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बिलक़िस ज़ाफ़िरुल हसन: औरत के जज़्बात और समाज की सच्चाइयों की आवाज़

उर्दू अदब में कुछ नाम ऐसे हैं जिन्होंने सिर्फ़ शायरी तक ख़ुद को महदूद नहीं रखा, बल्कि अफ़साने, ड्रामे और बच्चों के लिए भी ऐसी तख़्लीक़ात पेश कीं, जो आज भी अपनी अहमियत रखती हैं। बिलक़िस ज़ाफ़िरुल हसन ऐसा ही एक अहम नाम हैं।

बिलक़िस ज़ाफ़िरुल हसन का असली नाम बिलक़िस परवीन है। शादी से पहले वह बिलक़िस बानो रहमानी के नाम से लिखा करती थीं। उन्होंने अपनी क़लम के ज़रिये उर्दू अदब को कई यादगार किताबें दीं और एक बहुआयामी साहित्यकार के तौर पर अपनी पहचान बनाई।

वह सिर्फ़ ग़ज़लें और नज़्में ही नहीं लिखतीं, बल्कि अफ़साने, ड्रामे और बच्चों के लिए कहानियां और नज़्में भी तख़्लीक़ करती रही हैं। उनकी तहरीरों में इंसानी रिश्तों की नर्मी, समाज की तल्ख़ हक़ीक़तें और ख़ास तौर पर औरत की ज़िंदगी से जुड़े मसाइल पूरी शिद्दत के साथ सामने आते हैं।

अफ़सानों की दुनिया में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनके अफ़साना मजमूए “वीराने आबाद घरानों के” और “मांगे की आग” समाज की पेचीदगियों और इंसानी रिश्तों की गहराई को बयां करते हैं। वहीं उनका ड्रामा संग्रह “तमाशा कराए कोई” रंगमंच पर भी ख़ूब सराहा गया। बच्चों के लिए लिखी गई उनकी किताब “दिलचस्प” यह साबित करती है कि उनकी क़लम हर उम्र के पाठकों से मुख़ातिब होना जानती थी।

बिलक़िस ज़ाफ़िरुल हसन की अदबी ख़िदमात को मुल्क की कई उर्दू अकादमियों ने इज़्ज़त बख़्शी। उन्हें अलग-अलग साहित्यिक संस्थाओं की तरफ़ से कई पुरस्कार मिले। उनके लिखे हुए ड्रामे दिल्ली समेत कई शहरों में मंचित किए गए, उनके अशआर की गूंज सिर्फ़ उर्दू तक महदूद नहीं रही, बल्कि हिंदी और अंग्रेज़ी में हुए उनके तर्जुमे भी कई मुअतबर काव्य-संकलनों का हिस्सा बने।

उनकी शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी सादगी और गहराई है। कम अल्फ़ाज़ में बड़े जज़्बात बयान करना उनका फ़न है। उनकी ग़ज़लों में दर्द भी है, उम्मीद भी और ज़िंदगी का तजुर्बा भी।

“जाने क्या कुछ है आज होने को,
जी मिरा चाहता है रोने को।”

इस शे’र में दिल की बेचैनी और अनजाने एहसास को बेहद ख़ूबसूरती से पेश किया गया है।

“एक उम्र और हाथ क्या आया,
ज़िंदगी क्या मिली थी खोने को।”

यह शे’र इंसान की पूरी ज़िंदगी के हासिल और अधूरेपन पर गहरा सवाल खड़ा करता है।

“हर-दिल-अज़ीज़ वो भी है हम भी हैं ख़ुश-मिज़ाज,
अब क्या बताएं कैसे हमारी नहीं बनी।”

“दर-ब-दर की ख़ाक थी तक़दीर में,
हम लिए कांधों पे घर चलते रहे।”

यह शे’र सिर्फ़ मकान नहीं, बल्कि यादों, रिश्तों और अपनी पहचान को ढोते इंसान की पूरी कहानी बयान कर देता है।

बिलक़िस ज़ाफ़िरुल हसन की तहरीरें आज भी इसलिए पढ़ी जाती हैं क्योंकि उनमें समाज की सच्चाइयां, औरत की आवाज़ और इंसानी जज़्बात पूरी सच्चाई के साथ मौजूद हैं। उन्होंने उर्दू अदब को ऐसी रचनाएं दीं जो सिर्फ़ अपने दौर की नहीं, बल्कि हर दौर के पाठकों के दिल तक पहुंचने की ताक़त रखती हैं।

ये भी पढ़ें: मियां दाद ख़ां सैयाह: उर्दू शायरी का मुसाफ़िर जिसने ज़िंदगी को सफ़र बना दिया    

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