उर्दू अदब की दुनिया में कुछ शायर ऐसे हुए हैं जिनकी पहचान सिर्फ़ उनकी ग़ज़लों तक महदूद नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपनी इल्मी काबिलियत और तर्जुमान (अनुवादक) की हैसियत से भी ऐसी मिसाल कायम की, जिसे आज तक याद किया जाता है। मुनव्वर लखनवी उन्हीं चुनिंदा नामों में शामिल हैं।
दिलचस्प बात यह है कि मुनव्वर लखनवी शायरी उन्हें विरासत में मिली थी। लेकिन उन्होंने अपनी इस विरासत को सिर्फ़ ग़ज़लों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी और उर्दू जैसी भाषाओं के बीच ऐसा पुल बनाया, जिसकी मिसाल कम ही देखने को मिलती है।
मुनव्वर लखनवी का असली नाम मुंशी बिशेश्वर प्रसाद था। “मुनव्वर” उनका तख़ल्लुस था। उनका जन्म 8 जुलाई 1897 को लखनऊ के एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां इल्म, अदब और शायरी का माहौल था।
उनके पिता मुंशी द्वारका प्रसाद ‘उफ़ुक़’ अपने दौर के मशहूर शायर और लेखक थे। घर में शायरी की महफ़िलें सजती थीं, लिहाज़ा बचपन से ही मुनव्वर के दिल में अदब का बीज पड़ गया।
उन्होंने लखनऊ में ही तालीम हासिल की। उर्दू, फ़ारसी, हिन्दी और संस्कृत—चारों ज़बानों पर उनकी ऐसी पकड़ थी कि आगे चलकर यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बन गई।
रेलवे की नौकरी, लेकिन दिल अदब में बसा रहा
1913 में उन्होंने रेलवे के लेखा विभाग में नौकरी शुरू की। नौकरी की वजह से उनका तबादला अलग-अलग शहरों में होता रहा। 1927 में पहले लाहौर और फिर दिल्ली पहुंचे।
1957 में रेलवे से रियार्टड होने के बाद उन्होंने दिल्ली को ही अपना ठिकाना बना लिया। यहीं उन्होंने “आदर्श किताब घर” नाम से एक प्रकाशन संस्थान भी शुरू किया, ताकि अच्छी किताबें लोगों तक पहुंच सकें।
शायर भी, अनुवादक भी
मुनव्वर लखनवी को अगर सिर्फ़ शायर कहा जाए तो शायद यह उनकी शख़्सियत का पूरा परिचय नहीं होगा। उन्होंने ग़ज़लें, नज़्में, रुबाइयां तो लिखीं ही, साथ ही भारतीय संस्कृति और धार्मिक ग्रंथों को उर्दू ज़ुबान में ढालने का ऐसा काम किया, जो बेहद मुश्किल माना जाता है।
1936 में उनका उर्दू में किया गया भगवद्गीता का छंदबद्ध अनुवाद “नसीम-ए-इरफ़ान” प्रकाशित हुआ। इस किताब ने उन्हें पूरे अदबी हल्के में एक बड़े अनुवादक के रूप में पहचान दिलाई।
उनकी शायरी की अलग पहचान
मुनव्वर लखनवी की ग़ज़लों में सिर्फ़ इश्क़ की बातें नहीं मिलतीं, बल्कि इंसानी जज़्बात, रूहानियत, फ़लसफ़ा और ज़िंदगी के गहरे तजुर्बे भी दिखाई देते हैं।
उनकी भाषा में उर्दू की नज़ाकत है, फ़ारसी की रवानी है और हिन्दी-संस्कृत का गहरा असर भी महसूस होता है। यही वजह है कि उनकी शायरी अपने समकालीन शायरों से कुछ अलग नज़र आती है।
उनके कुछ मशहूर अशआर आज भी अदब के शौक़ीन बड़े ज़ौक़ से पढ़ते हैं
क्या कोई समझेगा अफ़्साना मिरा,
हाल है सब से जुदागाना मिरा।
इस शे’र में एक शायर की तन्हाई और उसकी अलग दुनिया साफ़ महसूस होती है।
मय पिलाना है तो यूं साक़ी पिला,
हो कभी ख़ाली न पैमाना मिरा।
सुकूं मिल गया है, क़रार आ गया है,
किसी पर हमें ए’तिबार आ गया है।
क़फ़स में भी कैसी बहार आ गई है,
क़फ़स में जो ज़िक्र-ए-बहार आ गया है।
इश्क़ पर उनकी नज़र भी निराली थी।
इश्क़ में जान से गुज़रने को,
इक हमीं रह गए हैं मरने को।
मैं तुम्हारी अदाओं के सदक़े,
कभी बिगड़ोगे भी संवरने को।
बड़े अजीब मनाज़िर नज़र से गुज़रे हैं,
जब अहल-ए-होश तिरी रहगुज़र से गुज़रे हैं।
प्रमुख कृतियां
मुनव्वर लखनवी की कई किताबें प्रकाशित हुईं, जैसे
- नज़र-ए-अदब (1929)
- कायनात-ए-दिल (1939)
- नसीम-ए-इरफ़ान (भगवद्गीता का उर्दू अनुवाद)
- कुमारसंभव का उर्दू अनुवाद
- दुर्गा सप्तशती का उर्दू अनुवाद
- धम्पद या सच्ची राह
- गीतांजलि का उर्दू तर्जुमा
इन रचनाओं ने उन्हें सिर्फ़ उर्दू शायर नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विरासत के सच्चे सेतु के रूप में स्थापित किया।
साहित्यकारों ने भी सराहा
मुनव्वर लखनवी की शख़्सियत और साहित्य पर बाद में कई विद्वानों ने विस्तार से लिखा। शबाब ललित ने “मुनव्वर लखनवी – एक मुतला” शीर्षक से उनकी साहित्यिक यात्रा का मूल्यांकन किया, जबकि राज नारायण राज ने “मुनव्वर लखनवी – शख़्सियत और शायरी” के ज़रिए से उनकी अदबी सेवाओं को विस्तार से सामने रखा।
विरासत
25 मई 1970 को दिल्ली में मुनव्वर लखनवी इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। लेकिन उनकी छोड़ी हुई किताबें, उनके अनुवाद और उनकी शायरी आज भी यह याद दिलाती है कि ज़ुबानें इंसानों को बांटती नहीं, बल्कि जोड़ती हैं।
उन्होंने यह साबित किया कि चाहे रामायण हो या गीता, क़ुरआन हो या धम्मपद—हर महान ग्रंथ का पैग़ाम इंसानियत है। और अगर किसी शायर के पास इल्म, मोहब्बत और ज़ुबान का हुनर हो, तो वह इन पैग़ामों को हर दिल तक पहुंचा सकता है।
मुनव्वर लखनवी सिर्फ़ एक शायर नहीं थे, बल्कि हिन्दुस्तान की गंगा-जमुनी तहज़ीब के ऐसे अलमबरदार थे, जिन्होंने अपनी क़लम से भाषाओं के बीच मोहब्बत का पुल तैयार किया।
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