उर्दू अदब की तारीख़ में इमदाद इमाम असर का नाम बड़े एहतराम के साथ लिया जाता है। उनकी पैदाइश 17 अगस्त 1849 को बिहार के पटना ज़िले के करापर सराय में एक ऐसे ख़ानदान में हुयी, जो इल्म और अदब के लिए मशहूर था। कहा जाता है कि उनके बुज़ुर्गों में से एक मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के उस्ताद रहे थे। उनके वालिद शम्स-उल-उलमा सैयद वहीदुद्दीन बहादुर एक बड़े आलिम थे और रजिस्ट्रार, मजिस्ट्रेट से लेकर चीफ़ जस्टिस जैसे अहम ओहदों पर फ़ाइज़ रहे।
इमदाद इमाम असर ने अपनी शुरुआती तालीम अपने वालिद और मौलवी सैयद मोहम्मद मोहसिन बनारसी से हासिल की। आगे चलकर उन्होंने वकालत की और फिर पटना कॉलेज में इतिहास और अरबी के प्रोफ़ेसर बने। इल्म, तहक़ीक़ और अदब से उनकी गहरी वाबस्तगी ने उन्हें अपने दौर के सबसे बड़े विद्वानों में शामिल कर दिया। उनकी ख़िदमात के एतराफ़ में उन्हें “शम्स-उल-उलमा” और “नवाब” जैसे ख़िताब भी अता किए गए।
इमदाद इमाम असर सिर्फ़ शायर ही नहीं, बल्कि एक बेहतरीन नाक़िद (आलोचक), नॉवेल-निगार और दानिशवर भी थे। उनकी सबसे मशहूर किताब “काशिफ़-उल-हक़ाइक़”, जिसे “बहारिस्तान-ए-सुख़न” भी कहा जाता है, उर्दू तन्क़ीद की अहम किताबों में शुमार होती है। इस किताब में उन्होंने सिर्फ़ शायरी की बात नहीं की, बल्कि उसे संगीत, चित्रकला, खेती, प्रकृति और दूसरे इल्मों से जोड़कर देखा। यही बात उनकी तन्क़ीद को अपने दौर से आगे ले जाती है।
दोस्ती की तुम ने दुश्मन से अजब तुम दोस्त हो,
मैं तुम्हारी दोस्ती में मेहरबां मारा गया
असर ने मिस्र, यूनान, इटली, अरब, फ़ारसी और संस्कृत की अदबी रिवायतों का गहरा मुताला किया। उनका मानना था कि अगर उर्दू शायर दूसरे अदबी ख़ज़ानों से भी सीखते, तो उर्दू शायरी और ज़्यादा समृद्ध होती। उन्होंने मीर, ग़ालिब और इमरुल क़ैस जैसे बड़े शायरों का तुलनात्मक अध्ययन भी किया, जो उस दौर में एक नई सोच मानी जाती थी।
आईना देख के फ़रमाते हैं,
किस ग़ज़ब की है जवानी मेरी।
उनकी दूसरी किताबों में मिरात-उल-हुक़ूमा, फ़साना-ए-हिम्मत, किमिया-ए-ज़िराअत, फ़वाइद-ए-दारैन और दीवान-ए-असर शामिल हैं। उनकी रचनाएं बताती हैं कि उनका इल्म सिर्फ़ अदब तक महदूद नहीं था, बल्कि ज़िंदगी, समाज, खेती, साइंस और तहज़ीब जैसे कई मौज़ूआत पर उनकी गहरी नज़र थी।
इमदाद इमाम असर की शायरी भी उनकी इल्मी शख़्सियत की तरह असरदार और फ़िक्रअंगेज़ है।
अफ़सोस उम्र कट गई रंज़-ओ-मलाल में,
देखा न ख़्वाब में भी जो कुछ था ख़याल में।
मुश्किल का सामना हो तो हिम्मत न हारिए,
हिम्मत है शर्त, साहिब-ए-हिम्मत से क्या न हो।
17 अक्टूबर 1934 को इमदाद इमाम असर इस दुनिया से रुख़्सत हुए। मगर उनकी किताबें, उनकी तन्क़ीदी नज़र और उनका अदबी फ़िक्र आज भी उर्दू अदब के तलबा, मुहक़्क़िक़ीन और शायरी के चाहने वालों के लिए एक अनमोल विरासत है। उन्होंने साबित किया कि सच्चा अदब सिर्फ़ अल्फ़ाज़ की ख़ूबसूरती नहीं, बल्कि इल्म, तहज़ीब और इंसानी फ़िक्र का आईना भी होता है।
ये भी पढ़ें: क़मर जलालाबादी: जिनकी क़लम से निकले सदाबहार नग़मे
आप हमें Facebook, Instagram, Twitter पर फ़ॉलो कर सकते हैं और हमारा YouTube चैनल भी सबस्क्राइब कर सकते हैं।



