह है, यहां आहिस्ता चलो, क्योंकि फ़रिश्ते भी यहां सज्दा करते हैं।”
इल्म और रूहानियत का पैग़ाम
हज़रत ज़कारिया का कहना था कि इंसान सिर्फ़ इबादत ही नहीं, बल्कि इल्म, अच्छे अख़लाक़ और इंसानियत की ख़िदमत को भी अपनी ज़िंदगी का हिस्सा बनाए। उनका मानना था कि अल्लाह की सच्ची मोहब्बत नेक अमल और लोगों की भलाई से हासिल होती है। वे अपने मुरीदों को ख़त लिखकर नेक रास्ते पर चलने और मज़लूमों की मदद करने की नसीहत करते थे।
सुहरावर्दिया सिलसिला
हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया, बग़दाद के मशहूर सूफ़ी हज़रत शहाबुद्दीन सुहरावर्दी के सिलसिले से जुड़े थे। इस सिलसिले में सादगी, इल्म, शरीअत की पाबंदी और समाज की ख़िदमत पर ज़ोर दिया जाता था। यह सिलसिला दुनिया से भागने के बजाय समाज में रहकर दीन और इंसानियत की सेवा करने की तालीम देता था।
सूफ़ी बुज़ुर्गों से रिश्ते
हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया की दोस्ती हज़रत लाल शाहबाज़ क़लंदर, बाबा फ़रीद गंज-ए-शकर और सैयद जलालुद्दीन बुख़ारी जैसे अज़ीम सूफ़ियों से थी। इन चारों बुज़ुर्गों को “हक़ चार यार” के नाम से याद किया जाता है। इनकी मोहब्बत, भाईचारे और रूहानियत ने पूरे हिंदुस्तान में सूफ़ी तहरीक़ को मज़बूत किया।
सियासत से रिश्ता
उस दौर में मुल्तान की सियासत में भी उनका असर था। जब सुल्तान इल्तुतमिश और नासिरुद्दीन क़बाचा के बीच जंग हुई, तो हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया ने इल्तुतमिश का साथ दिया। उनकी जीत के बाद उन्हें “शेख-उल-इस्लाम” का ख़िताब दिया गया और दीनी मामलों की ज़िम्मेदारी भी सौंपी गई।
हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया की कुछ अहम नसीहतें आज भी लोगों के लिए रौशनी का ज़रिया हैं।
सूफ़ी वो है, जिसका दिल हर तरह की बुराई और गंदगी से साफ़ होता है।
सूफ़ी वो है, जो सुबह को उठे तो रात को याद न करे।
उनका मानना था कि जितना इंसान दुनिया की लालच से दूर होगा, उतना ही ख़ुदा की पहचान और रूहानी सुकून उसके दिल में बढ़ेगा।
विसाल और दरगाह
हज़रत बहाउद्दीन ज़कारिया का विसाल 1268 ई. में हुआ। उनका रौज़ा पाकिस्तान के मुल्तान शहर में मौजूद है। यह दरगाह आज भी लाखों अकीदतमंदों की मंज़िल है। हर साल उनके उर्स के मौक़े पर पाकिस्तान और दूसरे मुल्कों से ज़ायरीन बड़ी तादाद में यहां हाज़िरी देते हैं।
हज़रत शेख बहाउद्दीन ज़कारिया रहमतुल्लाह अलैह ने अपनी पूरी ज़िंदगी इल्म, अमन, इंसानियत और रूहानियत के पैग़ाम को फैलाने में गुज़ारी। उनकी तालीमात आज भी हमें मोहब्बत, सादगी, इल्म और ख़ुदा की रज़ा में जीना सिखाती हैं। इसी वजह से उनका नाम सूफ़ी तारीख़ में हमेशा इज़्ज़त और अक़ीदत के साथ लिया जाता है।
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