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पंजाब की अनमोल विरासत ‘गुड़िया-पटोले’ को बचाने की अनोखी पहल

पंजाब की समृद्ध संस्कृति और विरासत सदियों से हमारी पहचान रही हैं। लेकिन आधुनिक दौर की तेज़ रफ्तार में कई पुरानी कलाएं धीरे-धीरे गुम होती जा रही हैं। इन्हीं में से एक ख़ास कला है ‘गुड़िया-पटोले’ बनाना, जो कभी पंजाबी लड़कियों के बचपन का अहम हिस्सा हुआ करती थी। काबिल-ए-ज़िक्र है कि इस अनमोल विरासत को बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए फाइन आर्ट्स की प्रोफ़ेसर डॉ. दविंदर कौर और उनके पति जसमेर सिंह ढड्ड एक सराहनीय और अनोखी मुहिम चला रहे हैं।

बचपन का शौक बना ज़िंदगी का मिशन

डॉ. दविंदर कौर बचपन से ही कपड़े की गुड़ियां (Dolls) बनाने की कला में माहिर रही हैं। अपने सफ़र के बारे में बताते हुए वो कहती हैं कि शुरुआत में वो साधारण कपड़े से गुड़िया बनाकर उसमें सिर्फ़ गांठें लगा देती थी। धीरे-धीरे उन्होंने सुई-धागे का इस्तेमाल करना भी सीख लिया और अपनी कला को निखारना शुरू किया।

बाद में जब वो कॉलेज में पढ़ाने लगी, तो उनके स्टूडेंट्स और साथी टीचरों ने उनकी बनाई गुड़ियों को देखा और खूब तारीफ़ की। लोगों की इस सराहना और हौसला-अफ़ज़ाई ने उन्हें इस कला को और बेहतर बनाने और आगे बढ़ाने की प्रेरणा दी।

Source: Sadda Punjab

कला में आधुनिकता और जज़्बातों का संगम

समय के साथ डॉ. दविंदर कौर ने गुड़िया बनाने की कला में कई नए प्रयोग किए। उन्होंने गुड़ियों के हाथों को असली आकार देने के लिए उनके अंदर बारीक तारें लगानी शुरू की, जिससे उंगलियां भी साफ़ दिखाई देने लगीं। वहीं, चेहरे को कपड़े की बजाय फाइबर से तैयार कर उसे हाथों से बेहद खूबसूरती के साथ रंगना और सजाना शुरू किया।

डॉ. दविंदर बताती हैं कि वो ये गुड़ियां किसी दबाव या मजबूरी में नहीं, बल्कि अपने दिल के जज़्बातों और भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बनाती हैं। उनकी बनाई गुड़ियों में पंजाबी संस्कृति की झलक साफ़ दिखाई देती है। इनमें चरखा कातती पंजाबन, मधानी से मक्खन निकालती युवती और पारंपरिक लोक नृत्य करती गुड़ियां ख़ास तौर पर लोगों का ध्यान खींचती हैं।

Source: Sadda Punjab

नई पीढ़ी को सिखा रही हैं ये अनमोल कला

डॉ. दविंदर कौर आज के बच्चों और लड़कियों को भी गुड़िया बनाने की ये ख़ास कला सिखा रही हैं। वो उन्हें 15 इंच की गुड़िया का सही माप लेना, उसका चेहरा, हाथ-पैर और शरीर की बनावट तैयार करना सिखाती हैं। इसके बाद बच्चों को गुड़ियों को पारंपरिक कपड़े पहनाने और उन्हें सजाने का हुनर भी सिखाया जाता है।

छोटे बच्चों के खेलने के लिए बनाई जाने वाली गुड़ियों में सुरक्षा का ख़ास ध्यान रखा जाता है। इनमें तार या रूई की जगह सिर्फ़ मुलायम कपड़े की कतरनों और सूती धागों का इस्तेमाल किया जाता है, ताकि गुड़ियां पूरी तरह सुरक्षित, नरम और बच्चों के खेलने के लिए आरामदायक रहें।

Source: Sadda Punjab

शारीरिक और मानसिक विकास में मददगार

इस सफ़र में डॉ. दविंदर कौर का साथ उनके पति जसमेर सिंह ढड्ड भी दे रहे हैं, जो लंबे समय से अपनी संस्था के ज़रिए पंजाबी विरासत और संस्कृति को देश-विदेश तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं। जसमेर सिंह का कहना है कि आजकल कई लड़कियां पढ़ाई के बाद अपना ज़्यादातर समय मोबाइल फोन या इंस्टाग्राम रील्स देखने में बिताती हैं, जिससे उनकी रचनात्मक सोच को ज़्यादा बढ़ावा नहीं मिलता।

लेकिन जब लड़कियां अपने हाथों से गुड़ियां बनाती हैं, उन्हें अपनी पसंद के कपड़े पहनाती हैं और सजाती हैं, तो इससे उनकी सोचने-समझने की क्षमता और रचनात्मकता विकसित होती है। उनका मानना है कि ये कला न सिर्फ़ बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास में मदद करती है, बल्कि उन्हें ज़िंदगी की छोटी-छोटी ज़िम्मेदारियों और घरेलू कामों की बारीकियां समझने का मौक़ा भी देती है।

Source: Sadda Punjab

गुम होती कला को फिर से ज़िंदा करने की कोशिश

इस ख़ूबसूरत और धीरे-धीरे गुम होती जा रही कला को फिर से लोगों तक पहुंचाने के लिए ये दंपति पिछले 2-3 सालों से एक विशेष प्रतियोगिता का आयोजन कर रहा है। इस साल भी 15 से 35 साल की उम्र वाले लड़कियों को बिना किसी फीस के इसमें हिस्सा लेने का मौक़ा दिया गया। प्रतियोगिता के तहत प्रतिभागियों को घर पर ही 12 से 15 इंच की कपड़े की गुड़िया तैयार करनी थी और उसे बनाने की पूरी प्रक्रिया की एक वीडियो भेजनी थी। इस पहल को लड़कियों की ओर से शानदार प्रतिक्रिया मिली।

इसके बाद विशेषज्ञों की एक टीम ने सभी गुड़ियों का मूल्यांकन कर सर्वश्रेष्ठ कृतियों का चयन किया। प्रतियोगिता में पहले तीन स्थान हासिल करने वाली लड़कियों को संस्था की ओर से नकद पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। ये पहल न सिर्फ़ एक पुरानी कला को बचाने की कोशिश है, बल्कि हमारी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में एक सराहनीय कदम भी है।

स्टोरी– मनमीत कौर

इस लेख को पंजाबी में पढ़ें

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