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तर्जुमा सिख ने किया,छपाई हिंदुओं ने, हिफाज़त मुसलमान ने और आज हिंदू विद्वान के हाथों में है 114 साल पुरानी कुरान शरीफ़

इमेजिन,  एक ऐसी कुरान शरीफ़ (The Holy Quran) जिसका तर्जुमा एक सिख संत ने किया, छपाई दो हिंदू भाइयों ने की, रौशनाई की स्याही से ज़्यादा एहतराम की रूह थी उसमें, मालिकाना हक़ एक सिख शायर के पास रहा, तोहफे के तौर पर एक मुसलमान को दी गई, और आज हिफाज़त एक हिंदू विद्वान के पास है। ये कोई फिल्म का सीन नहीं, ये है हिंदुस्तान के गुमशुदा चेहरे की वो दास्तां, जिसे तारीख ने 113 साल बाद फिर से हमारे सामने रख दिया है।

1911: जब अमृतसर में गूंजी ‘इक ओंकार’ और ‘बिस्मिल्लाह’ की सदा

तारीख का पन्ना पलटिए, सन् 1911। अंग्रेज़ों का राज। भारत बंटा नहीं था, न कश्मीर बना था, न बांग्लादेश। पंजाब का दिल अमृतसर धड़क रहा था। उसी शहर में गुरमत प्रेस पर एक अज़ीम काम हुआ।

संत वैद्य गुरदित सिंह अलोमहारी जो सिखों के निर्मला संप्रदाय से जुड़े थे। ये संप्रदाय सिर्फ़ गुरबानी ही नहीं, बल्कि हर धर्म की किताब को ‘इल्म का खज़ाना’ समझता था। उन्होंने ठान लिया कि क़ुरान का पैग़ाम हर उस शख्स तक पहुंचे जो गुरमुखी (पंजाबी) पढ़ सकता है, फिर चाहे वो सिख हो, हिंदू हो या मुसलमान।

उनके साथ जुड़ गए भगत बुधमल, वैद्य गुरदित्ता मल (दोनों हिंदू) और मेला सिंह। ये चारों रूह एक हो गई।

नतीजा?
1,000 नुस्खे छपे। और छपने वाले थे ‘कटारिया ऐंड संस’  मुंबई के दो हिंदू भाई। उनके प्रेस में ‘बिस्मिल्लाह’ और ‘वाहेगुरु’ दोनों की बरकत थी।

कोटकपुरा से लांडे गांव तक: इश्क की मुसाफिरी

इन हज़ारों कॉपियों में से एक कॉपी पहुंची कोटकपुरा के मशहूर सिख शायर सरदार झंडा सिंह ‘आरिफ़’ के पास। ‘आरिफ़’ साहब ने इस क़ुरान को अपने दिल का सुल्तान बना लिया। रोज़ उठते, पढ़ते, समझते। उन्हें इस किताब से ऐसा रूहानी जुड़ाव हुआ कि इसने उनकी पूरी जिंदगी बदलकर रख दिया।

जब ‘आरिफ़’ साहब का आख़िरी सफ़र शुरू हुआ, तो उनके बेटे ने ये किसी म्यूज़ियम को नहीं, किसी नीलामी में नहीं, बल्कि दिल से दिल तक पहुंचाया। उन्होंने ये गिरामी तोहफ़ा नूर मोहम्मद (लांडे गांव, पंजाब) को दे दिया। एक मुसलमान जो पेशे से सीनियर लैब अटेंडेंट थे।

नूर मोहम्मद ने इस क़ुरान को ऐसा एहतराम दिया जैसे कोई बादशाह अपने ताज को रखता है। उसे किसी अलमारी में बंद नहीं किया, बल्कि सीने से लगाए रखा। उनके घर में यह क़ुरान सजदे की इज़्ज़त पाती रही। ना कोई बदज़ुबानी, ना कोई लापरवाही । बस इश्क़ था, अक़ीदत थी, मुहब्बत थी।

जब तारीख़ ने दस्तक दी: प्रोफेसर पारीहार का आना

फिर एक दिन … साल 2023-24 के करीब। प्रोफेसर सुभाष पारीहार, पंजाब के नामी इतिहासकार, एक हिंदू विद्वान, जो सूफ़ीवाद पर दुनिया की सबसे बड़ी एनसाइक्लोपीडिया (Encyclopedia) लिख रहे थे। उन्हें इस क़ुरान की भनक लगी।

वे पहुंचे नूर मोहम्मद के पास। बताया कि यह किताब कितनी नायाब है, कितनी अनमोल है। नूर मोहम्मद ने एक पल भी नहीं लगाया। उन्होंने कहा –

‘बाबा, यह किताब किसी की मिल्कियत नहीं है। ये मुहब्बत की अमानत है। इसे लो, अपने काम में लगाओ। मेरे लिए यह सौभाग्य है कि यह नुस्खा आप जैसे विद्वान के हाथ लग रहा है।’

प्रोफेसर के मुंह से निकली वो बात, जो सिर्फ सुनी नहीं गई, महसूस की गई

प्रोफेसर पारीहार जब इस क़ुरान को देखते हैं, तो उनकी आंखें कहानी कहने लगती हैं। वो कहते हैं-

‘इससे बेहतर और कोई मिसाल नहीं है मुस्लिम-हिंदू-सिख भाईचारे की।’ 20वीं सदी की शुरुआत में, जब ब्रिटिश हमें लड़ाना चाहते थे, तब ये लोग एक-दूसरे के धर्म के उलूम (ज्ञान) को फैला रहे थे। इन लोगों को ही असली ‘धार्मिक’ कहना चाहिए। 

 जब मुंबई, लंदन और अमृतसर की सनद आई

ये क़ुरान बस क़ुरान नहीं है-ये हिंदुस्तान का वो सपना है जो टूटा नहीं, मरहम लगा रहा है

जी हां, यह क़ुरान महज़ इबादत की किताब नहीं है। ये एक दस्तावेज़ है, जो साबित करता है:

  • अनुवादक: सिख
  • छापने वाले:  हिंदू
  • पहला मालिक: सिख कवि
  • तोहफा पाने वाला :  मुसलमान
  • आज संजोने वाला :  हिंदू इतिहासकार

पांच धर्म? नहीं : एक इंसानियत।

114 साल बाद भी ये पैग़ाम दे रही है-’हम एक हैं, हमारी किताबें अलग हैं, लेकिन हमारा रब एक है’

आज देश में नफ़रत की स्याही छिड़की जाती है। सोशल मीडिया पर ज़हर उगला जा रहा है। लोगों को लफ्ज़ों से काटा जा रहा है।

और इसी दरमियान, 1911 में छपी एक क़ुरान कोटकपुरा से लांडे गांव, और वहां से प्रोफेसर पारीहार के हाथों में आकर आवाज़ दे रही है –

“ऐ ग़ुरूर करने वालो! हमारे बाप-दादे साथ बैठते थे, साथ पढ़ते थे, साथ इबादत करते थे। तुम ने क्या बाँट लिया? सिर्फ लाशें बाँटी हैं, मुहब्बत नहीं बाँटी।”

आख़िर में…

प्रोफेसर पारीहार अब इस क़ुरान को अपने सूफ़ीवाद विश्वकोश का गहना बनाएँगे। लेकिन इससे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि हमारे दिलों में यह क़ुरान एक ज़िंदा सबक़ बनकर रहे।

यह सिर्फ एक किताब नहीं है। ये हिंदुस्तान की वो करवट है, जिसने सदियों से लोगों को जोड़े रखा।

और हमें इस करवट को खोने नहीं देना। चाहे कोई क़ुरान पढ़े, गीता पढ़े, गुरुग्रंथ पढ़े या बाइबिल। असली धर्म तो इंसान से मुहब्बत करना है।

 यही पैग़ाम है उस क़ुरान का, जो सिख ने उतारा, हिंदू ने छापा, मुसलमान को मिला, और आज पूरे हिंदुस्तान को राह दिखा रहा है।

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