सिख धर्म में हथियारों की पूजा करना और उन्हें अपने साथ रखना सदियों पुरानी रिवायत का हिस्सा रहा है। लेकिन हाल के दिनों में एक नया विवाद सामने आया है। महाराष्ट्र के नांदेड़ स्थित तख्त श्री हज़ूर साहिब में पुलिस ने कई सिख श्रद्धालुओं, धार्मिक परंपराओं से जुड़े लोगों और स्थानीय हथियार बेचने वालों के खिलाफ़ मामले दर्ज किए हैं।
पुलिस की ओर से बड़ी तादाद में कृपाणों और दूसरे पारंपरिक हथियारों को जब्त किए जाने के बाद सिख समुदाय में नाराज़गी बढ़ गई है। भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले कई सिख संगठनों ने भी इस कार्रवाई का विरोध किया है। इस विवाद को समझने के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी है कि सिख धर्म में Kirpan (कृपाण) की क्या अहमियत है। इसके बाद ये समझना आसान होगा कि श्री हज़ूर साहिब में चल रहा ये विवाद आख़िर क्यों पैदा हुआ और इसे लेकर सिख समुदाय में इतनी फ़िक्र क्यों है।

Kirpan (कृपाण): सिर्फ़ हथियार नहीं, सिख पहचान की निशानी
सिख धर्म में Kirpan (कृपाण) को सिर्फ़ एक हथियार नहीं माना जाता। ये सिखो के महान चरित्र, खुद की हिफाज़त और कमज़ोर लोगों की मदद करने की भावना की निशानी है। “Kirpan (कृपाण)” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है—”कृपा” यानी दया और “आन” यानी सम्मान। इसलिए Kirpan (कृपाण) का मतलब ऐसा हथियार है, जिसका इस्तेमाल किसी पर ज़ुल्म करने के लिए नहीं, बल्कि इंसाफ़ और सम्मान की रक्षा के लिए किया जाता है। सिखों में हथियार रखने की परंपरा बहुत पुरानी है। लेकिन इसे ख़ास महत्व छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने दिया।
जब गुरु हरगोबिंद साहिब जी सिखों के गुरु बने, तो उन्होंने दो तलवारें धारण की। एक तलवार “मीरी” यानी दुनियावी अधिकारों का प्रतीक थी और दूसरी “पीरी” यानी आध्यात्मिक ताक़त का। इसके ज़रिए उन्होंने सिखों को संदेश दिया कि उन्हें संत भी बनना है और ज़रूरत पड़ने पर योद्धा भी। इसी सोच को “संत-सिपाही” कहा जाता है। गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने सिखों को अच्छे घोड़े और हथियार रखने के लिए भी कहा, ताकि वो अन्याय के ख़िलाफ़ खड़े हो सकें और ज़रूरतमंदों की हिफाज़त कर सकें।
पांच ककार और संवैधानिक संरक्षण
साल 1699 में बैसाखी के मौक़े पर आनंदपुर साहिब में दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने अमृतधारी सिखों के लिए पांच ककार धारण करना ज़रूरी किया। ये पांच ककार हैं— केश (बिना कटे बाल), कंघा, कड़ा, कच्छा, कृपाण

गुरु गोबिंद सिंह जी ने Kirpan (कृपाण) को खालसा सिख की पहचान का अहम हिस्सा बनाया। गुरु साहिब ने Kirpan (कृपाण) को खालसा के लिए शरीर का एक अभिन्न अंग बनाया, जिसे कभी भी शरीर से अलग नहीं किया जा सकता। सिखों की रोज़ाना की अरदास की शुरुआत भी “प्रथम भगौती सिमर कै” से होती है। ये पंक्ति ईश्वर की शक्ति को याद करती है, जिसे सिख परंपरा में धर्म और इंसाफ़ की रक्षा करने वाली ताक़त माना जाता है।
कानूनी तौर पर भी Kirpan (कृपाण) को ख़ास मान्यता मिली हुई है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 हर नागरिक को अपने धर्म को मानने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। इस अनुच्छेद में साफ़ तौर पर कहा गया है कि सिखों द्वारा कृपाण धारण करना और उसे अपने साथ रखना उनके धर्म का हिस्सा माना जाएगा। इसी वजह से सिख समुदाय को अपनी धार्मिक आस्था के प्रतीक के तौर पर Kirpan (कृपाण) रखने का संवैधानिक अधिकार और संरक्षण हासिल है।
हज़ूर साहिब हथियार विवाद क्या है?
महाराष्ट्र के नांदेड़ में स्थित तख्त श्री हज़ूर साहिब सिख धर्म के पांच तख्तों में से एक है। ये वही पवित्र स्थान है, जहां दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी ज़िंदगी के आख़िरी दिन बिताए थे और गुरु ग्रंथ साहिब जी को गुरु पद सौंपा था। हर साल भारत और दुनिया के कई देशों से लाखों श्रद्धालु हज़ूर साहिब दर्शन के लिए आते हैं। यहां की एक पुरानी परंपरा ये भी है कि श्रद्धालु कृपाण, श्री साहिब, खंडा और दूसरे पारंपरिक सिख हथियार धार्मिक यादगार और अपनी आस्था की निशानी के रूप में खरीदते हैं।

हाल ही में नांदेड़ पुलिस ने शहर में सख्त जांच अभियान चलाया। इस दौरान पुलिस ने हज़ूर साहिब के आसपास पारंपरिक हथियार बेचने वाली कई दुकानों पर छापे मारे और बड़ी संख्या में Kirpan (कृपाण), खंडे और दूसरे धार्मिक हथियार जब्त किए। रिपोर्टों के मुताबिक पुलिस ने कई स्थानीय दुकानदारों, हथियार बनाने वाले कारीगरों और कुछ श्रद्धालुओं के ख़िलाफ़ अलग-अलग कानूनी धाराओं के तहत मामले भी दर्ज किए हैं। इसी कार्रवाई के बाद ये मामला विवाद का रूप ले गया और सिख समुदाय के कई लोगों तथा संगठनों ने इसे अपनी धार्मिक परंपराओं से जुड़ा मुद्दा बताते हुए चिंता जताई है।
पुलिस का पक्ष क्या है?
विवाद बढ़ने के बाद स्थानीय प्रशासन और पुलिस ने अपनी कार्रवाई का बचाव किया। पुलिस का कहना है कि ये कदम कानून-व्यवस्था बनाए रखने और बिना उचित अनुमति या तय नियमों से बड़े हथियारों की खुलेआम बिक्री रोकने के लिए उठाया गया। पुलिस के मुताबिक उन्हें आशंका थी कि कुछ असामाजिक तत्व ऐसे हथियारों का गलत इस्तेमाल कर सकते हैं।
इसी वजह से नियमों को सख्ती से लागू करने और जांच अभियान चलाने की ज़रूरत पड़ी। अधिकारियों का कहना है कि उनकी कार्रवाई किसी धार्मिक परंपरा के ख़िलाफ़ नहीं थी, बल्कि आम लोगों की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को ध्यान में रखकर की गई थी।
सिख संगठनों की आपत्ति
पुलिस की इस कार्रवाई के बाद सिख समुदाय में कड़ी प्रतिक्रिया देखने को मिली है। सिख नेताओं, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के सदस्यों और हज़ूर साहिब से जुड़े प्रतिनिधियों का कहना है कि Kirpan (कृपाण) कोई साधारण हथियार नहीं, बल्कि सिख धर्म का एक पवित्र धार्मिक प्रतीक है।

उनका कहना है कि सिख धर्म के सबसे पवित्र स्थलों में से एक हज़ूर साहिब में पारंपरिक सिख हथियारों को जब्त करना सिख परंपराओं और धार्मिक जज़्बात का अनादर है। सिख संगठनों का कहना है कि कृपाण और दूसरे पारंपरिक हथियार उनकी धार्मिक पहचान और इतिहास का अहम हिस्सा हैं। इसलिए इनके ख़िलाफ़ की गई कार्रवाई से सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं।
सिख संगठनों का क्या कहना है?
सिख संगठनों का कहना है कि नांदेड़ में पारंपरिक सिख हथियार बनाने और बेचने का काम कई पीढ़ियों से चलता आ रहा है। ये वहां के कई कारीगरों और दुकानदारों की रोज़ी-रोटी का अहम ज़रिया है। उनका मानना है कि इन कारीगरों और दुकानदारों के ख़िलाफ़ मामले दर्ज कर उन्हें अपराधियों की तरह पेश करना ठीक नहीं है। संगठनों का ये भी कहना है कि श्रद्धालुओं के ख़िलाफ़ कानूनी कार्रवाई करना उनके धार्मिक और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, क्योंकि Kirpan (कृपाण) और दूसरे पारंपरिक हथियार उनकी आस्था और पहचान से जुड़े हुए हैं।
ये विवाद अब राजनीतिक रंग भी लेता दिखाई दे रहा है और पंजाब तथा महाराष्ट्र के बीच चर्चा का विषय बन गया है। एसजीपीसी के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने पुलिस की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की है। ख़बरों के मुताबिक उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और गृह मंत्री को पत्र लिखकर इस मामले में फ़ौरन दखल देने की मांग की है। एसजीपीसी ने चेतावनी दी है कि अगर दर्ज किए गए मामले वापस नहीं लिए गए और जब्त किए गए हथियार श्रद्धालुओं को नहीं लौटाए गए, तो इस मुद्दे पर बड़ा आंदोलन शुरू किया जा सकता है।
कानूनी सहायता और समाधान की मांग
कई सिख संगठनों ने ऐलान किया है कि वो उन श्रद्धालुओं, दुकानदारों और कारीगरों को मुफ़्त कानूनी मदद देंगे, जिनके ख़िलाफ़ पुलिस ने मामले दर्ज किए हैं। उनका कहना है कि इन मामलों को अदालत में चुनौती दी जाएगी। संगठनों का आरोप है कि ये पूरा मामला सिख धार्मिक परंपराओं के प्रति प्रशासन की संवेदनशीलता की कमी को दिखाता है। उनका मानना है कि सिख धर्म से जुड़े पारंपरिक हथियारों को आम आपराधिक हथियारों की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
समुदाय के कई नेताओं ने इस मुद्दे के समाधान के लिए एक संयुक्त बैठक बुलाने की मांग की है। उनका कहना है कि इस बैठक में तख्त श्री हज़ूर साहिब के प्रबंधन बोर्ड, सिख विद्वानों और प्रतिनिधियों के साथ-साथ नांदेड़ प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों को भी शामिल किया जाना चाहिए।

उनके मुताबिक बातचीत और आपसी समझ के ज़रिए ही इस विवाद का शांतिपूर्ण हल निकाला जा सकता है। सिख समुदाय के प्रतिनिधियों ने प्रशासन से मांग की है कि निर्दोष श्रद्धालुओं और दुकानदारों के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों की फ़ौरन समीक्षा की जाए और ज़रूरत पड़ने पर उन्हें वापस लिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने पारंपरिक सिख हथियारों की बिक्री, रखने और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के संबंध में साफ़ नियम और दिशा-निर्देश बनाने की भी मांग की है।
इस सुझाव का समर्थन करने वालों का कहना है कि इससे एक तरफ़ सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं और परंपराओं का सम्मान बना रहेगा, वहीं दूसरी तरफ़ पुलिस और प्रशासन भी कानून-व्यवस्था तथा सार्वजनिक सुरक्षा कायम रख सकेंगे। हज़ूर साहिब का ये विवाद अब सिर्फ़ एक स्थानीय मामला नहीं रह गया है। ये आज के भारत में धार्मिक आज़ादी, संवैधानिक अधिकारों, पारंपरिक रिवायतों और सार्वजनिक सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने पर एक बड़ी बहस का विषय बन चुका है।
स्टोरी– गुरप्रीत सिंह
इस लेख को पंजाबी और अंग्रेज़ी में पढ़ें
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