अमीर हसन सिज्ज़ी का असली नाम हसन था और उनका लक़ब नज्मुद्दीन था। हालांकि वे अमीर हसन अला सिज्ज़ी के नाम से ज़्यादा मशहूर हुए। “अला” उनके वालिद अलाउद्दीन की तरफ़ इशारा करता है।
उनकी पैदाइश 652 हिजरी (1254 ईस्वी) में बदायूं में एक सैय्यद हाशिमी क़ुरैशी ख़ानदान में हुयी। वे अमीर ख़ुसरो से करीब एक साल छोटे थे। बचपन में ही दिल्ली आ गए और यहीं अपनी तालीम पूरी की।
अमीर हसन को शुरू से ही इल्म और अदब का शौक़ था। फ़ारसी और अरबी ज़बान पर उन्हें बेहतरीन महारत हासिल थी। महज़ 13 साल की उम्र से उन्होंने शायरी शुरू कर दी। उनकी ग़ज़लों में इश्क़, नज़ाकत और रूहानियत की ख़ूबसूरत झलक मिलती है।
तालीम पूरी करने के बाद उन्होंने दरबारी मुलाज़मत की। पहले वे सुल्तान बलबन के बेटे मुहम्मद ख़ां शहीद के साथ मुल्तान गए, जहां करीब 5 साल तक रहे। उनकी शहादत के बाद कुछ समय तक बे-रोज़गार रहे। बाद में जलालुद्दीन खिलजी के दरबार से जुड़े, जहां उनकी ग़ज़लें मशहूर गायक गाया करते थे।
अमीर हसन अपनी ख़ुश-मिज़ाजी, सादगी और बेहतरीन अख़्लाक़ के लिए जाने जाते थे। उनकी गुफ़्तगू इतनी दिलचस्प होती थी कि बादशाह और शहज़ादे भी उन्हें सुनने के मुंतज़िर रहते थे। इसके बावजूद उन्हें अमीर ख़ुसरो जैसी दौलत और शाही इनाम नहीं मिले। उन्होंने ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा तंगहाली में गुज़ारा, लेकिन कभी शिकवा नहीं किया।
वे दुनियावी दिखावे से दूर, सूफ़ियाना और क़लंदराना ज़िंदगी जीते रहे। उनका ज़्यादातर वक़्त इबादत, ज़िक्र और अपने पीर हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की ख़िदमत में गुज़रता था।
अमीर हसन सिज्ज़ी और अमीर ख़ुसरो, दोनों ही हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के बेहद क़रीबी मुरीद थे। शैख़ दोनों से ख़ास मोहब्बत करते थे। हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया की मशहूर मलफ़ूज़ात “फ़वायदुल फ़ुवाद” को अमीर हसन सिज्ज़ी ने ही तर्तीब देकर महफ़ूज़ किया, जिसकी वजह से सूफ़ी इतिहास में उनका नाम हमेशा याद रखा जाएगा।
अमीर हसन की शायरी में इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इश्क़-ए-रसूल की गहरी झलक दिखाई देती है। उन्होंने अपने महबूब के हुस्न को क़ुरआन की आयतों से जोड़ते हुए बड़ी ख़ूबसूरती से बयान किया। उनकी शायरी में रूहानियत, मोहब्बत और इलाही नूर का अनोखा संगम मिलता है।
एक दिलचस्प वाक़िया
एक बुज़ुर्ग अपनी रोज़ी-रोटी बाग़बानी से कमाते थे। कुछ लोगों ने हाकिम के कान भर दिए कि यह शख़्स ठीक नहीं है। एक दिन हाकिम ख़ुद उनके बाग़ में पहुंचा। उस वक़्त बुज़ुर्ग नमाज़ अदा कर रहे थे। नमाज़ के बाद उन्होंने पूरे अदब से हाकिम का इस्तक़बाल किया और उसके सामने सेबों की एक रकाबी रख दी।
हाकिम ने दिल ही दिल में सोचा, “अगर यह वाक़ई अल्लाह वाले हैं तो मेरी बात बिना बताए समझ जाएंगे और सबसे बड़ा सेब मुझे देंगे।”
इतना सोचते ही बुज़ुर्ग ने सबसे बड़ा सेब उठाया, मगर देने से पहले एक किस्सा सुनाया।
उन्होंने कहा, “मैंने एक शहर में एक मदारी को देखा। उसके पास एक गधा था जिसकी आंखों पर पट्टी बंधी थी। लोग अंगूठी छिपा देते और गधा सूंघकर उसे ढूंढ लेता था।”
फिर बुज़ुर्ग मुस्कुराए और बोले,
“अगर हम भी करामतें दिखाने लगें, तो हमारी मिसाल उस गधे जैसी होगी। और अगर करामत न दिखाएं, तो लोग कहते हैं कि ये ख़ुदा वाले नहीं हैं।”
यह कहकर उन्होंने सेब वापस रख दिया। इस बात ने हाकिम का दिल बदल दिया और उसे समझ आ गया कि असली बुज़ुर्गी करामात में नहीं, बल्कि अख़्लाक़, तवाज़ो और अल्लाह की बंदगी में है।
अमीर हसन सिज्ज़ी का इंतिक़ाल 738 हिजरी में हुआ। उनका मज़ार खुल्दाबाद (ज़िला औरंगाबाद, महाराष्ट्र) में है, जहां आज भी बड़ी तादाद में अकीदतमंद हाज़िरी देते हैं।
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